Thursday, August 18, 2022

आर्थिक बदहाली ने तोड़ दी है जनता की कमर

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विश्व और देश की भीषण त्रासदी के दौर से गुजरता हुआ देश का आम नागरिक त्रस्त एवं  प्रताड़ित है। संक्रमण के कारण स्वास्थ्य और जीवन पर संकट की जो स्थिति मार्च 2020 में प्रारंभ हुई थी, वह निरंतर जारी रही और मार्च 2021 में भीषणतम हो गई। लेकिन, स्वास्थ्य एवं जीवन रक्षा के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाओं से आम नागरिक वंचित रहे। यह स्थिति स्वतंत्रता प्राप्ति के 73 वर्षों के बाद एवं विकास के लिए अनेकों पंचवर्षीय योजनाओं के पश्चात की है।                                                                                             

सात दशकों के विकास और योजनाओं के लाभ से वंचित आम नागरिक            

प्रत्येक वर्ष  खरबों रुपयों के बजट, विकास के बड़े-बड़े दावों और वायदों के बावजूद देश में बुनियादी और आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा तैयार न हो सका एवं उपेक्षित किया जाता रहा। त्रासदी की भीषणता, विश्व के अन्य देशों के उदाहरण एवं राहत कार्यों हेतु 20 लाख करोड़ रुपयों के भारी भरकम आवंटन एवं अन्य केयर फंड्स इत्यादि द्वारा भी खरबों रुपए एकत्रित किए गए। तथापि, शासकीय चिकित्सालयों में सुविधाओं एवं अनिवार्य राहत, आपातिक चिकित्सालयों की व्यवस्था नहीं हुई।                                             

शेष स्थितियां संपूर्ण देश की जनता ने भांति-भांति से झेली है। दवाओं की अनुपलब्धता, कालाबाजारी, निजी चिकित्सा क्षेत्र द्वारा शोषण सबसे अधिक त्रासद रहे।                                                                   

इस एक वर्ष की अवधि में 1000 करोड़ के राहत कोष द्वारा प्रवासी श्रमिकों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध नहीं कराए जा सके। न ही आम आदमी के जीवन निर्वहन हेतु शासकीय सहयोग प्राप्त हुआ।                                                                       

कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि एवं राहत कार्यों की धीमी गति की त्रासदी            

अब त्रासदी के भीषणतम दौर के साथ-साथ प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ती हुई कीमतों की मार से आमजन कराह रहे हैं। पेट्रोल, डीजल के मूल्यों में रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि से प्रत्येक उपभोक्ता एवं सेवा, परिवहन की कीमतों में वृद्धि से आर्थिक संकट, बेरोजगारी, आय के वैकल्पिक स्रोतों के अभाव एवं सरकार द्वारा प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता के अभाव में आम जनता कैसे इन समस्याओं से जूझ रही है?       

इन सबके बावजूद सारी राहत की योजनाओं की गति धीमी है। आवश्यक टीकाकरण कार्यक्रम क्यों इतना धीमा और विसंगति पूर्ण है? इसकी जिम्मेदारी किसकी है? यह भी इस लोकतांत्रिक देश में अनुत्तरित है। यद्यपि, अनेकों राज्यों द्वारा इन समस्याओं को उठाने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश जारी किए हैं, लेकिन, बावजूद इसके निर्देशों के सुपरिणाम प्राप्त होने की संभावना दिखाई नहीं दे रही है।                                                                                                                                                       

लोकतंत्र अथवा चुनाव-तंत्र?                                                                          

पूर्व के एक वर्ष में मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल इत्यादि के उपचुनावों एवं विधान सभाओं के चुनावों में सरकार द्वारा विशेष ध्यान दिए जाने के पश्चात, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में प्रशासनिक शक्ति एवं व्यय किए जाने के पश्चात तब चर्चाएं अगले वर्ष उत्तर प्रदेश के चुनाव पर आकर केंद्रित हो गई हैं।               

देश में प्रत्येक वर्ष चुनाव- वर्ष ही रहता है। सरकारों के गठन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली जनता की स्थिति पहले जैसी ही रहती है।                                                                                         

विकास के समस्त मापदंडों पर पिछड़ता भारत                                                 

समस्त अंतरराष्ट्रीय आकलन भारत में भुखमरी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, असमानताओं इत्यादि में वृद्धि को स्पष्ट करते हैं। बेरोजगारी एवं सकल उत्पाद दर का घटना तो इन स्थितियों का परिणाम है ही। अधिकांश राज्य सरकारों और केंद्र के द्वारा वित्तीय प्रबंध विभिन्न संस्थाओं से और रिजर्व बैंक से ऋण लेकर किया जा रहा है अर्थात आय में वृद्धि के कोई सार्थक उपाय सरकारों के पास नहीं हैं। फिर, विकास के मापदंडों में पिछड़ने की स्थितियों में “नीति आयोग”, सरकारी विशेषज्ञों, राज्य योजना मंडलों, विभिन्न विभागों और विभिन्न विभागों के मंत्रियों की भूमिका कहां,  कैसी?  और कितनी है?                                                                                                            

आम जन विकास से वंचित                                                                           

आर्थिक मोर्चे की तथाकथित सरकारी घोषणाओं की  उपलब्धियों एवं  “सुनहरे भारत”, “तेजी  से विकास”, “नए भारत”, ” न्यू इंडिया”,  “सबका साथ-सबका विकास” जैसे नए-नए जुमलों और परिभाषाओं  से वास्तव में  देश की अधिकांश जनता अनभिज्ञ एवं वंचित हैं। इन स्थितियों में देश के विकास और करोड़ों नागरिकों के जीवन और भविष्य का निर्धारण कैसे होगा और कौन करेगा? यह प्रश्न आम नागरिकों को परेशान किए हुए है।

(अमिताभ शुक्ल अर्थशास्त्री हैं और आजकल भोपाल में रहते हैं।)

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