Wednesday, August 10, 2022

प्रतिबद्ध न्यायपालिका: इंदिरा गांधी का आपातकालीन सपना मोदी राज में हो रहा है साकार

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करीब साढ़े चार दशक पहले आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तो महज मंशा जाहिर की थी कि न्यायपालिका को सरकार के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए, लेकिन उनकी यह मंशा पिछले कुछ वर्षों से मूर्तरूप लेती दिख रही है। सर्वोच्च और उच्च अदालतों के न्यायाधीश न सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी करते हुए प्रधानमंत्री की तारीफ कर रहे हैं बल्कि उनके फैसले भी सरकार और सत्तारूढ़ दल की मंशा के मुताबिक आ रहे हैं। ऐसा सिर्फ संवैधानिक और नीतिगत मामलों में ही नहीं बल्कि आपराधिक मामलों में भी हो रहा है। यह भी कम चिंताजनक बात नहीं है कि सरकार की ओर से न्यायपालिका को नसीहत देते हुए साफ शब्दों में कहा जाता है कि अदालतें किसी भी मामले में फैसला देते वक्त व्यावहारिक रुख अपनाएं और वैसे ही फैसले दें, जिन पर अमल किया जा सके (27अक्टूबर 2018 को गृह मंत्री अमित शाह का बयान)।

पिछले कुछ दिनों का रिकॉर्ड उठा कर देखें तो पता चलता है कि कुछ उच्च अदालतें तो भाजपा नेताओं और भाजपा से करीबी संबंध रखने वाले पूर्व नौकरशाहों व अन्य लोगों को राहत देने और विपक्षी पार्टियों के नेताओं की नकेल कसने के लिए ही बैठी हैं। अपवाद के तौर पर भी किसी भाजपा नेता या भाजपा से जुड़े व्यक्ति को अदालत ने निराश नहीं किया है। गंभीर से गंभीरतम आपराधिक मामलों में फंसे जिस भी व्यक्ति ने राहत मांगी है, उसे राहत मिली है। उसी तरह अपवाद स्वरूप भी किसी विपक्षी नेता को राहत मिलना तो दूर, उलटे उसे अदालत की सख्ती का सामना करना पड़ा है।

यह भी देखने में आ रहा है कि भाजपा विरोधी राज्य सरकारें अगर किसी भाजपा नेता, अधिकारी, पूर्व अधिकारी या कारोबारी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई शुरू करती हैं तो उसे आनन-फानन में अदालतों से राहत मिल जाती है। लेकिन उसी राज्य सरकार के किसी मंत्री, नेता या अधिकारी के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियां कार्रवाई करती हैं तो उनको कोई राहत नहीं मिलती है। हो सकता है कि यह संयोग हो लेकिन यह संयोग एक-दो नहीं, अनेक मामलों में हुआ है।

अफसोस की बात यह है कि इस स्थिति में बदलाव या सुधार करने के बजाय न्यायपालिका के शीर्ष की ओर से शिकायत की जा रही है कि जजों पर आरोप लगाना या उन्हें बदनाम करना अब एक फैशन बन गया है। कुछ दिनों पहले (8 अप्रैल, 2022 को) सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने एक मुकदमे की सुनवाई करते हुए कहा था कि देश में जजों को बदनाम करने का चलन सा शुरू हो गया है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि अदालतों के फैसलों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।

प्रधान न्यायाधीश की इस टिप्पणी के कुछ ही दिनों बाद (23 मई, 2022 को) सुप्रीम कोर्ट के ही जज डीवाई चंद्रचूड़ ने भी इसी से मिलती जुलती टिप्पणी करते हुए कहा कि जजों पर आरोप लगाने और उन पर जानलेवा हमले करने का चलन तेजी से बढ़ते हुए ‘फैशन’ का रूप लेता जा रहा है, जो कि बहुत चिंताजनक है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह टिप्पणी अवमानना के मामले में एक वकील को 15 दिन की कैद की सजा देने के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए की थी।

यह सही है कि हाल के वर्षों में हाई कोर्ट और निचली अदालतों के जजों पर हमले की कई घटनाएं हुई हैं। हमले चाहे जिन वजहों से हुए हों, लेकिन सभ्य समाज में इन्हें जायज नहीं माना जा सकता। इसलिए इस सिलसिले में जस्टिस चंद्रचूड़ की चिंता से कोई भी असहमत नहीं हो सकता। यह सभी राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे जस्टिस चंद्रचूड़ की चिंता को गंभीरता से लेते हुए अपने-अपने सूबों में जजों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। लेकिन जहां तक जजों पर आरोप लगाने या उन्हें बदनाम करने और अदालतों के फैसलों को गंभीरता से न लेने की बात है, इस पर तो खुद जज समुदाय को ही सोचना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

ज्यादा पहले न भी जाएं और हाल के दिनों की ही बात करें तो सिर्फ निचली अदालतों और हाई कोर्टों ने ही नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कई ऐसे अजीबोगरीब फैसले दिए हैं या मामलों की सुनवाई के दौरान अतार्किक टिप्पणियां की हैं, जिनसे अदालतों की मंशा और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।

मिसाल के तौर पर महज चार महीने पुरानी बात है। पंजाब के अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया पर नशे की तस्करी कराने और तस्करों को शरण देने जैसे गंभीर आरोप हैं। मामले में उनकी गिरफ्तारी होनी तय थी, जिससे बचने के लिए उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की शरण ली। उन पर आरोप चूंकि गंभीर थे इसीलिए हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत खारिज कर दी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 31 जनवरी को उनकी गिरफ्तारी पर 23 फरवरी तक के लिए रोक लगा दी ताकि वे विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया में हिस्सा ले सकें। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में लोकतंत्र की दुहाई देते हए कहा, ”हम एक लोकतंत्र हैं, जहां राजनेताओं को चुनाव में नामांकन दाखिल करने की अनुमति दी जानी चाहिए और ऐसी धारणा नहीं बनना चाहिए कि दुर्भावना से प्रेरित होकर मुकदमे दायर किए गए हैं।’’

यह सही है कि किसी व्यक्ति पर जब तक आपराधिक आरोप साबित न हो जाए तब तक उसे चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से नहीं रोका जा सकता। आपातकाल के दौरान समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीज पर राजद्रोह का आरोप था और वे जेल में बंद थे लेकिन उन्होंने जेल में रहते हुए ही चुनाव लड़ा था और जीते थे। बाद में सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा वापस लिया। ऐसे भी कई मामले हैं जिनमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों ने भी जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा है। इसलिए विक्रम मजीठिया की अगर गिरफ्तारी हो भी जाती तो उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा कर उन्हें राहत प्रदान की। कहा जा सकता है कि यह अदालत के विवेक का मामला है।

लेकिन ऐसे ही मामले में इसके ठीक उलट अदालत ने एक फैसला इसी महीने राज्यसभा चुनाव के सिलसिले में दिया। मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में जेल में बंद महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक और पूर्व मंत्री अनिल देशमुख को बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्यसभा चुनाव में मतदान करने की अनुमति नहीं दी। मलिक और देशमुख ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें या तो निजी मुचलके पर एक दिन के लिए हिरासत से रिहा कर दिया जाए या पुलिस एस्कॉर्ट के साथ मतदान के लिए विधानसभा भवन तक जाने की अनुमति दी जाए, लेकिन उनकी याचिका पहले निचली अदालत ने और बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने खारिज कर दी।

सवाल है कि चुनाव लड़ना किसी भी व्यक्ति का लोकतांत्रिक अधिकार है तो क्या मतदान करना व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत नहीं आता है? सिर्फ सजायाफ्ता व्यक्ति को ही इस अधिकार से वंचित किया जा सकता है। चूंकि मलिक और देशमुख के खिलाफ मामला अभी विचाराधीन है, इसलिए जाहिर है कि उन्हें राज्यसभा चुनाव में मतदान की अनुमति न देने से उनके लोकतांत्रिक अधिकार का हनन हुआ। यही नहीं, उन्हें मताधिकार से वंचित करने का सीधा असर चुनाव के नतीजे पर भी पड़ा और केंद्र में सत्तारूढ़ दल को फायदा हुआ। इस मामले में विक्रम मजीठिया के मामले की तरह अदालत को लोकतंत्र की याद नहीं आई।

यह तो हुआ विरोधाभास से भरे फैसले का एक उदाहरण। हाल के ही दिनों में कुछ मामलों में सुनवाई के दौरान अदालतों की टिप्पणियां भी बेहद हास्यास्पद और हैरान करने वाली रही हैं। मसलन यूएपीए के तहत जेल में बंद जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट के दो जजों ने ‘इंकलाब’ और ‘क्रांतिकारी’ जैसे शब्दों को भड़काऊ और उत्तेजना फैलाने वाले तथा प्रधानमंत्री के संदर्भ में ‘जुमला’ और ‘चंगा’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को अमर्यादित करार दिया था। इसी तरह दिल्ली में साल 2020 में हुए सांप्रदायिक दंगे के मामले में एक केंद्रीय मंत्री और एक भाजपा सांसद के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने ही आरोपियों के बचाव में कहा था कि अगर भड़काऊ लगने वाली कोई बात मुस्कुराते हुए कही जाती है तो वह अपराध नहीं है लेकिन अगर वही बात आक्रामक रूप से गुस्से में कही जाए तो उसे अपराध माना जा सकता है।

सांप्रदायिक नफरत फैलाने के एक अन्य मामले में भी पिछले दिनों दो आरोपियों को जमानत देते हुए दिल्ली की एक निचली अदालत ने बेहद हास्यास्पद दलील दी। ‘सुल्ली डील’ और ‘बुल्ली डील’ एप पर मुस्लिम समुदाय की बुद्धिजीवी महिलाओं और महिला पत्रकारों की तस्वीरें डाल कर उनकी बोली लगाने जैसे घृणित अपराध के दोनों आरोपियों को जमानत देते हुए दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कहा कि ”चूंकि आरोपियों ने पहली बार कथित रूप से कोई अपराध किया है और मुकदमे के ट्रायल में काफी समय लगेगा, इसलिए उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रखना उनके भावी जीवन की भलाई के लिए ‘मानवीय आधार’ पर उचित नहीं होगा।’’

इससे पहले पिछले साल बलात्कार के एक मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने आरोपी को महज इस आधार पर जमानत दे दी कि वह आईआईटी का छात्र है। हाई कोर्ट ने जमानत मंजूर करते हुए कहा कि आरोपी एक होनहार छात्र है और देश के लिए भविष्य की संपत्ति है, इसलिए आरोप तय होने के बाद उसे हिरासत में रखना उचित नहीं होगा।

इन पक्षपातपूर्ण फैसलों और टिप्पणियों के अलावा हाई कोर्ट के कई जजों की अवैज्ञानिक और हास्यास्पद टिप्पणियों ने भी हाल के वर्षों में खूब सुर्खियां बटोरी हैं। मसलन कुछ साल पहले 2017 में राजस्थान हाई कोर्ट के जज महेशचंद्र शर्मा ने एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान बगैर किसी संदर्भ के कहा था ”मोर इसलिए राष्ट्रीय पक्षी है, क्योंकि वह ब्रह्मचारी होता है। वह मोरनी के साथ सहवास नहीं करता। मोरनी उसके आंसू पीकर गर्भवती होती है। यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने माथे पर मोर पंख लगाते थे।’’

इसी सिलसिले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर कुमार यादव की गाय को लेकर की गई टिप्पणी को भी याद किया जा सकता है। जस्टिस यादव ने पिछले साल सितंबर महीने में गायों की तस्करी के आरोपी एक व्यक्ति की जमानत याचिका की सुनवाई करते हुए कहा था कि गाय ही एकमात्र ऐसा पशु है जो ऑक्सीजन छोड़ता है। न्यायमूर्ति यादव ने सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु और गोरक्षा को हिंदुओं का मौलिक अधिकार घोषित करने का भी अनुरोध किया था।

यही नहीं, इन्हीं जस्टिस यादव ने पिछले दिसंबर महीने में एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बगैर किसी संदर्भ के प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि कोरोना के खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री और चुनाव आयोग को उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव टालने पर विचार करना चाहिए। हाई कोर्ट का चुनाव आयोग से चुनाव टालने का अनुरोध तो एक बार समझ में आता है लेकिन प्रधानमंत्री से इस आशय का अनुरोध किए जाने का औचित्य समझ से परे है, क्योंकि चुनाव टालने या करवाने में प्रधानमंत्री की औपचारिक या संवैधानिक तौर पर कोई भूमिका नहीं होती है। यह मामला सिर्फ और सिर्फ चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है। गौरतलब है कि जस्टिस यादव के पहले भाजपा के भी कुछ वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश में चुनाव टालने की मांग कर चुके थे, इसलिए जस्टिस यादव के चुनाव टालने संबंधी सुझाव के राजनीतिक निहितार्थ तलाशा जाना स्वाभाविक थे और तलाशे भी गए।

विरोधाभासों से भरे या पक्षपातपूर्ण दिखने वाले ऐसे अदालती फैसलों और जजों की अजीबोगरीब टिप्पणियों के और भी कई मामले हैं। लेकिन यह चंद उदाहरण पर्याप्त हैं, यह समझने के लिए जजों पर आरोप लगाने के ‘फैशन’ को बढ़ावा कहां से और क्यों मिल रहा है!

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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