इन्साफ़ की कब्र पर सियासत का जयघोष

भारत में जब भी किसी कुख्यात अपराधी का एनकाउंटर होता है, तो जनता के बीच दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं- एक वर्ग इसे “त्वरित न्याय” मानकर ताली बजाता है, जबकि दूसरा इसे क़ानून के शासन और न्याय प्रक्रिया का उल्लंघन मानकर आलोचना करता है। यह विभाजन केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक समझ, न्याय की अवधारणा और व्यवस्था की क्षमता पर प्रश्न है। अपराध, एनकाउंटर, समाज, व्यवस्था और राजनीति – ये पांचों तत्व एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं और इनकी आपसी साठ-गांठ भारत के लोकतंत्र की सेहत का पैमाना बन गई है।

अपराध: केवल कानून का उल्लंघन नहीं, सामाजिक असमानता का प्रतिबिंब

अपराध केवल एक व्यक्ति की क़ानून तोड़ने की हरक़त नहीं होता, वह अक्सर समाज की विफलताओं का परिणाम होता है। बेरोज़गारी, जातीय भेदभाव, ग़रीबी, शिक्षा का अभाव, और अवसरों की असमानता- ये सभी अपराध के मूल में होते हैं। एक दलित युवक अगर चोरी करता है, तो यह केवल आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसने उसे शोषण और वंचना के दलदल में झोंक दिया है।

वहीं, जब कोई उच्च वर्ग या राजनीतिक संरक्षण प्राप्त व्यक्ति आर्थिक घोटाला करता है, तो उसकी रिपोर्टिंग भी इस तरह”सफेदपोश अपराध” के तौर पर होती है कि मानो अपराध भी वर्ग विभाजन के अधीन हो गया हो।

एनकाउंटर: न्याय या भीड़ की ताली के पीछे की व्यवस्था की हार ?

एनकाउंटर को अक्सर “इंस्टेंट जस्टिस” यानी त्वरित न्याय कहकर समाज में लोकप्रियता मिलती है। लोग मानते हैं कि न्याय प्रणाली धीमी है, भ्रष्ट है, और अपराधी बच निकलते हैं। लेकिन, सवाल यह उठता है कि क्या एनकाउंटर उस खोखली न्याय प्रणाली का विकल्प हो सकता है ?

हैदराबाद रेप केस (2019) में जब चार आरोपियों का पुलिस ने एनकाउंटर किया, तो लाखों लोगों ने जश्न मनाया। पर जब सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने उस एनकाउंटर पर सवाल उठाए, तब यह स्पष्ट हुआ कि भावनाओं की भीड़ और न्याय की प्रक्रिया में फर्क होता है।

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के तहत हुए 10,000 से अधिक एनकाउंटर और इनमें मारे गए 200 से ज़्यादा लोगों की सूची बताती है कि एनकाउंटर अब ‘राज्य नीति’ बनता जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न सामने आ जाता है कि क्या यह अपराध रोकता है या केवल राजनीति को ताकतवर बनाता है ?

समाज: ताली बजाता है या चुपचाप डरता है?

भारतीय समाज में जब अपराधी को गोली मारी जाती है, तो लोग इसे “न्याय” मान लेते हैं। लेकिन, यह मान्यता व्यवस्था में गहरे अविश्वास को दर्शाती है। न्यायालय में वर्षों तक मुकदमा लड़ने से बेहतर लोग एनकाउंटर को समाधान मानते हैं। यही सामाजिक सहमति लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट बनती जा रही है।

जब समाज न्याय नहीं, बल्कि बदला चाहता है, तो वह अपराध के ख़िलाफ नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध खड़ा होता है। आज भारत में गवाह चुप हो जाते हैं, पीड़ित डर जाते हैं, और समाज मूकदर्शक बना रहता है, क्योंकि सबको यही लगता है कि उनकी कोई नहीं सुनेगा।

व्यवस्था: नपुंसक न्याय प्रणाली या सत्ता की कठपुतली?

भारतीय न्याय प्रणाली की जटिलता, विलंब, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप ने लोगों का विश्वास तोड़ा है। एक मुकदमे में वर्षों लग जाते हैं, और अंततः न्याय मिलना ही संदेहास्पद हो जाता है। पुलिस का राजनीतिकरण, सीबीआई जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल इस व्यवस्था की जड़ें खोखली कर रहे हैं।

जब जांच एजेंसियां सत्ता के इशारे पर काम करती हैं, तो अपराधियों के ख़िलाफ कार्रवाई सबूतों और कानून पर न होकर ‘राजनीतिक सुविधा’ पर निर्भर हो जाती है। यही कारण है कि एक ही अपराध में कोई जेल चला जाता है, जबकि कोई मानवीय या मंत्री बन जाता है।

राजनीति: अपराध का संरक्षण या अपराधीकरण की राजनीति?

भारत की राजनीति अब अपराधियों से भरी है। 2024 के लोकसभा चुनावों में चुने गए सांसदों में से 43% पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे अनेक गंभीर अपराध शामिल हैं। जब राजनीति अपराधियों को टिकट देती है, तो लोकतंत्र ख़ुद ही अपराध में लिप्त हो जाता है:

एनकाउंटर भी अब ‘राजनीतिक नैरेटिव’ का हिस्सा बन जाता है 

“हम गोली मारते हैं” वाली भाषा चुनावी सभाओं में वोट बटोरने का तरीका बन गई हैं।

एक जाति विशेष का अपराधी मारा जाए, तो दूसरी जाति इसका चुनावी लाभ उठाती है।

यह राजनीति कानून का शासन नहीं, “राज्य की दया” और “शक्तिशाली नेता” के नाम पर डर का शासन स्थापित कर रही है।

मीडिया और पब्लिक ओपिनियन: भीड़तंत्र बनाम लोकतंत्र

मीडिया का एक वर्ग ‘एनकाउंटर’ को लाइव तमाशा बना देता है, जिसमें अपराधी की पृष्ठभूमि से ज़्यादा पुलिस की बहादुरी और नेता की सख्ती दिखाई जाती है। सोशल मीडिया पर #JusticeServed ट्रेंड करता है, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि क्या न्यायिक प्रक्रिया का पालन हुआ ?

भीड़तंत्र अगर किसी को दोषी मान ले, तो मीडिया उस पर मुहर लगा देता है। नतीजा यह होता है कि क़ानूनी प्रक्रिया केवल दिखावे की रह जाती है।

सज़ा नहीं, सुधार चाहिए; गोली नहीं, व्यवस्था में बेहतरी चाहिए 

अपराध के विरुद्ध सख्ती होनी चाहिए, लेकिन वह संविधान और क़ानून की मर्यादा के भीतर होनी चाहिए। एनकाउंटर ‘समस्या’ का समाधान नहीं, बल्कि ‘समाधान की असमर्थता’ का प्रमाण है।

किसी लोकतांत्रिक समाज में अपराध का मुकाबला केवल पुलिस से नहीं, शिक्षा, रोजगार, न्याय, और सामाजिक समानता से होता है; एनकाउंटर नहीं, निष्पक्ष और त्वरित न्याय प्रणाली चाहिए; अपराधी कोई भी हो, राजनीतिक, जातीय या धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर उसे न्याय के कटघरे में लाना होगा। अगर हम वाकई न्यायप्रिय समाज बनाना चाहते हैं, तो भीड़ की तालियों के नहीं, संविधान की मर्यादा के साथ चलना होगा। अन्यथा, अपराध और राजनीति का यह गठजोड़ भारत को एक भयभीत राष्ट्र में बदल देगा, जहां व्यवस्था केवल ताकतवरों के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाएगी। इससे निजात पाने के लिए सबसे अधिक ज़रूरी है कि अपराध और राजनीति के इस गठबंधन को समाप्त करने के लिए समाज को स्वयं जागरूक होना होगा। जब तक हम न्याय और व्यवस्था में विश्वास नहीं करेंगे, तब तक न कोई अपराधी मरेगा और न ही अपराध, बल्कि मरेंगे तो केवल वे लोग, जो न्याय के भरोसे ज़िंदा रहते हैं।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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