‘अपरूपा’ : भारतीय क्रांति का अकल्पित दुःख 

कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें बिना रोये पढ़ना बहुत मुश्किल होता है। ऐसी ही एक किताब पढ़ी ‘अपरूपा’। हरेक पन्ना मौत की गंध से भारी। वह भारीपन सीधे उतर आता है कलेजे में, और तरल हो कर आंखें नम हो जाती है। मौत पर दार्शनिक कवितायें तो बहुत सी नज़र आ जाती हैं। लेकिन मौत पर शोक में डूबी कहानियां मैंने पहली बार पढ़ी। ये सिर्फ़ मौत नहीं है ये शहादत की निरंतरता की कहानियां हैं। पद्मा कुमारी द्वारा मूलतः तेलुगु में लिखीं ये 11 कहानियां आप को आंसुओं के समुन्दर में उतार देती हैं और आप लम्बे समय तक उसमें डूबे रहते हैं। 

किसी आन्दोलन के तरीकों से आपकी सहमति/असहमति हो सकती है। लेकिन इस बात से शायद ही किसी की असहमति होगी कि एक इंसान का हक होता है कि मरने के बाद उसका सम्मानजनक तरह से अंतिम संस्कार किया जाए, उसे अंतिम विदाई दी जाए। मौत के बाद एक सम्मानजनक संस्कार की तस्दीक अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में भी दर्ज है। लेकिन हमारे देश में इसका पालन नहीं होता। 

देश के ह्रदय में बसे बस्तर के जंगलों में चल रहा है एक युद्ध। उस युद्ध में रोज़ ढेरों मौतें हो रही हैं। ज़ाहिर सी बात है उनमें मौतें इंसानों की हो रही हैं। उन इंसानों की माएं हैं, बाप हैं, भाई हैं, बहन हैं, दोस्त हैं और परिवार वाले हैं। वे बेशक लड़ने के लिए जंगलों में चले गए । उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े को बरसों बरस नहीं देखा, लेकिन उनकी मौत की खबर जब उन तक पहुँचती है, तो उनके शोक की चीख़ों से आसमान कांपने लगता है। 

लेकिन शायद उनकी चीखें ‘हिंदी’ तक नहीं पहुँच पातीं। क्योंकि वह चीखें तेलुगु में होती हैं, गोंडी में होती हैं और अन्य आदिवासी बोलियों में होती हैं। हिंदी का अधिकांश मध्यवर्ग उनके प्रति उदासीन बना रहता है। उनके लिए ये एक मुठभेड़ की खबर मात्र होती है। उनके लिए वह कहानियां माँ का शोकगीत नहीं होती, जिन पर गीत लिखा जायें…

जैसा किताब का प्राक्कथन लिखते हुए तेलुगु के प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक एन. वेणुगोपाल लिखते हैं –

‘लंबे समय की साथी प‌द्मा द्वारा लिखित यह अद्भुत कहानी संग्रह ‘अपरूपा’ एक ही बार में पढ़ना आसान नहीं। कम से कम मेरे लिए तो यह बहुत कठिन रहा। देखने में यह मात्र 160 पन्नों का, ग्यारह कहानियों का संकलन है, लेकिन हर कदम, हर शब्द, हर वाक्य लहू के आंसुओं की बूंदों से भीगा हुआ है। सिर्फ आंखों के लिए ही नहीं, बल्कि इस यात्रा के दौरान पैरों, शरीर और मन पर भी उसकी तपिश महसूस होती है। इसे पढ़ते समय सांसें थम सी जाती हैं। मेरे लिए तो एक भी पेज ऐसा नहीं था जिसे बिना आंखें नम किए, बिना हृदय पिघले पलट सकूं। हर कहानी में कोई न कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परिचित व्यक्ति, कोई भूला-बिसरा मित्र, कोई साथी-सहेली, उनके आत्मीय संबंधी मौजूद हैं। उनकी पीड़ा, उनके आंसू अक्षरों के बीच से बहते हुए हमारे गालों तक आते रहते हैं। जब पन्ने पलटते हैं, तो उंगलियों के सिरों पर आंसुओं की नमी, त्याग से भरी उष्ण रक्तधार, सूखे लहू की खुरदुरी परतें चिपकी ही रहती हैं।’

इस संग्रह की सारी की सारी कहानियां हमें एक ऐसे सच से रूबरू कराती हैं, जिन्हें हम नहीं जानते, या नहीं जानना चाहते। लेकिन मौत एक ऐसी हक़ीक़त है जिसे झुठलाना बहुत मुश्किल है। 

संग्रह की दूसरी कहानी है ‘खुद्बुदाती राहें।’  धनलक्ष्मी पितृसत्ता की सताई हुई, माँ के पास वापस आ जाती है। उसका छोटा सा बेटा है। माँ बाप चाहते हैं वह फिर से ब्याह कर ले। उसका भाई जो आन्दोलन में भूमिगत होकर जंगल में संघर्ष कर रहा है, अपनी बहन को बंधनों से आज़ाद होने के लिए प्रेरित करता है। बाद में वह फैसला करती है, वह भी आन्दोलन में अपना योगदान देगी। भाई के बुलावे पर वह जंगल की कठिन यात्रा पार कर के भाई के पास पहुँचती है तो पाती है उसी रात उसके भाई को गोली लगती है। उसकी आँखों के सामने उसकी खुली आँखें बंद हो जाती हैं, मानो वह अपनी बहन का ही इंतज़ार कर रही थीं।

कहानी पढ़ कर आप धक् से रह जाते हो। सच में ये राह इतनी आसान नहीं। ऐसा दूर से लगता था। इन कहानियों को पढ़ कर लगता है आप आग का दरिया पार कर रहे हो, जिसकी लपटें आप तक न पहुंचें, हो ही नहीं सकता। 

वेणुगोपाल के अनुसार 

‘इस कहानी संग्रह का जन्म तब हुआ जब अमर शहीदों के परिजनों और मित्रों का एक संगठन बनाया गया, जिसका उद्देश्य था शहीदों के अंतिम संस्कार को सम्मानजनक रूप से सम्पन्न किया जाए। और उनके परिजनों, मित्रों और अपने प्रियजनों को अंतिम बार स्नेह और सम्मान से देखने का अवसर मिले। लेकिन इस मानवीय इच्छा को भी क्रूर सत्ता ने बड़ी निर्दयता से कुचल दिया, और जो भीषण अत्याचार हुआ, वही इन कहानियों की कथावस्तु बनी।’

क्रांतिकारियों का शव परिजनों को न सौंपने की बात कोई आज की नहीं है। हम याद करें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत! उसके बाद अंग्रेजों ने उनके शव को रातों रात जेल से निकाल कर सतलज के किनारे टुकड़े-टुकड़े कर के जला दिया। तब से आज तक ये रवायत ज़ारी है। राज्य की क्रूरता और शहादत दोनों अपनी ऊंचाई पर हैं। 

हाल ही में सीपीआई (माओवादी) के महासचिव वसवराजू एक मुठभेड़ में मारे गए। उनके परिजन तमाम मुश्किलों का सामना करके शव लेने के लिए वहां पहुंचे। पुलिस प्रशासन ने उन्हें ‘पोस्ट मार्टम’ के बहाने उन्हें कई दिन लटका के रखा। अंततः परिवार वाले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से शव प्राप्त करने का आदेश लेकर आये, इसके बावजूद पुलिस ने उनके शव को परिवार वालों को नहीं सौंपा। और आंध्र प्रदेश के सभी कामरेडों के शव को सड़ने के बाद उस पर मिट्टी का तेल डाल कर जला दिया। उनके परिजन अपने रीति रिवाजों के आधार पर उनकी सम्मानजनक तरीके से अंतिम संस्कार करने का इंतज़ार ही करते रहे। ऐसा करके उन्होंने कोर्ट के आदेश और अंतर्राष्ट्रीय नियमों को भी उसी आग में भस्म कर दिया। घर पर उनकी 90 साल की माँ अपने बेटे को अंतिम बार देखने के लिए तरसती रह गई। 

‘बस्तर टाकीज़’ नामक यूट्यूब चैनेल में इस मुठभेड़ की पूरी रिपोर्ट मौजूद है। 

ये घटना तो 2025 की है। 2013 में ‘अरुणतारा’ में छपी एक कहानी ‘यात्रा’  का संकलन इस संग्रह ‘अपरूपा’ में है। जो इसी घटना को हूबहू दोहराती है। जंगल में शहीद हुए किसी अपने का शव लेने के लिए परिजन एम्बुलेंस लेकर जंगल की कठिन यात्रा करते हैं, और अंत में प्रशासन उन्हें शव नहीं सौंपता है। जब सौंपता है तो वह इस हालत में नहीं है कि उन्हें वापस इतनी लम्बी यात्रा करके ले जाया जा सके। शव सड़ चुका है, उनमें कीड़े पड़ गए हैं। अंततः, उन्हें वहीं दफना दिया जाता है। 

उसका एक सजीव चित्रण देखिये –

‘तीन आदिवासी आकर उस पेटी का मुंह खोलते हैं। दुर्गंध की तेज भभक उठती है…

पांच मिनट तक कोई उधर नहीं जाता है।

मल्लारेड्डी (भाई) अपने-आपको न रोक सबसे पहले वहां जाता है। इसके बाद हम भी वहां जाते हैं। पेटी पीले रंग के झाग से भरी हुई है। उसमें पॉलीथीन में लिपटाकर रखा शव दिखलायी देता है।  

‘चेहरा दिखलाओ’ कहते हैं।

तहसीलदार आदिवासियों की तरफ देखता है।

वे एक लम्बी छड़ी लेकर मुख के ऊपर ढंके पॉलीथीन को हटाते हैं। गोल गेंद की तरह का सिर दिखलायी पड़ता है। सांबिरेड्डी का शव ही है।

पहचानने के लिये चेहरा नहीं दिखलायी पड़ रहा है। भला कैसे पहचानते?

मल्लारेड्डी रो पड़ता है। इस सफर के आरंभ से ही वह विषाद से भरा हुआ लग रहा था। परन्तु अब उसके दुःखों का बांध टूट चुका था। राजेश्वरी और पद्मा भी फूट-फूटकर रोने लगते हैं। राजरेड्डी एक तरफ खड़ा होकर मौन रुदन कर रहा है।

‘पांच दिन से व्याकुल होने के बाद तीन दिन का सफर करके आये हैं। यही देखने के लिये? आदमी का शव ऐसे रखते हैं क्या?…’  यह दुःख उनके बर्दाश्त से बाहर सा हो जाता है।’ 

(यात्रा, 2016)

आप संघर्ष के तरीकों पर कई दिनों तक विमर्श कर सकते हैं। हिंसा/अहिंसा की बहस में बरसों उलझे रह सकते हैं और खुद संघर्ष से बच सकते हैं। लेकिन आप उस शोक को कैसे नकार सकते हैं जो उपरोक्त उद्धरण में मौजूद है। इस संग्रह में सारी कहानियों में शोक ही शोक है। पिता का शोक! भाई का शोक! बहन का शोक! दोस्तों का शोक! गाँव वालों का शोक! इन सबसे ऊपर है माँ का शोक! जो ख़तम ही नहीं होता। कहानी दर कहानी ये शोक बढ़ता ही जाता है। 

‘मृत्यु आदमी के जीवन से कितनी अठखेलियां खेलती है? मृत्यु कब आती है, यह नहीं कह सकते हैं। परन्तु मां की आंखों के सामने ही बच्चों के मरने से और बड़ा दुख इस दुनिया में और क्या हो सकता है? बेटे के शव को, आकारहीन रक्त के पिंड को हाथ में लेते समय उसे जन्म देने वाली मां का दिल किस तरह तड़पा होगा? लाड़-प्यार से पाले हुए उस बेटे को राज्य ने आंखों के सामने इतनी क्रूरता से मार डाला, कुछ भी न कर सकने वाली निःसहायता से वह मां ढेर हो गयी होगी।

उसने एक बार बतलाया था उसकी पैदाइश पर उसे इस संसार पर ही विजय पाने जैसी खुशी मिली थी। यह बात उसने अपने कोख को छूकर कहा था। बेटे के मर जाने पर मौत के दुख को ढोते समय भी।’ 

(सूनी गोद, 2016) 

माँ का शोक अनंत है…

‘…पर पुलिस वाले नहीं मान रहे हैं। कह रहे हैं यह उसका शव नहीं है। हमारा बेटा है कहकर बार-बार कहने के बावजूद वे नहीं सुन रहे हैं। शायद वे बेटे के शव को नहीं देंगे, मां इस भय में है।

“मां ने पहचाना है न। आप लोग कैसे नहीं मानेंगे?” वसंता कहती हैं।

“उन लोगों ने दूसरा नाम बतलाया है। गांव का नाम भी दूसरा बतलाया है।

तेलुगु और गोंडी में चल रहे इस संवाद और उनके हाव-भाव को देखकर वह वसंता के पास आकर अपनी भाषा में कहती है- “मेरा बिटवा ही है। अपने बेटे को मैं पहचान नहीं सकती हूं क्या?” परन्तु पुलिस वाले उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं देते हैं।

उसकी बात शायद सबको समझ में नहीं आ रही है, यह सोचकर वह रोते हुए उपस्थित लोगों को विश्वास दिलाने के लिये अपना स्तन बाहर निकाल बेटे के शव की तरफ दिखलाते हुए रोने लगती है। “मेरा बिटवा, मेरा दूध पिया बिटवा” कहकर बतलाने का प्रयत्न करती है। आंसू गालों से होते हुए उस मां के हृदय पर, स्तन चुचूकों पर बह रहे हैं। क्या है यह क्षोभ ? वसंता को ऐसे लगता है मानो उसके दिल को कोई पकड़कर मरोड़ रहा हो। मां को आलिंगन में ले कर वह जोरों से रो पड़ती….. साड़ी के पल्लू से उसकी उघड़ी छाती को ढंक देती है…’ 

(तीन माएं, 2019) 

माँ के अपार शोक के अलावा इस संग्रह में एक बहुत अच्छी कहानी है – ‘कांता पुन्नम चांदनी’। यह कहानी एक नए विमर्श को खोलती है। भारत का ‘मेनस्ट्रीम’ मीडिया यह प्रचारित करता है कि माओवादी पार्टी अपने सैनिकों की ज़बरदस्ती नसबंदी करवा देती है। सरेंडर किये हुए नक्सली दंपति के मुंह से वे यह सब कहलवाते हैं। 

इस कहानी में पद्मा ने वर्णन किया है कि कैसे स्क्वैड में एक युवक-युवती अपनी पसंद से विवाह करते हैं। कुछ समय बाद महिला गर्भवती हो जाती है। अब सुरक्षा और स्वास्थ्य कारणों से कांता का वहां रहना संभव नहीं है। कांता के मन और शरीर में मातृत्व हिलोरे मार रहा है। पुन्नम उसका पति, निर्णय उसके ऊपर छोड़ता है। 

‘जिस दिन उसे रवाना होना था उसके पहली रात में पुन्नम की कही हुई बातें उसे हूबहू अभी तक याद हैं। पैदा होने वाले बच्चे के प्रति उसके मन में प्यार उमड़ रहा है, यह सहज भी है, पुन्नम की समझ में आ रहा था। परन्तु इस आंदोलन में यह सब साध्य नहीं है। अति सहज मातृत्व के विषय में भी पार्टी को बहुत ही कठिन निर्णय लेना पड़ता है। इसलिये उसने कहा था- “कांता! तुझ में बच्चे के प्रति लगाव बढ़ रहा है यह मुझे समझ में आ रहा है, परन्तु हमने जो रास्ता अपनाया है उसमें यह रोड़ा है। आंदोलनकारियों को मातृत्व जैसी भावनाओं के आगे झुकना नहीं चाहिए। पर ऐसे विषय पर कठिन निर्णय लेने वाली पार्टी ने एक हद तक ही उस पर अमल किया है। तेरे विषय में पार्टी तुझे अपने निर्णय पर ही छोड़ दे रही है। परन्तु दल के एक सदस्य के तौर पर पार्टी के निर्णय के अनुसार तू अबार्शन करवाती है या बच्चा पैदा करती है यह निर्णय तू ही ले। सच पूछा जाए तो इस सब में मेरी पात्रता भी है, परन्तु एक स्त्री के तौर पर यह सब तुझे ही झेलना पड़ रहा है। यही बात मेरे मन में बहुत खटक रही है। पर कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं। इस समस्या ने हमारे आपसी संबंध में ही नहीं, आंदोलनकारी जीवन में भी उथल-पुथल मचा दिया है। इस उहापोह में हमारे स्वयं का खड़ा होना भी कष्टकारी बन गया है। अच्छी तरह से सोच-विचार कर ले। डॉक्टर से पूछकर अगर थोड़ी सी भी कहीं गुंजाइश है तो गर्भ गिरवा लेना।”’ 

(कांता, पुन्नम, चांदनी, 2015) 

कांता, डॉक्टर से मिलती है, खून की कमी के कारण एबॉर्शन संभव नहीं था। बच्ची चांदनी पैदा होती है। वह बच्ची को रिश्तेदारों के पास छोड़ कर वापस आन्दोलन में जाना चाहती है। कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। अंततः, बच्ची को पालने की ज़िम्मेदारी उसी को उठानी पड़ती है। आन्दोलन में सक्रिय हिस्सेदारी न कर पाने का मलाल उसे हमेशा रहता है। अभी वह व्यवस्थित हो ही रही थी कि एक एनकाउंटर में पुन्नम शहीद हो जाता है। एक महिला गुरिल्ला अपने मातृत्व और मक़सद के बीच कैसे आत्मसंघर्ष करती है, उसे इस कहानी ने अच्छे से उकेरा है। 

इस कहानी से इस विमर्श का रास्ता खुलता है कि दुनिया बदलने के रास्ते में ‘मातृत्व’ का त्याग अपनी शहादत देने से कहीं भी कम नहीं है। तमाम प्राकृतिक, शारीरिक कारणों से अंततः बच्ची को पालने की ज़िम्मेदारी माँ को ही उठानी पड़ती है। इसको देखते हुए हमें समझ में आता है कि बहुत से एक्टिविस्ट माँ-बाप बनने की अपनी सहज इच्छा का परित्याग क्यों करते हैं। 

और फिर अंत में एक बेहद मार्मिक कहानी है ‘अपरूपा’। शहीद माँ-बाप की शानदार बेटी, नानी-नाना, दादी-दादा, दोनों की देखभाल की ज़िम्मेदारी उठाती है।

कहानी की भूमिका लिखते हुए सीमा आज़ाद सही ही लिखती हैं  ‘ये कहानियां साधारण कहानियां नहीं हैं। ये कहानियां हिंदी के पाठकों, खासतौर पर हिंदी के पाठकों को एक ऐसी सच्चाई से ‘मुठभेड़’ कराती हैं, जो उनके लिए सिर्फ अखबारी और टीवी की खबर का हिस्सा है।’ 

ये सारी की सारी कहानियां हिंदी साहित्य के मध्यवर्ग के आस्वाद से परोसी जा रही कहानियों से इतर संवेदनशीलता और रचनात्मकता का ऐसा ताना-बाना रचती हैं जिनके भीतर जाकर सहज लौटना मुश्किल है। बेशक ये कहानियां हैं लेकिन ये सच के ऐसे धरातल से जन्मी हैं जिनकी ज़मीन हमारे मुल्क के भीतर ही है। 

इन कहानियों में सीधा राजनीतिक विमर्श नहीं लेकिन ऐसा साहित्य है जो मध्यवर्गीय भावुकता को तार-तार करता है। 

इन कहानियों में दुःख है, माँ का शोक है, लेकिन कहीं भी मरने वाले के प्रति अवमानना नहीं है। ये कहानियाँ बताती हैं कि क्रांतिकर्म एक बेहद रचनात्मक काम है, उनकी कहानियाँ कहना भी क्रांति के रचनाकारों का काम है। यह किताब हमें उससे रूबरू कराती है। बेशक इन कहानियों में शब्दों की जादूगरी  की बहुत गुंजाइश ही नहीं है। यहाँ शोक और दुःख को जताने के लिए बहुत सारे शब्दों की ज़रूरत ही नहीं है। जब माँ अपने स्तन अपने शहीद बेटे की ओर करती है तभी उस का दुःख अपनी समूची गहराई के साथ सामने आ जाता है। 

मुझे लगता है हिंदी जगत के साहित्य लिखने-पढ़ने वालों को इन कहानियों को ज़रूर पढ़ना चाहिए कि ये कहानियां अपने ही मुल्क में ये कहानियां घट रही हैं। रची जा रही हैं…

जिस जीवन में मौत आपकी सहचरी हो लगातार, वहां कहानियां लिखना या वहां की कहानियां लिखना आसान काम नहीं है। पद्मा ने बहुत लगन से इन कहानियों को तेलुगु में लिखा है और बहुत मन से हिंदी में अनुवाद किया है एनआर श्याम ने। इसे हम तक पहुँचाया है, क्रांतिकारी लेखक संघ (विरसम) ने। इस पुस्तक का मूल्य 200 रुपये है। 

ये कहानियां संघर्ष की शानदार कहानियां हैं। कहते हैं ‘क्रांति का काम फुलकारी करना नहीं है’, उसी तरह से क्रांति की कहानियां लिखना भी हर लिहाज से असाधारण काम है। 

(अमिता शीरीं लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।) 

Leave a Reply