सुप्रीम कोर्ट विधेयकों को स्वीकृति देने से संबंधित प्रश्नों पर संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा दिए गए संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट 22 जुलाई को सुनवाई करेगा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के फैसले पर 14 सवाल रखे हैं। राष्ट्रपति ने जानना चाहा है कि क्या राज्यपालों और राष्ट्रपति के कार्य न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं और क्या संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था न होते हुए भी उन पर समयसीमा थोपी जा सकती है।
दरअसल ‘बुलडोजर राज’ की तरह, ‘राज्यपाल राज’ भी एक घातक प्रवृत्ति है जो संविधान को नष्ट कर रही है। राज्यपाल, जो कि संवैधानिक रूप से राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करने के लिए बंधे हुए हैं, राज्य सरकारों विशेष रूप से विपक्षी दलों की सरकारों के प्रशासन में लगातार हस्तक्षेप करते रहे हैं और अवरोध पैदा करते रहे हैं। एक बार-बार होने वाली घटना यह थी कि राज्यपाल राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर अनिश्चित काल तक बैठे रहते थे, न तो उन्हें स्वीकृति देते थे और न ही उन्हें कारण बताकर वापस करते थे-प्रभावी रूप से विधायी प्रक्रिया को बाधित करते थे। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में, विधेयक तीन से चार साल तक अधर में लटके रहे।
आश्चर्यजनक रूप से, ये देरी केवल उन राज्यों में हुई जहाँ केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के विरोधी दल शासन करते थे, जिससे यह चिंता बढ़ गई कि केंद्र सरकार राज्यपाल को राज्य के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए एक एजेंट के रूप में इस्तेमाल कर रही है। दो मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत दांव पर थे – लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति के रूप में विधायिका की प्रधानता, और शासन का संघीय ढांचा।
तमिलनाडु मामले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर “पॉकेट वीटो” का प्रयोग नहीं कर सकते। साथ ही राज्यपाल के निर्णय के लिए तीन महीने की ऊपरी सीमा तय की।
न्यायालय ने आगे कहा कि यदि राज्यपाल द्वारा विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर कार्रवाई करनी होगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि समय-सीमा का उल्लंघन होता है तो राज्य सरकार न्यायालय से परमादेश याचिका (रिट) प्राप्त करने की हकदार होगी।
तमिलनाडु राज्य द्वारा दायर याचिका स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी घोषित किया कि राज्यपाल द्वारा एक वर्ष से अधिक समय से लंबित रखे गए दस विधेयकों को मानित स्वीकृति प्राप्त हो गई। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल को “अति संवैधानिक व्यक्ति” बनने तथा “केन्द्रीय मंत्रिमंडल के साथ मिलीभगत” करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ ने इस निर्णय की कड़ी आलोचना की और सवाल उठाया कि क्या न्यायालय को राष्ट्रपति को निर्देश जारी करने का अधिकार है। उपराष्ट्रपति ने तो अनुच्छेद 142 की शक्ति को न्यायपालिका के पास “परमाणु मिसाइल” तक कह दिया।
दरअसल संविधान के अनुच्छेद 163 में कहा गया है कि राज्यपाल अपने कार्यों का निष्पादन मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर करेंगे, “सिवाय इसके कि संविधान के तहत या उसके द्वारा उन्हें अपने विवेक से अपने कार्यों या उनमें से किसी का निष्पादन करने की आवश्यकता हो।”
जब संविधान सभा ने राज्यपाल को इस तरह का विवेक प्रदान करने की आवश्यकता पर बहस की, तो बीआर अंबेडकर ने कहा, विवेक सीमित प्रकृति का है और इसका प्रयोग केवल संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में ही किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 163 (तब मसौदा अनुच्छेद 143 के रूप में गिना जाता था) में शामिल किए जाने वाले शब्द थे ‘सिवाय इसके कि वह इस संविधान के द्वारा या उसके अधीन है’ और न कि ‘सिवाय इसके कि जहां भी वह सोचता है कि उसे मंत्रियों की इच्छा या सलाह के विरुद्ध विवेक की इस शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।’
राष्ट्रपति के संदर्भ में उठाए गए प्रश्नों में से एक यह है कि क्या न्यायालय न्यायिक रूप से राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित कर सकता है।
उठाए गए प्रश्न इस प्रकार हैं:-
1. जब भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के समक्ष कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है तो उसके सामने संवैधानिक विकल्प क्या हैं?
2. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल के समक्ष कोई विधेयक प्रस्तुत किए जाने पर वह मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह से बाध्य है?
3. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल द्वारा संवैधानिक विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायोचित है?
4. क्या भारत के संविधान का अनुच्छेद 361, भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल के कार्यों के संबंध में न्यायिक पुनर्विचार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है?
5. संवैधानिक रूप से निर्धारित समय-सीमा और राज्यपाल द्वारा शक्तियों के प्रयोग के तरीके के अभाव में क्या राज्यपाल द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत सभी शक्तियों के प्रयोग के लिए न्यायिक आदेशों के माध्यम से समय-सीमाएँ निर्धारित की जा सकती हैं और प्रयोग का तरीका निर्धारित किया जा सकता है?
6. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायोचित है?
7. संवैधानिक रूप से निर्धारित समय-सीमा और राष्ट्रपति द्वारा शक्तियों के प्रयोग के तरीके के अभाव में क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार के प्रयोग हेतु न्यायिक आदेशों के माध्यम से समय-सीमाएँ निर्धारित की जा सकती हैं और प्रयोग का तरीका निर्धारित किया जा सकता है?
8. राष्ट्रपति की शक्तियों को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक व्यवस्था के आलोक में क्या राष्ट्रपति को भारत के संविधान के अनुच्छेद 143 के अंतर्गत संदर्भ के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेने और राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए या अन्यथा आरक्षित रखने पर सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की आवश्यकता है?
9. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 और अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णय कानून के लागू होने से पहले के चरण में न्यायोचित हैं? क्या न्यायालयों के लिए किसी विधेयक के कानून बनने से पहले किसी भी रूप में उसकी विषय-वस्तु पर न्यायिक निर्णय लेना अनुमन्य है?
10. क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग और राष्ट्रपति/राज्यपाल के आदेशों को किसी भी प्रकार से प्रतिस्थापित किया जा सकता है?
11. क्या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल की अनुमति के बिना लागू कानून माना जाता है?
12. भारत के संविधान के अनुच्छेद 145(3) के प्रावधान के मद्देनजर, क्या इस माननीय न्यायालय की किसी भी पीठ के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह पहले यह निर्णय करे कि क्या उसके समक्ष कार्यवाही में शामिल प्रश्न ऐसी प्रकृति का है, जिसमें संविधान की व्याख्या के संबंध में विधि के महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं और उसे कम-से-कम पांच जजों की पीठ को भेजा जाए?
13. क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियाँ प्रक्रियात्मक कानून के मामलों तक सीमित हैं या क्या भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 ऐसे निर्देश जारी करने/आदेश पारित करने तक विस्तारित है, जो संविधान या लागू कानून के मौजूदा मूल या प्रक्रियात्मक प्रावधानों के विपरीत या उनसे असंगत हैं?
14. क्या संविधान, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 131 के अंतर्गत वाद के माध्यम से छोड़कर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी अन्य अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाता है?
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं)