यूपी में 5000 सरकारी स्कूलों के मर्जर पर हाईकोर्ट का स्टे; सरकार कोर्ट में स्पष्ट नहीं कर पाई इस प्रक्रिया का उद्देश्य

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के 5000 सरकारी स्कूलों के मर्जर की नीति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्टे लगा दिया है। लखनऊ बेंच की डिवीजन बेंच ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। अब मामले में अगली सुनवाई 21 अगस्त की तारीख लगाई है।

कोर्ट ने अगले आदेश तक सीतापुर जनपद में मौजूदा स्थिति को बरकरार रखने को आदेश दिया है। बता दें कि इससे पहले 7 जुलाई को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सरकार के फैसले को वैध ठहराया था। अब डिवीजन बेंच उस आदेश के खिलाफ सुनवाई कर रही है।

मर्जर के लिए क्या था सरकार का आदेश: 16 जून 2025 को बेसिक शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया कि जिन सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की संख्या 50 से कम है, उन्हें पास के बड़े या कंपोजिट स्कूलों में मर्ज किया जाए।सरकार ने कहा था कि यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2020 के तहत लिया गया है, ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो और छात्रों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

सीतापुर के 51 बच्चों ने सरकार के आदेश को हाईकोर्ट में दी चुनौती: सरकार के इस आदेश को सीतापुर की छात्रा कृष्णा कुमारी समेत 51 बच्चों ने 1 जुलाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद एक अन्य याचिका 2 जुलाई को दाखिल हुई। इसमें याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह आदेश शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) का उल्लंघन है।

बच्चों ने उठाए थे सवाल: याचिकाकर्ताओं ने कहा कि छोटे बच्चों के लिए दूर-दराज के स्कूलों तक पहुंचना मुश्किल होगा। इससे न सिर्फ पढ़ाई बाधित होगी बल्कि असमानता भी बढ़ेगी। कुछ स्कूलों के रास्ते में नदी, नाला, हाईवे या रेलवे लाइन भी हो सकते हैं, जिससे बच्चों की सुरक्षा को खतरा होगा।

मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने सरकार से पूछ लिया कि जब बच्‍चे ही स्‍कूलों में जाने के लिए रेडी नहीं है तो मर्जर किस प्रकार से किया जा रहा है और शिक्षकों पर भी दबाव किसलिए बनया जा रहा है? अदालत ने एक तरह से नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि आपकी तरफ से ना तो कोई सर्वे किया गया और ना ही आपके पास कोई प्‍लान है, तो इस तरह का फैसला क्‍यों लिया गया है?

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेशभर के 5,000 से अधिक प्राइमरी और जूनियर स्कूलों के विलय (मर्जर) की योजना को लेकर शिक्षकों, अभिभावकों और इससे जुड़े संगठनों में भारी नाराजगी है। उनका तर्क है कि यह फैसला न केवल बच्चों की शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन करता है, बल्कि उन्हें दूर स्कूलों तक पहुंचने के लिए मजबूर भी करेगा। वहीं राज्य सरकार का कहना है कि स्कूलों का मर्जर संसाधनों का बेहतर उपयोग और एजुकेशन क्‍वालिटी बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। पर शिक्षक संगठनों का दावा है कि इससे लाखों बच्चों की शिक्षा पर बुरा असर पड़ेगा, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां स्कूलों के बीच की दूरी पहले से ही अधिक है।

विलय के खिलाफ प्राथमिक शिक्षक संघ और अन्य संगठन लगातार सरकार से विरोध जता रहे हैं। सोमवार को लखनऊ में हजारों की संख्या में शिक्षक और कर्मचारी एकत्र हुए और स्कूल बचाओ, शिक्षा बचाओ नारे के साथ प्रदर्शन किया। शिक्षकों का आरोप है कि बिना किसी उचित योजना और ज़मीनी सर्वेक्षण के सरकार जल्दबाजी में फैसला ले रही है।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में कहा है कि RTE एक्ट के अनुसार, 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए एक तय दूरी के भीतर स्कूल होना अनिवार्य है। स्कूलों को मर्ज करने से कई बच्चों को 3-5 किलोमीटर दूर तक पैदल जाना पड़ेगा, जिससे उनकी उपस्थिति और सुरक्षा दोनों पर असर पड़ेगा। सरकार की ओर से दलील दी गई है कि कई स्कूलों में नामांकन बहुत कम है और शिक्षक अनुपात असमान है। इन स्कूलों को मर्ज कर बेहतर शिक्षण संसाधन और आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराया जाएगा। कुछ स्कूलों को पंचायत भवन, सामुदायिक केंद्र और लाइब्रेरी जैसी अन्य सुविधाओं में बदला जाएगा।

इसके पहले इस मामले में सिंगल बेंच ने 7 जुलाई को फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार का यह निर्णय बच्चों के हित में है। जब तक कोई नीति असंवैधानिक या दुर्भावनापूर्ण न हो, उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन अब हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच मामले में सुनवाई कर रही है, जिसने स्टे लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं। साथ ही अगली सुनवाई के लिए 21 अगस्त की तारीख तय की है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं)

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