एक थके प्रधानमंत्री का नफरती प्रलाप

कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लाल किले से दिया गया भाषण एक थके हुए प्रधानमंत्री का भाषण था। एक ऐसा प्रधानमंत्री जो हर तरफ से हारा हुआ है। उनकी पस्त हिम्मती उनके चेहरे पर बिल्कुल साफ दिख रही थी। वह जो कुछ बोल रहे थे उनकी शरीर और भाव भंगिमा उसका साथ देते नहीं दिख रहे थे। ऐसे में पूरा भाषण एक समय के बाद उबाऊ सा दिखने लगा था। दरअसल पीएम मोदी ने जनता से अपना कनेक्ट खो दिया है। जबकि अभी तक मोदी की यही यूएसपी हुआ करती थी। वह जनता के मूड को समझते थे और उसके मुताबिक अपना भाषण देते थे। लेकिन पीएम के हाथ से अब वह चीज जाती रही। ऐसे में लाल किले से दिया गया उनका भाषण न केवल मैकेनिकल किस्म का था बल्कि उसमें न तो कोई रस था और न ही किसी तरह का रंग और गंध।

बिल्कुल उदासीन भाषण। इसमें एक चीज महत्वपूर्ण है जिसे समझना लोगों के लिए बेहद जरूरी है। पहले पीएम मोदी को इस बात का पूरा भरोसा होता था कि वह जो बोल रहे हैं जनता उस पर विश्वास कर रही है। भले ही वह सब उनकी निगाहों में जुमला होता था। लेकिन इस बात का भरोसा था कि जनता उसको उस तरह से नहीं देखती है। लेकिन अब पीएम मोदी को भी यह बात समझ में आ गयी है कि उनके बोले गए शब्दों पर जनता को भी भरोसा नहीं है। ऐसी स्थिति में वक्ता अपना आत्मविश्वास खो देता है। वह जनता से सीधे नहीं जुड़ पाता है। जिसका असर वक्ता के पूरे भाषण पर पड़ता है। न तो उसमें कोई उत्साह दिखेगा और न ही कोई ऊर्जा। बस भाषण के लिए वह भाषण होगा।

दरअसल पिछले दिनों के घटनाक्रम ने प्रधानमंत्री की साख को बहुत बड़ा धक्का पहुंचाया है। अभी तक होता क्या था कि तमाम विपरीत परिस्थितियों और विपक्ष की घेरेबंदी के बावजूद आखिरी मौके पर पीएम मोदी अपने भाषण से महफिल लूट लिया करते थे। नतीजतन विपक्ष को दबने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता था। रही सही कसर उनका चौतरफा गुणगान कर गोदी मीडिया पूरा कर देता था। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद से जो उल्टी गिनती शुरू हुई है तो वह रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। मोदी ने आपरेशन सिंदूर को किया ही इसीलिए था कि वह अपने तमाम तात्कालिक संकटों से बाहर आ सकें। लेकिन कहते हैं सब कुछ आप की इच्छा के मुताबिक नहीं होता है। आपरेशन सिंदूर से कुछ लाभ मिलने की जगह वह खुद सरकार पर ही भारी पड़ गया।

इससे सरकार की न केवल अंतरराष्ट्रीय छवि पर बट्टा लगा बल्कि पाक और चीन से रिश्तों के संबंध में देश की कलई खुल गयी। देश को लेकर देशवासियों के बीच विश्व गुरू का जो नकली औरा बनाया गया था वह एक झटके में तार-तार हो गया। ऐसे में पूरा अभियान सरकार के लिए उल्टा पड़ गया। और अभी जबकि संसद का सत्र शुरू हुआ और विपक्ष ने जिस तरह से सरकार की घेरेबंदी शुरू की उससे निकलना सरकार के लिए मुश्किल पड़ रहा है। आपरेशन सिंदूर पर बहस में विपक्ष न केवल भारी पड़ा बल्कि पीएम मोदी लोकसभा के बाद राज्य सभा में अपना भाषण देने तक की हिम्मत नहीं जुटा सके। जिसका पूरे राजनीतिक गलियारे में बहुत गलत संदेश गया। और यह माना गया कि पीएम मोदी की जो अकेली यूएसपी थी भाषण की कला वह भी जाती रही। 

और इस बीच राहुल गांधी ने कर्नाटक चुनाव में एक लोकसभा क्षेत्र के आंकड़ों को सामने लाकर वहां हुए बड़े स्तर पर वोटों की हेरा-फेरी का जो खुलासा किया है वह अब तक के हुए सभी चुनावों पर सवालिया निशान खड़ा कर देता है। अभी तक जो लोग सवाल पूछते थे कि माहौल तो सरकार के खिलाफ था और लोगों ने वोट भी दिया था फिर सरकार कैसे बीजेपी की बन गयी। अब सभी लोगों को उन सवालों का उत्तर मिल गया है। आम लोग यह कहते नजर आ रहे हैं कि वोट की चोरी से यह सरकार बनी है। ऐसे में पीएम मोदी की जो रही-सही साख है वह भी अब डूबने के कगार पर है। और यह सब कुछ लाल किले पर दिए गए उनके भाषण में बिल्कुल साफ दिख रहा था। 

इन सबसे आगे बढ़कर पीएम मोदी का यह भाषण अब तक हुए तमाम भाषणों में सबसे ज्यादा जहरीला भी था। वैसे तो पीएम मोदी चुनाव या फिर किसी दूसरे मौके पर हिंदू-मुस्लिम करने और नफरत-घृणा फैलाने से सकुचाते नहीं हैं। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ जब वह लाल किले से इस तरह की कोई बात किए हों। अबकी बार का उनका भाषण नफरत और घृणा की चासनी में बिल्कुल लिपटा था। घुसपैठियों का सवाल उठाकर उन्होंने एक बार फिर से हिंदू-मुसलमान की तरफ इशारा किया। और इस मामले में उन्होंने देश की डेमोग्राफी तक बिगड़ने की बात कही। अब कोई पूछ सकता है कि पिछले 11 साल से आपकी सत्ता है।

इस दिशा में आपने क्या प्रयास किया? देश के अलग-अलग हिस्सों में आप लगातार छापा डालते हैं लेकिन उसका नतीजा सिफर होता है। जिन घुसपैठियों का हवाला देकर आप और चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर यानि गहन मतदाता पुनरीक्षण अभियान संचालित किया उसमें घुसपैठियों का अभी चुनाव आयोग ने कोई आंकड़ा नहीं पेश किया है। ऐसे में लाल किले से यह सब बोलकर आप क्या साबित करना चाहते हैं। अगर जमीन पर उसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है और कुछ है भी तो वह दाल में नमक के बराबर। फिर उसे इतना बड़ा मुद्दा बनाकर आप भला क्या हासिल कर लेंगे? लेकिन आपको भी पता है कि और कुछ मिले न मिले लेकिन सांप्रदायिक माहौल और वोटों के ध्रुवीकरण में इससे मदद ज़रूर मिल सकती है। लेकिन शायद यह गणित भी अब फेल होता नजर आ रहा है। लोगों को यह बात समझ में आ गयी है कि यह सरकार अपने किसी काम के बल पर नहीं बल्कि लोगों के बीच नफरत और घृणा फैलाकर देश पर राज करना चाहती है।

इसीलिए चाह कर भी बीजेपी-संघ किसी नफरती एजेंडे को आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। इसके कुछ ठोस संकेत भी आने लगे हैं। मसलन आपरेशन सिंदूर का पुलवामा की तरह कोई खरीदार नहीं मिला। बीजेपी-संघ चाहकर भी उसे देश का एजेंडा नहीं बना सके। इसी तरह से पिछले दिनों नफरती थीम पर बनी फिल्में बॉलीवुड के लिए तिजोरी भरने का अच्छा साधन साबित हो रही थीं। ‘कश्मीर फाइल्स’ से लेकर ‘केरल स्टोरी’ तक न जाने कितनी फिल्मों के जरिये देश और समाज में जहर भरकर फिल्मकारों ने अपनी तिजोरियां भरीं। लेकिन हाल में प्रदर्शित ‘उदयपुर फाइल्स’ बॉक्स ऑफिस पर सुपर फ्लाप रही। उसके निर्माता सोशल मीडिया पर हिंदुओं को गाली देते फिर रहे हैं। फिल्म को चलाने के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया लेकिन कहीं कोई जुंबिश तक नहीं हुई। जिसका नतीजा यह रहा कि अब वह फ्रस्टेट होकर हिंदुओं को ही गाली दे रहे हैं।

लाल किले से मोदी ने दूसरा जो बड़ा अपराध किया वह है आरएसएस के प्रति उनका भक्ति प्रदर्शन। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बीजेपी आरएसएस की पैदाइश है। लेकिन एक संगठन के तौर पर आरएसएस का आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं थी। यह बात अब दस्तावेजी तौर पर स्थापित हो चुकी है। इतना ही नहीं महात्मा गांधी की हत्या के बाद गृहमंत्री रहते सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उस पर पाबंदी भी लगा दी थी। और यह पाबंदी एक बार नहीं बल्कि बाबरी मस्जिद गिरने के बाद भी वह इसका शिकार हुआ था। और वैसे भी देश में जिस विभाजनकारी नफरती एजेंडे को लेकर वह काम करता है वह न तो देश और न ही समाज के लिए किसी भी रूप में हितकर है। लेकिन पीएम मोदी ने उसे एनजीओ करार देकर देश के प्रति समर्पित संगठन के तौर पर पेश किया है।

जबकि सच्चाई यह है कि वह न तो कोई एनजीओ है और न ही किसी भी रूप में समाज में उसकी कोई सकारात्मक भूमिका है। हिंदू-मुस्लिम और सांप्रदायिक एजेंडे पर चलने वाले इस संगठन का कहीं कोई रजिस्ट्रेशन तक नहीं है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब कारवां ने इस पर कवर स्टोरी की है। और उसने इसी बात को साबित करने की कोशिश की है कि इतना बड़ा संगठन जिस नाम से चलता है और जिसके नाम से इतने ज्यादा पैसों का लेन-देन होता है वह सरकारी दस्तावेज में कहीं भी नहीं दर्ज है। गोडसे और सावरकर के इस संगठन से रिश्ते छिपे नहीं रहे हैं। ऐसे में सुबह आप महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर जाकर शीश नवाएंगे और फिर उसके बाद लाल किले की प्राचीर से उनके हत्यारे गोडसे का गुणगान करेंगे। ये दोनों चीजें एक साथ नहीं चल सकती हैं। आपको अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। आपको यह पता नहीं है कि यह सब करके एक बार फिर से आपने देश के सामने विभाजनकारी एजेंडा पेश कर दिया है। जो किसी भी रूप में राष्ट्र के हित में नहीं है। 

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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