राजनीति सबसे अधिक विडम्बनापूर्ण विधा है। इस पर मनुष्य की सारी ज्ञान प्रणालियां असर डालती हैं और यह खुद को उनके अनुरूप ढलने का प्रयास करता रहता है। इस तरह से यह किसी समाज की चरम अभिव्यक्ति भी होता है और उतना ही परिवर्तनशील भी होता है। भारत में इस राजनय को एक मंच पर खेले जा रहे एक ऐसे नाटक की तरह देखा जा सकता है जिसका एक कोना हमेशा अंधेरा कर रखा जाता है जहां से अचानक ही किसी पात्र का प्रवेश मंच और रंगमंच पर एकदम ही सनसनी पैदा कर देता है। यह नाटक इतनी त्रासदियों के साथ गुजरता जा रहा है कि इसकी त्रासदी भी बोरियत पैदा कर रही है, लेकिन सनसनी बाकी है जिसे देखने के लिए लोग अब भी रंगमंच में बने हुए हैं।
1980 के बाद भारत की राजनीति में हिंदुत्व की राष्ट्रवादी अवधारणा जगह बनाते हुए दिखने लगती है और 1990 में इसकी राष्ट्रवादी हुंकार एक राजनीतिक पार्टी की शक्ल ले लेती है। भारत की अर्थव्यवस्था इसी दौर में एकध्रुवीय होती दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ हो जाती है। रूस अपने बिखराव के दौर में खुद को बचाने की जुगत में लग जाता है। अमेरीकी युद्ध की मशीन ठेठ भारत की सीमाओं तक आकर खड़ी हो जाती है और रूस की सीमा में घुसपैठ करने लगती है। पूरा मध्य एशिया युद्ध से तबाह हो जाता है, और उधर अफ्रीका भूख और हिंसा में जल उठता है।
ऐसे समय में भारत का राजनय भारत के पूंजीपतियों को नई तकनीक खरीदकर पूंजी के बाजार में मुनाफे का हिस्सा बटोरने और खेती से बड़े पैमाने पर ब्याज वसूलने में सहयोग करने की नीति अपनाता है। जमीनों का अधिग्रहण, जंगलों का दोहन, खदानों की लूट आदि यही वे प्रक्रियाएं थीं जिसमें भारत की राजनीतिक पार्टियां पूंजीपतियों के साथ मिलकर काम कर रही थीं और उनके बीच का भेद तक खत्म होता दिख रहा था।
इस लूट की खुली छूट से भारत के पूंजीपतियों ने क्या हासिल किया? वे तकनीक के लिए साम्राज्यवादी पूंजी पर और भी अधिक निर्भर हो गये। कच्चा माल और खेती से अधिशेष लेने के लिए और भी उतावले हो गये। बैंकों की आम जमा धन राशि पर कब्जा जमाने के लिए किसी भी सीमा को पार करने की ओर बढ़ गये। इन झगड़ों ने भ्रष्टाचार के गटर का जब ढक्कन खोल दिया तब जो रूप सामने आया, उससे बचने के लिए हिंदुत्व की पवित्र राष्ट्रवाद की एक चादर फैलाई गई जिसमें इस बदलती दुनिया में खुद को बनाये रखने का ढांढस देने वाला रंग था।
इसी समय में, 1980 के बाद चीन में पूंजीवाद अंतिम तौर पर खुद को संगठित कर रहा था। 1990 तक आते-आते इसने पूंजीवाद की ओर लंबी छलांग लगाई। यहां के पूंजीपतियों ने एकाधिकारी राजतांत्रिक व्यवस्था को एकाधिकारी पूंजीवादी राज्य व्यवस्था में बदलने और दुनिया के पटल पर खुद को पूंजीवादी साम्राज्यवाद में बदल देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। भारतीय राष्ट्रवाद चीन को जितना भी छोटा समझने के भ्रम में बना रहा हो, इसने 2000 के बाद विश्व के राजनीतिक पटल को निर्णायक तौर पर बदल दिया था। यह एक नये पूंजीवादी साम्राज्यवादी ताकत की तरह दुनिया के राजनीतिक पटल पर कदम रख दिया था। विश्व के राजनीतिक पटल के अध्ययन में चीन एक अनिवार्य विषय बन चुका था।
भारतीय राजनय में चीन को लेकर ‘लाल आंखे दिखाने’ से लेकर ‘झूला झुलाने’ की नीति पर जूतम-पैजार चल रहा था, उस समय चीन और रूस दुनिया के नक्शे पर पूंजीवादी साम्राज्यवाद के नक्शे पर एक नये ध्रुव की रचना करने में लगे हुए थे। भारतीय राष्ट्रवादी क पूंजीवादी साम्राज्यवादी आकांक्षाएं, जो विस्तारवादी नीतियों में अभिव्यक्त होती हैं, अपने ही पड़ोसी देशों की सीमाओं पर दम तोड़ने को अभिशप्त होने लगीं।
अमेरिकी, यूरोपीय से लेकर जापानी कंपनियों को भारत में बुला लाने के लिए भारत के प्रधानमंत्री ने विश्व दौरे का रिकॉर्ड बना डाला। लेकिन, भारत की अर्थव्यवस्था ने टस से मस होने का नाम नहीं लिया। रूस ने भारत को मोहरा बनाकर सस्ते तेल से यूरोप को भर दिया। इसका सीधा घाटा अमेरिकी कंपनियों को हुआ। भारत इस तेल के खेल में एक मोहरा बन गया। चीन और रूस के ध्रुवीकरण, मध्य एशियाई देशों का पुनः उभार ने दुनिया के नक्शे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों के एकध्रुवीय साम्राज्य को घुटने पर ला दिया।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारत के राष्ट्रवाद का क्या हुआ जो हिंदुत्व की शक्ल में 1980 के दशक से खुद को मजबूत बनाने में लगा हुआ था? दुनिया के नक्शे पर जिस तरह से पूंजीवादी साम्राज्यवाद एक नये नक्शे को गढ़ने में लगा हुआ है और इसमें चीनी पूंजीवादी साम्राज्यवाद का प्रवेश एक गुणात्मक फर्क डाल रहा है, वह निश्चित ही 1940-50 के दशक से भिन्न दुनिया है। यह 1990 के दौर की भी दुनिया नहीं है। इस समय भारत में नेहरूवियन राष्ट्रवाद और हिंदुत्व राष्ट्रवाद न तो भारत को दुनिया के नक्शे पर ठहरा पाने की स्थिति में हैं और न ही ये किसी तरह से प्रासंगिक दिख रहे हैं।
ये दोनों मॉडल दुनिया में भारत का डंका बजाने का दावा करते हुए, दुनिया के राजनय में हास्य का हिस्सा और भारतीय जनता के लिए अपमान के कारण बन चुके हैं। लेकिन, आज भी ये दोनों राष्ट्रवाद के दावों में सबसे आगे हैं। ये दुनिया के नक्शे पर हुई अपनी हार का बदला कहीं और से नहीं अपनी ही जनता पर हमलावर होकर ले रहे हैं। भारतीय राजनीति में नैतिकता तार-तार हो चुकी है, फिर भी उसी नैतिकता के आधार पर एक दूसरे को जेल में डाल देने वाले विधेयक और कानून संसद में पेश कर रहे हैं।
दुनिया के नक्शे पर पूंजीवादी साम्राज्यवाद एक गुणात्मक फर्क लिए हुए सामने आ रहा है, भारतीय राजनय और राजनीति एक अंडा बनकर किसी साम्राज्यवादी ताकत का नाश्ता बन जाने के लिए अभिशप्त दिख रहा है।
(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।)