हाल ही में एक पुस्तक काफी चर्चा में रही है जिसका नाम “ इनकंप्लीट जस्टिस” और लेखक दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एस मुरलीधर हैं। पर इस किताब ने उस समय के एक पूरे प्रसंग को दुबारा खोल कर रख दिया है जिसमें जस्टिस मुरलीधर के रातों रात स्थानांतरण के राजनीतिक पक्ष थे। इस पूरे मामले ने लोगों का ध्यान जस्टिस के पूरे कार्यकाल पर डालने पर मजबूर किया है। और हो भी क्यों न, जब अपने पूरे कार्यकाल में कोई इंसान न्याय के शासन के लॉयल प्रहरी की तरह खड़ा रहा हो।
वरिष्ठतम हाईकोर्ट न्यायाधीशों में शुमार और कई संवेदनशील मामलों में ऐतिहासिक फैसले देने वाले जस्टिस एस. मुरलीधर ने 7 अगस्त 2023 को ओडिशा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्ति ले ली। 17 साल लंबे न्यायिक करियर में उन्होंने न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोपरि रखते हुए ऐसी मिसालें कायम कीं, जिनकी गूंज आने वाले वर्षों तक सुनाई देगी।
दिल्ली हाईकोर्ट से ‘आधी रात’ तबादले तक
दिल्ली हाईकोर्ट में 14 साल तक न्यायाधीश रहने के बाद 2020 में उनका तबादला एक मध्यरात्रि आदेश के जरिए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया गया। इस फैसले की वकीलों, पूर्व न्यायाधीशों और नागरिक समाज से लेकर मीडिया तक ने कड़ी आलोचना की। उसी वर्ष दिसंबर में उन्हें ओडिशा हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। हालांकि, 2022 में सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने उनका स्थानांतरण मद्रास हाईकोर्ट में करने की सिफारिश की, जिस पर केंद्र सरकार ने अमल नहीं किया।
जस्टिस मुरलीधर अपनी सादगी के लिए भी जाने जाते रहे। सुप्रीम कोर्ट परिसर में खड़ी उनकी नीली मारुती ओमनी वैन, जिसे वे अपना ‘चैंबर’ मानते थे, उनकी पहचान बन गई थी।
दिल्ली दंगों के दौरान ‘आधी रात की अदालत’
26 फरवरी, 2020 की आधी रात को, जब दिल्ली दंगे भड़के हुए थे, जस्टिस मुरलीधर ने आपातकालीन सुनवाई करते हुए पुलिस को आदेश दिया कि घायलों को तुरंत सुरक्षित अस्पताल पहुँचाया जाए। सीएए हिंसा मामलों में भी उन्होंने नफरत फैलाने वाले भाषणों पर कार्रवाई न करने के लिए दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाई और साफ कहा – “हम एक और 1984 नहीं होने देंगे।”
इस घटना को याद करते हुए एक वक्ता ने कहा, “आधी रात में गठित पीठ ने न केवल पीड़ितों के सुरक्षित अस्पताल पहुँचने का आदेश दिया, बल्कि अनुपालना की रिपोर्ट भी सुनिश्चित की।” वक्ता ने इसकी तुलना केशवानंद भारती केस से की, जिसमें संसद की संशोधन शक्ति पर रोक लगाने वाले तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को सुपरसीड किया गया था। उनका कहना था कि दिल्ली दंगों की आधी रात की सुनवाई करने वाले जज को भी उसी तरह परिणाम भुगतने पड़े।
जस्टिस लोकुर का बड़ा आरोप
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी. लोकुर ने भी इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों का तबादला अक्सर “बिना किसी कारण या उकसावे” के किया जाता है। लोकुर ने साफ आरोप लगाया कि जस्टिस मुरलीधर का दिल्ली हाईकोर्ट से तबादला सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि सरकार को 2020 दंगों के दौरान दिया गया उनका आदेश पसंद नहीं आया।
“दिल्ली ने हाल ही में यह अनुभव किया कि जस्टिस मुरलीधर का तबादला कर दिया गया। सबको पता है, यह दंगों के वक्त हुआ और उन्होंने ऐसा आदेश दिया था जो सरकार को रास नहीं आया,” लोकुर ने कहा।
ऐतिहासिक फैसले और न्यायिक धरोहर
जस्टिस मुरलीधर कई बड़े और ऐतिहासिक फैसलों के लिए जाने जाते हैं।
• नाज़ फाउंडेशन केस (2009): वयस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया।
• आरटीआई (2010): सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति के खुलासे संबंधी याचिकाओं को मंजूरी दी।
• भीमा कोरेगाँव: सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा को राहत दी।
• हाशिमपुरा नरसंहार (1986): 16 पीएसी जवानों को दोषी ठहराया।
• 1984 सिख विरोधी दंगे: कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को सजा सुनाई।
अपने 2020 के विदाई भाषण में उन्होंने नाज़ फाउंडेशन केस को सबसे भावुक पल करार दिया था। “जब अदालत ने यह फैसला सुनाया तो कोर्ट रूम में मौजूद लोग राहत से रो पड़े। हमें लगा कि देश बदल चुका है और यह बदलाव अब कभी पलटेगा नहीं।”
संवैधानिक मूल्यों के प्रति अटूट आस्था
अपने पूरे कार्यकाल में जस्टिस मुरलीधर ने संवैधानिक मूल्यों को जीने पर जोर दिया। उनका कहना था कि समानता, गैर-भेदभाव, गरिमा, समावेशिता और बहुलता जैसे सिद्धांतों को सिर्फ कहा नहीं जाना चाहिए बल्कि व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में आत्मसात करना चाहिए।
उनकी सेवानिवृत्ति ने भारतीय न्यायपालिका से एक ऐसा चेहरा विदा किया, जिसने सत्ता के दबाव को ठुकराकर न्याय और संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा की। आज भी उनकी विरासत कानून और समाज, दोनों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। यह पूरा मामला जानकार इसे समझना मुश्किल नहीं है कि उमर खालिद की बेल इतनी बार क्यों खारिज हो चुकी है। अगर आप उस पूरे भाषण को स्वयं सुनेंगे तो यह समझना मुश्किल हो जाएगा कि यह इंसान जो संविधान के शब्दों को बोल रहा था वह आज जेल के सलाखों के पीछे क्यों है? कई मौकों पर ट्रायल मीडिया द्वारा चलाई जाती है ज्यादातर बार न्यायालय द्वारा चलाई जाती है और कई बार न्यायाधीशों का भी पॉलिटिकल ट्रायल हो जाता है।
(निशांत आनंद पेशे से एडवोकेट हैं।)