आख़िर, चुनाव आयोग को मेरी बात माननी ही पड़ी…

ग़नीमत है कि देर से ही सही, चुनाव आयोग के दिमाग़ की बत्ती आख़िरकार जली तो। वोट-चोरी में मिलीभगत के आरोपों में फँसे चुनाव आयोग ने अपने कलेज़े पर ‘पत्थर’ नहीं बल्कि ‘हिमालय’ रखकर, तीन ख़ास फ़ैसले तो लिये हैं: पहला, मतदाता सूची में नया नाम जोड़ने (फ़ॉर्म-6), नाम हटाने (फ़ॉर्म-7) और वोटर का ब्यौरा संशोधित करने (फ़ॉर्म-8) से जुड़ी ऑनलाइन गतिविधियाँ अब आधार वेरिफ़िकेशन के बग़ैर पूरी नहीं होंगी। 

यही सवाल तो मैंने 17 अगस्त को चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाया था, जिसे जनता ने वायरल कर दिया और शायद, इसी वजह से चुनाव आयोग के दिमाग़ की बत्ती जलने के लिए मज़बूर हुई। मैंने चुनाव आयोग को चुनौती दी थी कि बायो-मेट्रिक पहचान के बग़ैर वो मतदाता सूची की गड़बड़ियों को कभी नहीं रोक पाएगा। टेक्नोलॉज़ी की मदद के बग़ैर ये असम्भव है। (देखें वीडियो) हालाँकि, चुनाव आयोग का ये फ़ैसला अब भी अधूरा है क्योंकि ये साफ़ नहीं है कि 24 जून को जारी उसके देशव्यापी SIR (Special Incentive Revision) के आदेश के क्रियान्वयन में क्या सभी वोटर्स के लिए गणना प्रपत्र (enumeration form) को भरते वक़्त ‘आधार वेरिफ़िकेशन’ करवाना ज़रूरी होगा या नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये 2003 में हुए सघन पुनरीक्षण (intensive revision) के बाद जुड़े नामों तक ही सीमित रहेगा? 

मैं फिर एक बार चुनाव आयोग को आगाह करना चाहता हूँ कि यदि देशव्यापी SIR में हरेक नये-पुराने मतदाता का ‘आधार वेरिफ़िकेशन’ नहीं होगा तो बिहार की तरह ही देश भर में भ्रष्ट मतदाता सूची की बीमारी बनी ही रहेगी। ऐसा लगता नहीं कि ‘आधार वेरिफ़िकेशन’ के फ़ैसले का बिहार SIR पर कोई सकारात्मक असर नज़र आएगा। 

30 सितम्बर के बाद बिहार का Final Draft Electoral Roll प्रकाशित होगा। लेकिन इसके लिए दो महीने लम्बी चली सुनवाई के बाद जब तक सुप्रीम कोर्ट को मज़बूरन ‘आधार कार्ड’ को स्वीकृत दस्तावेज़ का दर्जा मानने का आदेश दिया तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। इसीलिए बिहार के SIR में चुनाव आयोग से ‘आधार वेरिफ़िकेशन’ का वैसा फ़ायदा नहीं होगा, जैसा खोट-रहित मतदाता सूची बनाने के लिए ज़रूरी था। बहरहाल, बिहार पर तो वोट-चोरी का संकट अब भी गहराया हुआ है। 

सुप्रीम कोर्ट भी कम ज़िम्मेदार नहीं 

‘वोट चोरी’ पर नकेल नहीं कसने के लिए चुनाव आयोग से कम ज़िम्मेदार सुप्रीम कोर्ट भी नहीं है। उसे अपना ‘आधार वाला आदेश’ तो पहली दिन की सुनवाई के वक़्त ही देना चाहिए था। लेकिन वो सरकार की आँख की किरकिरी बनने से बचने के लिए सिर्फ़ बारम्बार चुनाव आयोग को इशारा करता रहा कि वो किसी तरह से बिहार में ‘वोट-चोरी’ के खेल को रफ़ा-दफ़ा कर ले। लेकिन जब आँख से देखकर मक्खी नहीं निगली जाती तो बेचारा सुप्रीम कोर्ट ‘वोट चोरी के मगरमच्छ’ को कैसे निगल लेता! 

चुनाव आयोग की बाक़ी अन्धेरगर्दियों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने काफ़ी उदार रूख़ दिखाया। अन्ततः सिर्फ़ झिड़कियों से काम चलाया। आख़िर में, उसने चुनाव आयोग से सिर्फ़ इतना ही तो कहा कि ‘चलो, तुम्हारी ज़िद है तो कर लो SIR, लेकिन यदि हमें लगा कि Final draft roll of Electors में पहले की तरह ही भारी गड़बड़ियाँ मौजूद हैं तो हम SIR को रद्द करने पर भी विचार कर सकते हैं।’ 

सुप्रीम कोर्ट पर भी गुर्राया था चुनाव आयोग

इससे पहले ज्ञानेश कुमार गुप्ता ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस की तरह सुप्रीम कोर्ट में भी गुर्राने की ज़ुर्रत की थी कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत उसे ‘भारतीय नागरिकों’ के नाम मतदाता सूची में दर्ज करने का एकाधिकार प्राप्त है।’ इस पर सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि ‘आपका क्षेत्राधिकार हम अच्छी तरह जानते हैं। हम ही परिभाषित करेंगे कि आपके अधिकार क्या हैं और क्या नहीं? फ़िलहाल, हम आपको आगाह कर रहे हैं कि Citizenship Act, 1955 के अनुसार, किसी व्यक्ति की नागरिकता को तय करना आपका अधिकार नहीं है। ये काम केन्द्रीय गृह मंत्रालय का है।’

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि ‘फ़िलहाल, आप आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज़ की सूची में जोड़िए और मनमाने ढंग से किसी भी मतदाता का नाम वोटर्स लिस्ट से मत हटाइए।’ SIR की वैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रवैया लुंजपुंज रहा है। साफ़ दिख रहा है कि वो चुनाव आयोग को तब तक बचाता रहेगा जब तक कि बिहार में फ़ाइनल ड्राफ़्ट से उड़ाये गये नामों को लेकर ऐसा बवाल ना ख़ड़ा हो जाए जिससे राज्य में शान्ति-व्यवस्था पर और चुनावी माहौल पर ग्रहण लगने की आशंका हो। 

सुप्रीम कोर्ट भी गुनहगार को थामना नहीं चाहता

30 सितम्बर के बाद Final Draft Electoral Rolls को लेकर यदि हालात विस्फोटक और हिंसक नहीं हुए तो बिहार SIR के घटिया स्तर और तमाम झूठ-फ़रेब के बावजूद सुप्रीम कोर्ट शान्त रहेगा। वो Electoral Bonds मामले के गुनहगारों की तरह ‘वोट चोरों’ का पीछा नहीं करेगा। वैसे, वो भी क्या अद्भुत फ़ैसला था जिसमें लेन-देन या उगाही या quid-pro-quo तो असंवैधानिक था, गुनाह था लेकिन गुनहगार को थामने की सुप्रीम कोर्ट ने कोई ज़रूरत नहीं समझी। इसीलिए असली ‘वोट चोर’ अभी तक बेनक़ाब होने से बचे हुए हैं। 

‘विनोद राय प्रजाति’

वोट चोरी के आरोप चाहे एफ़िडेविट पर लगाये गये हों या बग़ैर एफ़िडेविट के, ज्ञानेश कुमार गुप्ता की फ़ितरत हर शिकायत वैसे ही रफ़ा-दफ़ा करने की है जैसा उनके पूर्ववर्ती राजीव कुमार अग्रवाल ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी-शाह आदि के घोर साम्प्रदायिक भाषणों के मामले में किया था। मोदी-शाह ने बहुत ठोक-बजाकर अपने लिए ऐसे जमूरे ढूँढ़े हैं। ये दोनों भी ‘विनोद राय प्रजाति’ के अफ़सर हैं। स्वामी भक्ति में पन्ना धाय का भी रिकॉर्ड तोड़ने का माद्दा रखते हैं। ज़रा सोचिए कि संविधान की धज्जियाँ उड़ाना, पन्ना धाय के बलिदान से हल्का काम कैसे हो सकता है? अशोक लवासा और अरुण गोयल, इनकी तरह गिरने को, पतित बनने को तैयार नहीं हुए इसीलिए चलता हो लिये।  

अभी आलम ये है कि देश में शायद ही किसी समझदार नागरिक को ज्ञानेश कुमार गुप्ता की ‘वोट-चोरों’ से मिलीभगत पर कोई सन्देह हो। यही हाल इनके पूर्ववर्ती और टुटपुँजिया शायर राजीव कुमार अग्रवाल का भी रहा है। दोनों ने अपने आका ‘अलादीन’ के लिए ‘जिन्न’ का किरदार बख़ूबी निभाया है। बरसों-बरस से सुप्रीम कोर्ट भी सरकार की कठपुतली बना हुआ है। वर्ना, उसने अभी तक 24 जून को जारी देशव्यापी SIR (Special Incentive Revision) की वैधता पर अपना फ़ैसला क्यों नहीं सुनाया? कोर्ट में पर्याप्त बहस हो चुकी है। फिर भी तारीख़ पर तारीख़ का खेल क्यों? काश! चुनाव आयोग की अब भी आँख खुल जाए कि नागरिकता पर सवाल खड़े करना या उसे तय करना, उसका काम नहीं है। 

राजनीतिक दलों से सलाह-मशविरा

बहारहाल, चुनाव आयोग का दूसरा अहम फ़ैसला वो निर्देश है जिसमें सभी राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी से कहा गया है कि वो 24 जून के आदेशानुसार, देशव्यापी SIR की दिशा में आगे बढ़ने से पहले सभी राजनीतिक दलों से सलाह-मशविरा ज़रूर करें। यही काम तो बिहार SIR से पहले नहीं हुआ था। सलीके से काम किया होता तो चुनाव आयोग और उसके आकाओं की छीछालेदर क्यों होती! इस प्रसंग को लेकर भी 17 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग ने ग़लतबयानी की थी कि उसने सभी राजनीतिक दलों के ज़िला अध्यक्षों से बात की थी। इस तथ्य को ज्ञानेश कुमार गुप्ता ने सोची-समझी साज़िश के तहत छिपा लिया कि उस ‘बातचीत’ का मुद्दा SIR नहीं था।
पोस्टल बैलट की गिनती

तीसरा फ़ैसला, पोस्टल बैलट से जुड़ा है। इसे लेकर अब चुनाव आयोग का निर्देश है कि भविष्य में ये सुनिश्चित किया जाएगा कि EVM के वोटों की गिनती के आख़िरी दो राउंड से पहले पोस्टल बैलट की गिनती पूरी कर ली जाएगी। दरअसल, दर्जनों मामलों में निर्वाचन अधिकारी पर पोस्टल बैलट की संख्या के साथ घालमेल करके नतीज़े पलटने के आरोप लगते रहे हैं। ये सुधार अपेक्षित था और स्वागत योग्य है। यहाँ ‘देर आये, दुरुस्त आये’। वर्ना, अभी तक तो धूल चेहरे पर थी और चुनाव आयोग आईना साफ़ करता रहा है।

(मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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