राजसत्ता, कार्पोरेट मिलकर करेंगे संसाधनों पर कब्ज़ा, जिससे निपटने एक ही रास्ता है संघर्ष : जेम्स हेरेंज 

खबरों की ओर बढ़ने से पहले यह बताना जरूरी हो जाता है कि पत्थरगड़ी, पेसा कानून 1996 और वन अधिकार कानून 2006 क्या है?

तो बताते चलें कि पेसा कानून 1996 (पंचायत एक्स्टेन्शन टू शेड्यूल एरियास् एक्ट 1996) अनुसूचित क्षेत्रों यानी आदिवासी बहुल क्षेत्र के आदिवासी समुदाय की परंपराओं, संस्कृति और उनके स्वशासन को मान्यता देने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए बनाया गया एक कानून है जिसे झारखंड में आजतक इसकी नियमावली नहीं बन पाई है। जबकि इस कानून की नियमावली बनने से अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) वर्ग को कई सीधे लाभ मिलते।

सीधे सादे शब्दों में कहें तो पेसा कानून मूलतः अपनी पारंपरिक व्यवस्था के अनुसार अपने क्षेत्र-अधिकार, जो अनुसूचित क्षेत्र (पांचवीं अनुसूची) का टेरिटोरी कहलाता है, के भीतर आने वाले सभी प्राकृतिक संसाधनों (जल-जंगल-जमीन) पर नियंत्रणात्मक प्रशासनिक अधिकार देता है। मतलब इसे ही स्वशासन कहा जाता है।

वैसे तो पत्थरगड़ी का शाब्दिक अर्थ है ‘पत्थर तराशना’। लेकिन पूर्व में आदिवासी समुदाय इन पत्थरों पर अपने क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध जैसे आदेश खुदवाते थे, जो धीरे धीरे गुम होता चला गया। जिसे पुनर्स्थापित करने हेतु पिछले दिनों पत्थरगड़ी आंदोलन के तौर पर झारखंड के खूंटी ज़िले में आदिवासियों द्वारा अपने अधिकारों, जिनमें संप्रभु क्षेत्र का अधिकार भी शामिल है, के लिए एक प्रतिरोध आंदोलन शुरू किया गया था। 

वहीं वन अधिकार कानून 2006, वन में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों (आदिवासियों) सहित अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन भूमि और संसाधनों पर उनके अधिकारों को मान्यता देने के लिए बनाया गया एक कानून है। इसका उद्देश्य औपनिवेशिक काल से चले आ रहे ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना है, जब वन संसाधनों पर इन समुदायों का पारंपरिक अधिकार छीन लिया गया था। यह कानून इन समुदायों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और वन संरक्षण में भागीदारी सुनिश्चित करता है। जिसे सामुदायिक वन संसाधनों पर वनाधिकार प्रमाण पत्र पूरी तरह से निर्गत नहीं किया जा सका है।   

इन्हीं तमाम मुद्दों पर पिछले दिनों राज्य के सरायकेला- खरसांवा जिला अंतर्गत कुचाई प्रखंड के ग्राम सभा बाण्डीह में राज्य के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों द्वारा एक सभा की गई। 

वीर बुरु अबुआ, ओते हस्सा अबुआ, अर्थात जंगल पहाड़ हमारा (ग्राम सभा का) है, जगह जमीन हमारा जैसी गगनभेदी नारों के साथ ग्राम सभा बाण्डीह में वनाधिकार पत्थरगाड़ी स्थापना की पहला वर्षगांठ मनाया गया। 

उक्त सार्वजनिक सभा के पूर्व पारम्परिक पाहन (पुजारी) बुनेड़ीराम मुण्डा की अगुवाई में बुरु बोंगा (वन देवता) एवं नागे-चण्डीएराओं को लाल मुर्गा चढ़ाकर सामूहिक पूजा-अर्चना की गई। जिसमें उपस्थित सभी महिला-पुरुष और बच्चों ने सामूहिक पारम्परिक गीत गाए। जहां से जुलुस एवं गाजे बाजे के साथ नृत्य करते हए गांधी चबूतरा में पहुंचकर सभा की गई। 

पत्थरगड़ी उत्सव पर सामाजिक कार्यकर्त्ता सोहन लाल कुम्हार ने बताया कि वनाधिकार कानून 2006 इस ग्राम सभा को कुल 306.04 एकड़ वनभूमि का सामुदायिक पट्टा 2024 में ही प्राप्त हुआ है। यह जंगल आन्दोलन की दिशा में ग्राम सभा की ऐतिहासिक जीत है। ग्राम सभा के लोग सदियों से अपने वन संसाधनों का संरक्षण, सम्बर्धन, पुनर्जीवित और प्रबंधन करते आ रहे हैं। जिसे अब जाकर सरकार ने मान्यता दी है।

सामाजिक कार्यकर्त्ता गलैक्शन डुंगडुंग ने पेसा कानून 1996, सांविधानिक प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट लहजे में कहा कि 5वीं अनुसूची इलाके में सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। सरकारी कुर्सी पर बैठे लोग आदिवासी इलाकों के लिए बने कानूनों को जान बूझकर लागू नहीं होने देते हैं क्योंकि ग्राम सभा से हर छोटी बड़ी परियोजना या गतिविधि के लिए अनुशंसा प्राप्त करना उनके लिए सरदर्द बन गया है। इसीलिए पंचायत चुनाव हमपर थोपा गया है ताकि ग्राम पंचायत मुखिया को बतौर वसूली एजेंट इस्तेमाल किया जा सके।

आज ग्राम पंचायत के कोई भी योजना को उठाकर देख लीजिये, खुलेआम 40 फीसदी राशि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के रिश्वत में खपाया जा रहा है। ग्राम सभा ऐसे अन्यायपूर्ण व्यवस्था को ध्वस्त करेगी। आदिवासी समाज राज्य सरकार से माग करती है कि झारखण्ड में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियो के प्रशासन और नियंत्रण के लिये पेसा 1996 के संदर्भ में अविलम्ब नियम तैयार कर इसे अधिसूचित करे। 

डुंगडुंग ने आगे कहा कि राज्य सरकार पेसा 1996 के तहत नियमावली नहीं बना रही है तो ग्राम सभाओं को पेसा 1996 को लागू कर देना चाहिए। सरकार ने जो नियमावली तैयार की है उसमें कार्यकारिणी समिति गठन करने का उल्लेख नहीं है। अर्थात सरकार जो पेसा 1996 का नियमावली तैयार की है, वह विधिसम्मत नहीं है।

सभा को संबोधित कर जंगल आन्दोलनकारी अलेस्टेयर बोदरा ने कहा कि जंगल समस्त सृष्टी के जीवन का श्रोत है। आज जहां पूरी दुनिया वायुमंडल में तेजी से बढ़ती ग्रीन हाउस गैस की मात्रा को लेकर चिंतित है, वहीं आदिवासी इलाकों में फैले जंगलों को धरती बचाने के एक बड़े प्राकृतिक उपाय के रूप में देखा जा रहा है। काफी आदिवासी संघर्ष के बाद वनाधिकार कानून 2006 वना है। लेकिन दुखद स्थिति ये है कि अपने राज्य में मुख्यमंत्री स्वंय वन विभाग के भी मंत्री है, बावजूद इसके सामुदायिक वन संसाधनों पर वनाधिकार प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया जाना आदिवासियों और वनाश्रित समुदायों के लिए अत्यंत चिंता का विषय है।

जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज ने विगत 5 वर्षों के केन्द्रीय सरकार द्वारा वन अधिकार कानून, पेसा कानून सहित आदिवासियों के रूढिगत कानूनों को कैसे कमजोर किया गया, को विस्तार से समझाते हुए उन्होंने कहा कि सारंडा वन्यजीव अभ्यारण्य के मामले में सर्वोच्च नयायालय राज्य सरकार को आदेशित करती है कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 2002 के तहत सरकार स्थानीय समुदायों के बाद अभ्यारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और पारिस्थितिकीय गलियारों से सटे क्षेत्रों और दो संरक्षित क्षेत्रों को एक दूसरे से जोड़ने वाले इलाकों को संरक्षित क्षेत्र घोषित करे।

23 मार्च 2020 का पर्यावरण प्रभाव का आंकलन अधिसूचना के मसौदे में जनसुनवाइयों के प्रावधानों और पर्यावरणीय अपराधों के लिए दण्ड की परिभाषा को कमजोर किया गया।

2 अक्तूबर 2021 को वन संरक्षण कानून 1980 वन भूमि में गैर-वानिकी गतिविधयों के लिए वन स्वीकृति से बाहर करने का प्रस्ताव है।

पहली जनवरी 2023 को कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना केंद्र सरकार ने शुरू कर दी।

पहली अप्रैल 2023 को वन्यजीव अधिनियम 1972 में संशोधन कर वन्यजीव अपराधों के दण्ड, जिसमें जेल और जुर्माना शामिल है, सभी स्तरों में बढाया गया। वन्यजीव अधिकारियों की अपराधों का समझौता करने की शक्ति बढाई गई। साथ ही अब तक की निर्धारित राशि 25 हजार से बढ़ाकर 5 लाख कर दी गई है।

इसी प्रकार 11 अगस्त 2023 को भारतीय वन अधिनियम 1927 में संशोधन कर वन अधिकारियों के अधिकार बढ़ाये गए जिससे वे जुर्माने और उसकी वसूली करने में सक्षम होंगे।

11 अक्टूबर 2023 से देश में ग्रीन क्रेडिट नियम लागू कर दिया गया है। इन तमाम संशोधनों का एक ही परिणाम आएगा राजसत्ता और कार्पोरेट मिलकर आदिवासियों का नरसंहार करेंगे और उनके संसाधनों पर कार्पोरेट बाजार का कब्ज़ा होगा। हमारे पास एक ही रास्ता है वो है संघर्ष का रास्ता।

आईसीएफजी के सुश्री सूरजमनी ने कहा कि गांव – गांव में वनाश्रित महिला समूह गठन कर वनोपजों का संग्रहण तथा विपणन कार्य करें। वनोपजें अधिक होने लगी है। हर्रा, बहेरा, साल बीज, चिरौंजी आदि वनोपजों के संग्रण वनाश्रित महिला समुहों के साथ ग्राम सभा संग्रहण करे। हमारी संस्थान विपणन करने में मार्गदर्शन करेगी।

इस अवसर पर ओखौरी प्रवास ने कहा कि यहां की ग्राम सभा सशक्त है जिसके कारण जंगल का घनत्व बहुत अधिक हो गया है, जबकि पहले बड़ाबाण्डीह का बाण्डीहबुरु विरान हो गया था। ग्राम सभा को वनाधिकार कानून 2006 के तहत जंगल पर अधिकार दिये जाने के उपरांत ही जंगलों का घनत्व में बहुत अधिक वृद्धि हो गयी है।  

एलेक्स टोप्पो ने कहा कि जैविक खेती करें और जैविक फसल सेवन कर स्वास्थ्य जीवन विताएं। साथ ही साथ धरती और वतावरण को भी स्वच्छ बनाएं।

कार्यक्रम में भरत सिंह मुण्डा, तुलसी मुण्डा, दामु मुण्डा, राधाकृष्ण सिंह मुण्डा, सुखराम मुण्डा, कारु मुण्डा, सुश्री पार्वती गागराई, बाबलु मुर्मु, वृहस्पति सिंह सरदार, गौतम सिंह मुण्डा, अलेस्टेयर बोदरा, धर्मेन्दर सिंह मुण्डा, मुन्ना सोय, मानसिंह मुण्डा, मंगल सिंह मुण्डा, सुखराम मुण्डा, टेने मुण्डारी, स्नातन कुन्टिया, मानकी मुण्डा, गोपाल सिंह मुण्डा, रामककृष्ण मुण्डा, आशोक मानकी, भरत सिंह मुण्डा, वनवारीलाल मुण्डा, कारु मुण्डा, सुश्री पार्वती गागराई, राधाकृष्ण सिंह मुण्डा, मंगल सिंह मानकी, करम सिंह मुण्डा, राजेश मुडरी, दोलु सिंह सरदार आदि ने भी अपने विचार रखे।

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