प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेहरू के व्यक्तित्व के सामने खुद को किस कदर छोटा महसूस करते हैं, हीनताबोध से ग्रसित हैं, इसका अंदाज संविधान दिवस पर उनके देशवासियों को लिखे पत्र से लगाया जा सकता है। पत्र नीचे संलग्न है।
नरेंद्र मोदी भारतीय संविधान और भारतीय राष्ट्र की मजबूत नींव रखने के लिए संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद, सरदार बल्लभ भाई पटेल, डॉ. आंबेडकर को तो याद करते हैं, लेकिन वे भूल से एक बार भी नेहरू का नाम नहीं लेते हैं। सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान को सामाजिक-आर्थिक न्याय, समता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, मानवीय गरिमा, मौलिक अधिकारों, स्वतंत्र और स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं और जन संप्रभुता और राष्ट्रीय संप्रभुता का एक मुकम्मल दस्तावेज बनाने में आंबेडकर के साथ जिस व्यक्ति की सबसे बड़ी भूमिका रही है, वे नेहरू रहे हैं। भारतीय संविधान को हिंदू-मुस्लिम वाइनरी के दायरे से निकालने में उनकी महती भूमिका रही है। भारत को एक प्रबुद्ध, आधुनिक, लोकतांत्रिक गणतंत्र और राष्ट्र के रूप में नींव डालने में नेहरू प्रधानमंत्री के रूप में एक केंद्रीय व्यक्ति रहे हैं।
नेहरू से असहमतियां हो सकती हैं और हैं भी। उनकी भी कमियां-कमजोरियां थीं। भारतीय राष्ट्र की नींव खड़ा करने में उनसे भी गलतियां और भूलें हुईं। प्रधानमंत्री के रूप में उनके व्यक्तित्व के स्याह पक्ष रहे हैं, लेकिन जिस आधुनिक भारत पर हम, जितना भी जिस बात के लिए नाज़ करते हैं, उस भारत को निर्मित करने में नेहरू की निर्णायक भूमिका रही है।
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेहरू जैसा कद पाना चाहते रहे हैं, इसके लिए उन्होंने बहुत सारी कोशिशें भी कीं, अब भी कर रहे हैं। लेकिन वे यह भूल जातें हैं कि बड़ा इंसान या नायक वह बनता है, जो न केवल सारे भारतीयों को अपना मानता है, बल्कि दुनिया के सभी इंसानों को अपना भाई-बंधु मानता है, नेहरू में यह इंसानी काबिलियत थी।
वे ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक बड़े नेता तो थे ही, उन्होंने आधुनिक, प्रबुद्ध, न्याय, समता, स्वतंत्रता और सबकी समृद्धि पर आधारित भारत का स्वप्न देखा और उसकी नींव भी डाली। वे कितने सफल हुए, कितने असफल हुए इसका मूल्यांकन तो किया जा सकता है, होता भी रहा है, लेकिन नेहरू के बिना आधुनिक भारत की कल्पना करना मुश्किल है। यह इतिहास का तथ्य है।
नरेंद्र मोदी नेहरू के आधुनिक भारत की नींव को तरह-तरह से खोद रहे हैं, उसकी जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं। वे इतिहास को याद करते समय भी नेहरू से आंख नहीं मिला पाते हैं, उनके सामने पड़ते ही खुद को छोटा महसूस करते हैं। हीनताबोध के शिकार हो जाते हैं। नरेंद्र मोदी यह भी याद रखिए नेहरू प्राचीन भारत की ओर देखते हुए मिथकीय पौराणिक राम (वर्ण-व्यवस्था के संरक्षक) की ओर नहीं, ऐतिहासिक व्यक्तित्व देवानामप्रियंम सम्राट अशोक की ओर देखते थे, वे आपकी तरह वेदों की ओर नहीं, बुद्ध की ओर देखते थे।
नेहरू अतीत की ओर भविष्य के निर्माण के लिए देखते थे, आपकी तरह अतीत के राम राज्य को पुनर्स्थापित करने के लिए नहीं, जिसमें शंबूक-ताड़का की हत्या तय है।
नेहरू का कद हासिल करने के लिए आधुनिक मन-मिजाज का होना पड़ता है, कूप-मंडूक आरएसएस का स्वयंसेवक बनकर यह कद हासिल नहीं किया जा सकता है। धर्म आधारित घृणा, खान-पान आधारित घृणा, वेश-भूषा आधारित घृणा, जीवन-पद्धति आधारित घृणा से लैस व्यक्ति कभी नेहरू नहीं बन सकता है, उसके लिए एक लोकतांत्रिक मन चाहिए, विविधता और असहमति को स्वीकार करने की भीतरी अर्ज चाहिए। एक गहरे स्तर की मानवता की भावना चाहिए। सबको अपना मानने का भाव चाहिए। अहंकार का पुतला बनकर कोई व्यक्ति इतिहास का नायक नहीं बन सकता। आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा और रात-दिन अपना प्रचार करने और कराने में लगा व्यक्ति नेहरू जैसा इंसान नहीं बन सकता है। नेहरू होने के लिए गहरे स्तर पर इंसानी होना कम से कम बुनियादी जरूरत है, जो आप जैसे आरएसएस के स्वयं सेवक और अडानी के चाकर में नहीं है।
मोदी का संविधान दिवस पर पत्र-
मेरे प्रिय देशवासी,
26 नवंबर हर भारतीय के लिए बहुत गौरवशाली दिन है। इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था। इसलिए एक दशक पहले, साल 2015 में NDA सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था।
हमारा संविधान एक ऐसा पवित्र दस्तावेज है, जो निरंतर देश के विकास का सच्चा मार्गदर्शक बना हुआ है। ये भारत के संविधान की ही शक्ति है जिसने मुझ जैसे गरीब परिवार से निकले साधारण व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचाया है। संविधान की वजह से मुझे 24 वर्षों से निरंतर सरकार के मुखिया के तौर पर काम करने का अवसर मिला है। मुझे याद है, साल 2014 में जब मैं पहली बार संसद भवन में प्रवेश कर रहा था, तो सीढ़ियों पर सिर झुकाकर मैंने लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को नमन किया। साल 2019 में जब चुनाव परिणाम के बाद मैं संसद के सेंट्रल हॉल में गया था, तो सहज ही मैंने संविधान को सिर माथे लगा लिया था।
संविधान दिवस पर हम डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद समेत उन सभी महान विभूतियों का स्मरण करते हैं, जिन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में अपना अहम योगदान दिया है। डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर की भूमिका को भी हम सभी याद करते हैं, जिन्होंने असाधारण दूरदृष्टि के साथ इस प्रक्रिया का निरंतर मार्गदर्शन किया। संविधान सभा में कई प्रतिष्ठित महिला सदस्य भी थीं, जिन्होंने अपने प्रखर विचारों और दृष्टिकोण से हमारे संविधान को समृद्ध बनाया।
साल 2010 में जब संविधान के 60 वर्ष हुए थे, तब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था। हमने संविधान के प्रति कृतज्ञता और निष्ठा प्रकट करने के लिए एक प्रयास किया। 2010 के उस साल में गुजरात में ‘संविधान गौरव यात्रा’ निकाली गई थी। इस पवित्र ग्रंथ की प्रतिकृति को एक हाथी के ऊपर रखकर मैंने उस भव्य यात्रा की अगुवाई की थी।
जब संविधान के 75 वर्ष पूरे हुए, तो ये हमारी सरकार के लिए ऐतिहासिक अवसर बनकर आया। हमें देशभर में विशेष अभियान चलाने का सौभाग्य मिला। संविधान के 75 वर्ष होने पर हमारी सरकार ने संसद का विशेष सत्र आयोजित किया और राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान भी चलाया। ये अभियान जन-भागीदारी का बड़ा उत्सव बन गया।
इस वर्ष का संविधान दिवस कई कारणों से विशेष है:
यह वर्ष सरदार पटेल जी और भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जयंती का है। सरदार पटेल जी के नेतृत्व और सूझबूझ ने देश का राजनीतिक एकीकरण सुनिश्चित किया। ये सरदार पटेल जी की ही प्रेरणा है जिसने हमारी सरकार को जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 की दीवार गिराने के लिए प्रेरित किया। आर्टिकल 370 हटने के बाद वहां भारत का संविधान पूरी तरह लागू हो गया है और लोगों को संविधान प्रदत्त सभी अधिकार मिले हैं।
भगवान बिरसा मुंडा जी का जीवन आज भी हमें जनजातीय समुदाय के लिए न्याय, गरिमा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने की प्रेरणा देता है।
इस साल हम वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव भी मना रहे हैं। वंदे मातरम हर दौर में प्रासंगिक रहा है। इसके शब्दों में हम भारतीयों के सामूहिक संकल्प की गूंज निरंतर सुनाई देती रही है। इस वर्ष हम श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के 350वें वर्ष को भी मना रहे हैं। उनका जीवन और शहादत की गाथा आज भी हमें प्रेरित करती है।
इन सभी का जीवन हमें उस कर्तव्य को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है, जिसे हमारे संविधान ने भी सबसे अहम बताया है। हमारे संविधान का आर्टिकल 51A मौलिक कर्तव्यों को समर्पित है। ये कर्तव्य हमें सामाजिक और आर्थिक प्रगति प्राप्त करने का रास्ता दिखाते हैं। महात्मा गांधी ने हमेशा नागरिकों के कर्तव्यों पर बल दिया था। वे मानते थे कि जब हम ईमानदारी से कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो हमें अधिकार भी स्वत: मिल जाते हैं।
देखते ही देखते इस सदी के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब आने वाला समय हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण है। साल 2047 तक आजादी के 100 वर्ष हो जाएंगे। साल 2049 में संविधान निर्माण के 100 वर्ष पूरे हो जाएंगे। हम आज जो नीतियां बनाएंगे, जो निर्णय लेंगे, उसका प्रभाव आने वाले वर्षों पर…आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। हमारे सामने विकसित भारत का लक्ष्य है इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए ही आगे बढ़ना है।
हमें राष्ट्र के प्रति, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना होगा। देश ने हमें कितना कुछ दिया है। इसके लिए हम सबके मन में कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। जब हम इस भावना से जीवन जीते हैं, तो कर्तव्य अपने आप जीवन का स्वभाव बन जाता है। अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए हमें अपने हर काम को पूरी क्षमता और पूरी निष्ठा से करने का प्रयास करना होगा। हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ाने वाला हो। हमारा हर कार्य देशहित से जुड़े उद्देश्यों को पूरा करने वाला हो। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो सपने देखे थे, उन्हें पूरा करने का दायित्व हम सबका है। जब हम अपने काम को कर्तव्य की भावना के साथ करेंगे तो देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति कई गुना बढ़ जाएगी।
संविधान ने हमें मतदान का अधिकार दिया है। एक नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि मतदान का कोई अवसर छोड़े नहीं। हमें 26 नवंबर को स्कूलों में, कॉलेजों में उन युवाओं के लिए विशेष सम्मान समारोह आयोजित करने चाहिए, जो 18 वर्ष के हो रहे हैं। हमें उन्हें यह महसूस कराना चाहिए कि वे अब केवल छात्र या छात्रा नहीं, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी हैं। स्कूलों में हर वर्ष 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान करने की परंपरा विकसित होनी चाहिए। जब हम इस तरह युवाओं में जिम्मेदारी और गर्व का भाव जगाएंगे, तो वे जीवनभर लोकतंत्र के मूल्यों के प्रति समर्पित रहेंगे। यही समर्पण एक सशक्त राष्ट्र की नींव बनता है।
आइए, इस संविधान दिवस पर हम अपने महान राष्ट्र के कर्तव्यनिष्ठ नागरिक के रूप में अपने दायित्वों का पालन करने का संकल्प दोहराएं। ऐसा करके ही हम विकसित और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम योगदान दे सकेंगे।
आपका,
नरेन्द्र मोदी
(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)