सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों का ऑडिट करने का आदेश दिया है। इसमें कोर्ट ने केंद्र, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को इस ऑडिट के बाद व्यक्तिगत तौर पर हस्ताक्षर किया हुआ हलफ़नामा जमा करने का आदेश दिया है।
विश्वविद्यालयों की स्थापना कैसे हुई, उन्हें नियंत्रित कौन करता है, किस तरह की नियामक मंजूरियाँ दी गई हैं क्या वाकई यह विश्वविद्यालय “नॉट-फॉर-प्रॉफिट” आधार पर चलते हैं, यह सभी जानकारी एफिडेविट में साझा करनी होगी।
एमिटी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली 23 साल की एमबीए स्टूडेंट आयशा जैन ने एक याचिका दायर की थी। वह यहां से आंत्रप्रेन्योरशिप की पढ़ाई कर रही हैं। साल 2021 तक उनका नाम खुशी जैन था। निजी कारणों से 2021 में उन्होंने अपना नाम बदलकर आयशा जैन कर लिया। इसके बाद गजट में नया नाम प्रकाशित भी करा लिया। नाम बदलने की यह कानूनी प्रक्रिया है। अब सभी दस्तावेज़ों जैसे आधार कार्ड पर नाम आयशा जैन हो चुका था।
साल 2023 में आयशा ने एमिटी यूनिवर्सिटी के एक सर्टिफिकेट प्रोग्राम में प्रवेश लिया। कोर्स पूरा हुआ और उन्हें सर्टिफिकेट मिल गया। साल 2024 में आयशा ने एमिटी यूनिवर्सिटी के एमबीए प्रोग्राम में प्रवेश लिया। इसके लिए उन्होंने सभी कानूनी दस्तावेज़ जमा कराए। यहां यूनिवर्सिटी ने अपने रिकॉर्ड्स में नाम बदलने से मना कर दिया। आयशा ने आरोप लगाया कि मुस्लिम नाम रखने के कारण उनके साथ बदसलूकी की गई। इन कारणों से वो न्यूनतम अटेंडेस पूरा नहीं कर पाई और परीक्षा नहीं दे सकीं। इस वजह से उनका पूरा साल बर्बाद हो गया।
छात्रा का आरोप है कि इसके बाद वो शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी के पास अपनी शिकायत लेकर पहुंची लेकिन यूनिवर्सिटी ने इस संबंध में भेजे गए ईमेल पर कोई ध्यान नहीं दिया।
मामला जब कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने एमिटी यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. अतुल चौहान को पेश होने का आदेश दिया। कोर्ट ने उनसे कहा कि स्टूडेंट का पूरा साल बर्बाद हुआ है और कुलपति इसका समाधान निकालें। हालांकि इस बीच आयशा दूसरी जगह प्रवेश ले चुकी थीं और एमिटी यूनिवर्सिटी ने उनकी फीस लौटा दी थी।
इसके बाद कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को आदेश दिया कि वो छात्रा को मुआवजा दें क्योंकि उसका पूरा साल बर्बाद हो चुका है। यूनिवर्सिटी ने छात्रा को 1 लाख रुपए का मुआवजा दिया।
20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को जनहित याचिका में बदल दिया। जस्टिस अमानुल्लाह और जस्टिस एन वी अंजरिया की पीठ ने कहा कि सभी निजी विश्वविद्यालयों के गठन, स्थापना और संचालन से जुड़े पहलुओं की जांच की जाए। कोर्ट ने इसे छात्रों के अधिकारों और उच्च शिक्षा में पारदर्शिता से जोड़ा है।
कोर्ट ने साफ किया है कि इसकी जिम्मेदारी किसी जूनियर अधिकारी को नहीं दी जा सकती। इसके लिए शीर्ष अधिकारियों को स्वयं जिम्मेदारी उठानी होगी। साथ ही गलत या अधूरी जानकारी देने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 8 जनवरी को होगी। इससे पहले सभी एफिडेविट जमा कराने होंगे।