हिन्दू राष्ट्र के खिलाफ घोषित हो आजादी की दूसरी लड़ाई!

2025 : अभूतपूर्व भयावह साल !  

थैंक्स गॉड 2025 बीत गया! नव वर्ष के आगमन पर निश्चय ही कोटि-कोटि लोगों ने राहत की सांस लेने के साथ कामना किया होगा कि फिर ऐसा वर्ष न आए! दु:स्वप्न साबित हुए 2025 की शुरुआत ही कुम्भ जैसे बड़ी धार्मिक आयोजन में भगदड़ से हुई, जिसमें 100 के करीब लोग जान गवाए: कुम्भ के सिलसिले में ही दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में दो दर्जन के करीब लोग दर्दनाक मौत के शिकार हुए। इसके कुछ माह बाद ही सपा के राज्य सभा सांसद रामजीलाल सुमन पर करणी सेना का हमला हुआ, जिससे आज भी दलित समुदाय के लोग दहशत में हैं।

इसी वर्ष इटावा में दो कथावाचकों के विषय में जब ब्राह्मणों को पता चला कि वे ब्राह्मण नहीं, यादव हैं, तब जिस तरह उनका सिर मुड़वा कर एक ब्राह्मण महिला के पैरों में नाक रगड़वाने के साथ उन पर महिला के मूत्र का छिड़काव किया गया, उससे पिछड़ी जाति के ढेरों लोगों का हिन्दू होने का दंभ पालने का नशा काफूर हो गया। कुछ अन्तराल बाद जिस तरह एक ब्राह्मण वकील ने सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायधीश बीआर गवई पर जूते फेंकने का प्रयास किया, दलितों को भी इल्म हो गया कि वे जितनी भी बुलंदी छू लें, उच्च वर्ण हिन्दुओं की नज़रों में उनकी कोई औकात नहीं! वर्ष के शेष होते-होते उच्च वर्ण हिन्दुओं के पराक्रम से जुड़ी घटनाओं में और तेजी आ गई।

दिसंबर के आखिरी सप्ताह में उन्नाव गैंगरेप मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को अदालत ने उनकी उम्र कैद की सजा को निलंबित करते हुए जमानत मंजूर कर ली, जिसे देखते हुए एलओपी राहुल गांधी को कहना पड़ा,’हम धीरे-धीरे एक ‘मृत समाज’ में बदलते जा रहे हैं। जहाँ सत्ता अपराधियों को बचाती है और पीड़ितों की आवाज़ दबा दी जाती है। सेंगर जैसे अपराधी को जमानत मिलना न्याय व्यवस्था पर एक गहरा धब्बा है।

यह फैसला सिर्फ़ एक मामले का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदना की हार है! अगर बलात्कारियों को संरक्षण मिलेगा, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करेगा?’ यह बात और है कि जन दबाव में सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी है। लेकिन बार-बार बुद्धिजीवियों की अपील के बावजूद दिल्ली दंगे के आरोपी जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत 21वीं  बार भी ख़ारिज हो गई, जबकि इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान रेप और हत्याकांड का सजायाफ्ता अपराधी कथित बाबा राम रहीम को 15 वीं बार 40 दिन के लिए पैरोल पर छूटने का अवसर मिल गया! 

वर्ष के शेष होने के कुछ दिन पूर्व ही उत्तराखंड के देहरादून में त्रिपुरा के दो छात्रों: एंजेल चकमा और उसके भाई माइकल चकमा पर जानलेवा नस्लीय हमला हुआ, जिसमें जिंदगी और मौत से संघर्ष करते हुए कुछ दिन बाद एंजेल चल बसा। जख्मी होने  के पहले वह कहता रहा ,’मुझे मत मारो,मैं चीनी नहीं, भारतीय हूँ’,पर, हमलावरों ने उसकी एक नहीं सुनी और अपनी वाली कर डाली! इस घटना से आहत राहुल गांधी यह कहने से खुद को नहीं रोक पाए,’ देहरादून में एंजेल चकमा और उनके भाई माइकल के साथ जो कुछ हुआ , वह एक भयावह घृणा अपराध है। नफरत रातोंरात पैदा नहीं होती ।

वर्षों से इसे रोजाना, विशेषकर हमारे युवाओं को जहरीली सामग्री और गैर- जिम्मेदार बयानों के मध्यम से बढ़ावा दिया जा रहा है और सत्ताधारी भाजपा के नफरत फैलाने वाले नेतृत्व द्वारा इसे सामान्य बना दिया गया है!’ एंजेल की मौत के कुछ दिन पूर्व क्रिसमस के दिन ओडिशा, उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड , दिल्ली , राजस्थान, छत्तीसगढ़ इत्यादि भाजपा शासित राज्यों में चर्चों के सामने जिस तरह हनुमान चालीसा पढ़ा गया;फुटपाथ पर क्रिसमस से जुड़े सामान बेच रहे दुकानदारों पर हमले हुए ; जिस तरह सांता क्लाज की प्रतिकृतियाँ तोड़ने जैसी घटनाएँ हुईं , उससे संदेश गया कि मोदी भले ही चर्च में जाकर प्रार्थना करें लेकिन उनके भारत में मुसलमानों के साथ ही , ईसाइयों के लिए भी कोई जगह नहीं!

वर्ष के शेष होने के कुछ घंटे पहले गाजियाबाद में हिन्दू रक्षा दल वालों ने घर-घर जाकर मुसलमानों के खिलाफ तलवार , फरसा, कुल्हाड़ी बांटकर नए साल का स्वागत किया, लेकिन इससे भी यति नरसिंहानंद गिरि जैसे  कुछ बड़े संतों को संतोष नहीं हुआ और वह खुली घोषणा कर रहे हैं कि  ‘अब तलवारें बांटने से कुछ नहीं होने वाला। अब तो हिंदुओं को आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए।  हिंदुओं को बजरंगदल–फजरंगदल जैसे संगठन छोड़कर आईएसआईएस जैसा संगठन बनाना चाहिए!’ ऐसी ही मानसिकता से पुष्ट लोगों ने केकेआर टीम में बांग्लादेश के एक मुस्लिम खिलाड़ी को जगह देने की घोषणा के बाद भारत के गौरव शाहरुख़ खान की जुबान काटकर लाने के लिए इनाम घोषित कर दिया।

ऐसा नहीं कि 2025 में जनसाधारण के दिलों में खौफ पैदा करने वाली सिर्फ ये ही कुछ घटनाएं हुई हैं, नहीं!  ये तो कुछ थोड़े उदाहरण हैं: इससे मिलती-जुलती और भी ढेरों घटनाएँ हुईं! बहरहाल इन घटनाओं के लिए कोई जिम्मेवार है तो वह आरएसएस है, जिसने इस वर्ष अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मनाते हुए हिन्दू राष्ट्र के आगमन के बड़े संदेश दे दिए, जिससे उच्च वर्ण हिन्दुओं की मानसिकता में खतरनाक बदलाव आ गया। इस मानसिकता के निर्माण में संघ के संगी साधु-संतों ने जनवरी में कुम्भ मेले में हिन्दू राष्ट्र का संविधान जारी कर बड़ा योगदान किया, जिसके बाद एडवोकेट अनिल मिश्रा संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर के खिलाफ खुलेआम अपशब्द कहते रहे तो धीरेन्द्र शास्त्री, सूरदास राम भद्राचार्य ब्रांड के संत अपनी नफरती बोली से दलित- बहुजनों में खौफ पैदा करते रहे !         

 2025 को दु:स्वप्न बनाने के लिए जिम्मेवार रहा संघ परिवार  

बहरहाल 2025 दु:स्वप्न बना तो  इसके लिए देश- विदेश के तमाम बुद्धिजीवियों और अखबारों ने संघ परिवार को ही जिम्मेवार ठहराया, जिसका सटीक प्रतिबिम्बन दुनिया के सबसे प्रभावशाली अखबारों में से एक ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में हुआ है। महीनों के रिसर्च के आधार पर न्यूयार्क टाइम्स ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में बताया है कि कैसे आरएसएस  ने अपने 2500 से अधिक आनुषांगिक संगठनों के सहारे सेक्युलर भारत को हिन्दू फर्स्ट भारत मे बदलने का काम अंजाम दिया है। रिपोर्ट में स्थापित किया गया है कि संघ ने भारत के तमाम संस्थानों को अपने विचार के लोगों से भर दिया है। राजनीति के साथ सेना, न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, अर्ध सैन्य बल, कारपोरेट, बिजनेस घरानों, शिक्षण संस्थानों यानी हर क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर इसकी ऐसी घुसपैठ हो चुकी है कि इससे  देश को निकाल पाना मुश्किल हो चुका है।

अखबार का कहना है कि आरएसएस की विचारधारा ईसाइयों और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत की बुनियाद पर खड़ी है। अखबार ने चर्चों पर हमले, मॉब लिंचिंग, दंगा, धार्मिक जुलूस की आड़ में अल्पसंख्यकों पर जुल्म जैसी तमाम घटनाओं के पीछे इस संगठन के वैचारिक प्रभाव को रेखांकित किया है। रिपोर्ट बताती है कि इस संगठन ने मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल में भरपूर विस्तार किया है! रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत की मिली-जुली संस्कृति के लिए यह संगठन गंभीर चैलेंज बन चुका है! न्यूयार्क टाइम्स ने संघ के विषय में जो कुछ अब कहा है, वह बातें राहुल गांधी पिछले दो- तीन सालों से दोहराते हुए कहे जा रहे हैं कि,’ आप देख सकते हो कि दलितों , आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो रहा है।

इसने मुझे झकझोर दिया है कि वे हमारे देश के विभिन्न संस्थानों पर कब्ज़ा करने में कितने सफल हो गए हैं। प्रेस, न्यायपालिका, संसद और चुनाव आयोग सभी खतरे में हैं और किसी न किसी तरह नियंत्रित हैं !’हाल ही में 9 दिसंबर को लोकसभा में चुनाव सुधार पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने फिर आरोप लगाया कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस का अगला कदम भारत के इंस्टीट्यूशन्स पर पूरी तरह कब्जा करना था। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि आरएसएस ने एक-एक करके निर्वाचन आयोग, ख़ुफ़िया एजेंसियों, जांच एजेंसियों, आयकर विभाग, विश्वविद्यालयों इत्यादि संस्थानों पर कब्जा शुरू कर दिया। सब लोग जानते हैं विश्वविद्यालयों  में कुलपतियों की नियुक्ति कैसे होती है!

उन्होंने कहा है सबसे बड़ा एंटी- नेशनल काम जो आप कर सकते हैं, वह है वोट चोरी। वोट चोरी से बड़ा कोई एंटी- नेशनल काम नहीं है, क्योंकि जब आप वोट को ख़त्म करते हैं, आप इंडिया के आइडिया को ख़त्म करते हैं!लोकतान्त्रिक ढाँचे की पूरी ताकत वोट में निहित है ।यदि आम नागरिक का वोट सुरक्षित नहीं रहा, तो लोकसभा, विधानसभा  या पंचायत किसी का भी कोई अर्थ नहीं रह जायेगा! 

 हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य देश के समस्त संस्थान सहित शक्ति के समस्त स्रोत अपर कास्ट के पुरुषों के हाथों में सौंपना 

वैसे तो बहुत दिनों से ढेरों लोग कहते रहे हैं कि संघ का सपना देश के संस्थानों पर कब्ज़ा जमाना और भारत को सेकुलर की जगह हिन्दू राष्ट्र घोषित करना है, लेकिन 2025 के जाते –जाते जिस तरह न्यूयार्क टाइम्स और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस अप्रिय सच्चाई को खुलकर सामने लाया है,उससे संदेह  नहीं रह जाना चाहिए कि  राजनीति के साथ सेना, न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, अर्ध सैन्य बल, कारपोरेट, बिजनेस घरानों, शिक्षण संस्थानों यानी हर क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर पर इसकी ऐसी घुसपैठ हो चुकी है कि इससे  देश को निकाल पाना मुश्किल होगा ! यह इतना बड़ा खतरा है,जिसकी उपलब्धि राहुल गांधी की तरह देश के बहुत कम नेता और बुद्धिजीवी का पाए हैं!

अगर राहुल गांधी की तरह सभी इस खतरे को भांप पायें होते, देश का राजनीतिक माहौल कुछ और होता: तब राहुल गांधी की भांति तमाम गैर- भाजपाई दलों के नेता संघ- भाजपा के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने की मुद्रा अख्तियार किये नजर आते। बहरहाल  संघ विरोधियों के साथ एक बड़ी समस्या यह भी है कि उनके हिसाब से आरएसएस की विचारधारा ईसाइयों और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत की बुनियाद पर खड़ी है और उसके प्रभाव विस्तार से सबसे ज्यादा ज्यादा क्षति ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यकों की होगी। जबकि सच्चाई यह है कि सेकुलर की जगह हिन्दू राष्ट्र घोषित होने पर सबसे ज्यादा नुकसान दलित, आदिवासी, पिछड़े और हिन्दुओं की आधी आबादी सहित 90 प्रतिशत निम्न जाति/ वर्ण के हिन्दुओं और महिलाओं को होगा: हिन्दू राष्ट्र में लाभ की स्थिति में रहेंगे सिर्फ और सिर्फ हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग (मुख- बाहु- जंघे) से जन्मे ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य वर्णों के पुरुष ,जिनकी आबादी वर्तमान भारत में बमुश्किल 7-10%है।

क्योंकि, हिन्दू राष्ट्र में देश हिन्दू धर्माधारित जिन कानूनों के जरिये परिचालित होगा, उसमें दलित- आदिवासी ,पिछड़े और आधी आबादी से युक्त 90% आबादी के लिए शक्ति के स्रोतों(आर्थिक- राजनीतिक- शैक्षिक और धार्मिक) का भोग अधर्म घोषित होगा : शक्ति के समस्त स्रोतों के भोग के दैवीय – अधिकारी सिर्फ ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्यों के पुरुष होंगे। कुल मिलाकर संघ अपने जन्मकाल से हिन्दू राष्ट्र का जो सपना देख रहा है, उसका लक्ष्य देश के समस्त संस्थान  सहित शक्ति के समस्त स्रोत अपर कास्ट के पुरुषों के हाथ में सौंपना है, यह 2025 के  कुम्भ में जारी हिन्दू राष्ट्र के संविधान से फिर स्पष्ट हो गया है !                               

 2025 में हिन्दू राष्ट्र का संविधान और राष्ट्र प्रेरणा स्थल के जरिये संघ ने जाहिर कर दिए हैं अपने इरादे

2025 को नई सदी का सबसे दहशत भरा साल बनाने के साथ इस वर्ष संघ परिवार ने दो ख़ास कामों के जरिये भविष्य के अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं । पहला काम उन्होंने 2025 के जनवरी में कुम्भ में हिन्दू राष्ट्र के संविधान का स्वरूप जाहिर करके किया, जिसे संघ अपने राजनीतिक संगठन के जोर से जमीन पर उतारने का वर्षों से सपना देखता रहा है । इसे 12 महीने 12 दिन में 25 विद्वानों ने मिलकर तैयार किया है, जिसके पीछे चारों पीठ के शंकराचार्यों की सहमति है।

501 पन्नों के इस संविधान की निर्माण समिति में उत्तर भारत के 14 और दक्षिण भारत के 11 विद्वान शामिल किए गए हैं। संविधान निर्माण समिति ने धर्मशास्त्रों के साथ ही रामराज्य, श्रीकृष्ण के राज्य, मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के बाद हिंदू राष्ट्र के संविधान को तैयार किया है। संविधान निर्माण समिति में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के विद्वान भी शामिल रहे।

इसके संरक्षक शांभवी पीठाधीश्वर के अनुसार 2035 तक हिंदू राष्ट्र की घोषणा का लक्ष्य रखा गया है। संविधान के अनुसार एकसदनात्मक व्यवस्थापिका होगी और सदन का नाम संसद नहीं हिंदू धर्म संसद होगा। हर संसदीय क्षेत्र में एक धर्म सांसद निर्वाचित होगा। पूरे देश में 543 धर्म सांसद निर्वाचित होंगे। धर्मसांसद के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 और मतदान करने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 16 वर्ष होगी।चुनाव लड़ने और लड़ाने का अधिकार केवल सनातन धर्म के अनुयायियों, भारतीय उप महाद्वीप के पंथ जैन, बौद्ध व सिख मत के अनुयायियों को होगा। विधर्मियों को मताधिकार से वंचित किया जायेगा।

धर्मसांसद बनने के लिए उम्मीदवार को वैदिक गुरुकुल का छात्र होना अनिवार्य होगा। हिंदू राष्ट्र में हिंदू न्याय व्यवस्था लागू की जाएगी।यह संसार की सबसे प्राचीन न्याय व्यवस्था है।राष्ट्राध्यक्ष के नियंत्रण में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश होंगे। कोलेजियम जैसी कोई व्यवस्था नहीं रहेगी। भारतीय गुरुकुलों से निकलने वाले सर्वोच्च विधिवेत्ता ही न्यायाधीश के पद को सुशोभित करेंगे। सभी को त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। झूठे आरोप लगाने वालों पर भी दंड का विधान होगा। दंड सुधारात्मक होंगे। हिंदू राष्ट्र में प्राचीन वैदिक गुरुकुल प्रणाली को लागू किया जाएगा।

अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को गुरुकुलों में परिवर्तित किया जाएगा और शासकीय धन से संचालित सभी मदरसे बंद किए जाएंगे। मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियों का व्यावहारिक उपयोग किया जाएगा। पिता की मृत्यु के उपरांत श्राद्ध करने वाला उत्तराधिकारी होगा। एक पति, एक पत्नी प्रथा चलेगी।हिंदू विधि का अंतिम व सर्वोच्च उद्देश्य वर्णाश्रम व्यवस्था की पुन: स्थापना है। कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था को विधिक रूप दिया जाएगा!

अगर 2025 के जनवरी के शेष में संविधान का प्रारूप सामने आया तो दिसंबर के शेष में मोदी- योगी ने लखनऊ में कमल  के फूल की आकृति में डिजायन किया गया ‘ राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ लोक के हवाले किया। 6300 वर्गमीटर क्षेत्रफल में फैले म्यूजियम में लोग पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी , श्यामा प्रसाद मुखर्जी और कथित एकात्म मानववाद के प्रणेता रहे डीडी उपाध्याय के जीवन संघर्ष से प्रेरणा लेंगे। इस क्रम में संघ का प्रयास रहेगा कि लोग महामना फुले, शाहू जी महाराज ,बाबा साहेब आंबेडकर, मान्यवर कांशीराम, नारायणा गुरु इत्यादि बहुजन महापुरुषों की जगह वर्ण- व्यवस्था के पोषक उन तीन ब्राह्मणों से प्रेरणा लें, जिनका आजादी के आन्दोलन में कोई योगदान नहीं एवं जो सोच से ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पोषक रहे। 2025 में सबसे खतरनाक संकेत हिन्दू राष्ट्र के संविधान में कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था को विधिक रूप देने की घोषणा करके दिया गया है! 

कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था के खतरे

संघ हिन्दू राष्ट्र में जो वर्ण- व्यवस्था लागू करना चाहता है, वह देश के बहुसंख्य लोगों के लिए कितनी घातक,  इसे जानने के लिए कर्म आधारित  वर्ण- व्यवस्था की विशेषता जान लेना ज़रूरी है। दैवीय- सृष्टि वर्ण- व्यवस्था उस हिन्दू धर्म का प्राणाधार है, जिसका संघ अघोषित रूप से ठेकेदार बने बैठा है। जिसे हिन्दू धर्म धर्म कहा जाता है, सदियों से उसका अनुपालन कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था के जरिए होता रहा है। हिन्दू धर्म का प्राणाधार वर्ण- व्यवस्था मूलतः शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक , शैक्षिक और धार्मिक – के बंटवारे की व्यवस्था के रूप में क्रियाशील  रही। शक्ति के स्रोतों का बंटवारा चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रातिशूद्रों के लिए निर्दिष्ट पेशे/ कर्मों के जरिये किया गया।

विभिन्न वर्णों के लिए निदिष्ट कर्म ही उनके धर्म रहे। वर्ण – व्यवस्था में ब्राह्मण का धर्म(कर्म ) अध्ययन- अध्यापन , राज्य संचालन  में मंत्रणा- दान और पौरोहित्य रहा। क्षत्रिय का धर्म भूस्वामित्व, सैन्य- वृत्ति एवं राज्य –संचालन रहा , जबकि वैश्य का कर्म(धर्म) पशुपालन एवं व्यवसाय- वाणिज्य रहा। शुद्रातिशूद्रों का धर्म(कर्म) रहा तीन उच्चतर वर्णों (ब्राह्मण- क्षत्रिय और वैश्यों) की निःशुल्क सेवा। वर्ण- धर्म में पेशों की विचलनशीलता निषिद्ध रही, क्योंकि इससे कर्म- संकरता की सृष्टि होती और कर्म-संकरता धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह पाप व निषिद्ध घोषित रही।

कर्म-संकरता की सृष्टि होने पर इहलोक में राजदंड तो परलोक में नरक का सामना करना पड़ता। धर्मशास्त्रों द्वारा पेशे/ कर्मों के विचलनशीलता की निषेधाज्ञा के फलस्वरूप वर्ण- व्यवस्था ने एक आरक्षण – व्यवस्था: हिन्दू आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया , जिसमें भिन्न- भिन्न वर्णों के निर्दिष्ट पेशे/कर्म, उनके लिए अपरिवर्तित रूप से चिरकाल के लिए आरक्षित होकर रह गए। इस क्रम में हिन्दू आरक्षण में ब्राह्मणों के लिए पौरोहित्य व बौद्धिक पेशे तो क्षत्रियों के लिए भूस्वामित्व, राज्य संचालन और सैन्य-कार्य तो वैश्यों  के लिए पशु-पालन व व्यवसाय- वाणिज्य के कार्य चिरकाल के लिए आरक्षित होकर रह गये।हिन्दू आरक्षण में शुद्रातिशूद्रों के हिस्से में शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक , धार्मिक – एक कतरा भी नहीं आया:वे चिरकाल के लिए सवर्णों के निःशुल्क गुलाम और दुनिया के सबसे अशक्त मानव समुदायों में तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुए!

बिना देर किये हिन्दू राष्ट्र के खिलाफ घोषित हो: आजादी की दूसरी लड़ाई 

आज की तारीख में आरएसएस विश्व के सबसे विशाल संगठन का आकार धारण कर चुका है और भाजपा के सहारे वह  प्रायः अप्रतिरोध्य बन चुका है। ऐसे में कोई शक नहीं कि वह 2035 तक कर्म आधारित वर्ण- व्यवस्था के जरिये परिचालित होने वाला हिन्दू राष्ट्र का संविधान लागू करवाने में सफल हो जायेगा।वर्तमान की अप्रिय सच्चाई यह है राजनीति के साथ सेना, न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, अर्ध सैन्य बल, कारपोरेट, बिजनेस घरानों, शिक्षण संस्थानों यानी हर क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर इसकी ऐसी घुसपैठ हो चुकी है कि इससे  देश को निकाल पाना मुश्किल हो चुका है।

ऐसे में निकट भविष्य में जब संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के सहारे कर्म आधारित वर्ण – व्यवस्था लागू करेगा , तब जहां शक्ति के समस्त स्रोतों पर सवर्णों का कब्ज़ा हो जायेगा, वहीं दलित, आदिवासी, पिछड़े , अल्पसंख्यक और आधी आबादी सहित देश की 90% से अधिक वंचित जनता सवर्णों का निःशुल्क गुलाम होने के साथ इतना असहाय हो जायेगी कि उसके लिए आजादी की एक और लड़ाई लड़ने से भिन्न कोई उपाय ही नहीं बचेगा !

तब गुलामों की स्थिति में पहुंची देश की 90% आबादी को बचाने के लिए उसी तरह आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ेगी जैसे गुलाम भारत में महात्मा गांधी ने पराधीन भारतीयों के पक्ष में अंग्रेजों के खिलाफ और दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने वहां के गोरों के खिलाफ लड़ी। आजादी की लड़ाई सिर्फ भारत और दक्षिण अफ्रीका में ही नहीं दुनिया के अन्य असंख्य देशों में भी लड़ी गई। जिन हालातों में दुनिया भर में आजादी की लड़ाइयाँ लड़ी गईं, वे हालात संघी शासन में बहुत जल्द बनने वाले हैं, खासतौर से 2035 के बाद ज़रूर बन जाएंगे, जब हिन्दू राष्ट्र का संविधान लागू होगा ।स्मरण रहे दुनिया में हर जगह आजादी की लड़ाइयां शासक और शोषितों के मध्य शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे को लेकर शुरू हुईं!

शासक और गुलाम में फर्क यह होता है कि जो शासक होते हैं, उनका शक्ति के समस्त स्रोतों पर एकाधिकार होता है, जबकि गुलाम इससे वंचित व बहिष्कृत होते हैं।  दुनिया के जिन-जिन देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए, अगर वहां के शासकों ने  अपने- अपने देश के गुलामों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिया होता, क्या  भारत , दक्षिण अफ्रीका सहित दुनिया के किसी भी देश में आजादी के जंग की नौबत   आती?  संघ के हिन्दू राष्ट्र के सपने के जोर से बहुत जल्दी वे हालात बनने वाले हैं, जिन हालातों में आजादी की लड़ाइयाँ शुरू हुईं! ऐसे में जबकि निकट भविष्य में जंगे आजादी में उतरना अवधारित लग रहा है, क्यों न बिना देर किए  अभी से बहुजन हितैषी दल भावी हिन्दू राष्ट्र के खिलाफ आजादी की दूसरी लड़ाई की घोषणा कर दें !

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ही लड़ सकती है; आजादी की दूसरी लड़ाई 

बहरहाल आज जबकि 90% से अधिक आबादी को गुलामी के पंक से निकालने के लिए हिन्दू राष्ट्र के बरक्स दूसरी आजादी की लड़ाई की जरुरत महसूस हो रही है, ऐसे में सवाल उठता है इसके लिए कौन सा दल सामने आएगा! कौन सा दल 90 प्रतिशत आबादी को गुलामी से निजात दिलाने के लिए आजादी की दूसरी लड़ाई का  हुंकार भरेगा, इसकी तलाश में निकलने पर कांग्रेस को छोड़कर कोई भी दल दूर-दूर तक नजर नहीं आता। जैसा कि पूर्व पंक्तियों में कहा गया है कि संघ ने तमाम संस्थानों पर कब्ज़ा जमाकर देश के समक्ष जो संकट खड़ा कर दिया है, उसकी उपलब्धि राहुल गांधी की तरह देश के बहुत कम नेता और बुद्धिजीवी कर पाए हैं!

अगर राहुल गांधी की तरह सभी इस खतरे को भांप पाए  होते, देश का राजनीतिक माहौल कुछ और होता: तब राहुल गांधी की भांति तमाम गैर- भाजपाई दलों के नेता संघ- भाजपा के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने की मुद्रा अख्तियार किये नजर आते। लेकिन ऐसा कोई चेहरा सामने नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में ले देकर उम्मीद राहुल गांधी और कांग्रेस पर ही टिक जाती है। स्मरण रहे 2025 के 13 जनवरी को ग्वालियर के एक आयोजन में मोहन भागवत ने कह दिया था कि ‘15 अगस्त , 1947 को देश को सिर्फ राजनीतिक आजादी मिली : असली आजादी 22 जनवरी , 2024 को राम मदिर की प्राण- प्रतिष्ठा के दिन मिली!’ 

संघ प्रमुख के उस बयान ने राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया था!लेकिन भारी विस्मय की बात है कि संग-संग संघ प्रमुख के बयान का खंडन करने के लिए विपक्ष के सुप्रीमो टाइप नेताओं में सामने कोई नहीं आया: सामने आए  राहुल गांधी ही! उन्होंने 15 जनवरी को कांग्रेस के नए मुख्यालय के उद्घाटन के अवसर पर मोहन भागवत के अजादी वाले बयान पर कहा कि ‘जो व्यक्ति 1947 की आजादी को आजादी नहीं मानता, वह  गद्दार है और अन्य किसी देश में ऐसा बयान देता तो उस पर  राजद्रोह का  मुकदमा चलाया जाता। देश में आरएसएस और भाजपा के खिलाफ सिर्फ राजनैतिक लड़ाई की आवश्यकता नहीं है।

इन संगठनों ने भारत के लोकतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाओं और भारतीय राज्य पर कब्जा कर लिया है। इससे डटकर मुकाबला कोई कर सकता है तो वह सिर्फ और सिर्फ  कांग्रेस पार्टी है। कांग्रेस पार्टी ने लोगों के साथ मिलकर संविधान की बुनियाद पर, भारत की सफलता का निर्माण किया है।लोगों के अधिकारों के कवच, संविधान की रचना से लेकर रक्षा तक का दायित्व कांग्रेस ने निभाया है। हमारा नया मुख्यालय हमारी इस समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और विजन का प्रतीक है। हमारी परम्पराएं, जड़ें और वजूद भारत की आत्मा में गहराई से बसे हुए हैं। इसी रास्ते पर चलते हुए हम आगे भी न्याय , समानता और संविधान की लड़ाई लड़ते रहेंगे!’

राहुल गांधी पर इसलिए होता है भरोसा  

आजादी की दूसरी लड़ाई की जरुरत संघ के हमविचार लोगों के कब्जे से देश की संस्थाओं को मुक्त करने के साथ – साथ दलित, आदिवासी, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों को न्याय, संस्थाओं में हिस्सेदारी दिलाने के लिए है और आँख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है कि राहुल गांधी इस लड़ाई को नेतृत्व दे सकते हैं!  वह आज नहीं,  फरवरी ,2023 के रायपुर अधिवेशन से ही , जहां इतिहास में कांग्रेस ने पहली बार सामाजिक न्याय का पिटारा खोला, लगातार दलित, आदिवासी ,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों न्याय और हिस्सेदारी दिलाने की बात बात जोर-शोर से उठाते रहे हैं।

खासकर 14 जनवरी, 2024  से शुरू हुई ‘भारत जोड़ों न्याय यात्रा’ से इस दिशा में नई-नई उंचाई छूते गए। भारत जोड़ों न्याय यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने आर्थिक और सामाजिक अन्याय को सबसे बड़ी समस्या बताते हुए लगातार संदेश दिया था कि सामाजिक और आर्थिक न्याय लागू करके ही भारत को सुंदर बनाया जा सकता है। इस यात्रा के दौरान बार- बार उन्होंने यह सवाल उछाला था कि कितनी प्राइवेट कंपनियों – अस्पतालों – अखबारों इत्यादि के मालिक और मैनेजर दलित, आदिवासी , पिछड़े हैं! कहने में कोई द्विधा नहीं कि राहुल गांधी ने फरवरी , 2023 मैं रायपुर से निकले सामाजिक न्याय के विचार को दो महीने से अधिक समय तक चली ‘ भारत जोड़ों न्याय यात्रा’ में प्रत्याशा से अधिक ऊँचाई दे दिया था।

भारत जोड़ों न्याय यात्रा में विकसित पांच न्याय से जुड़ा एजेंडा पाँच अप्रैल को ‘न्याय पत्र’ के रूप में जारी कांग्रेस घोषणापत्र के रूप में सामने आया और देखते ही देखते छा गया! 5 अप्रैल, 2025 को जारी हुआ कांग्रेस का घोषणापत्र वास्तव में सामाजिक न्याय का परमाणु बम था , जिसकी अनुगूँज पूरे देश में सुनाई पड़ी और चुनावी फिजा बदल गई। उसमें आरक्षण का 50 प्रतिशत दायरा तोड़ने, महिलाओं को नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण देने, अमेरिका की भांति ही भारत मे डाइवर्सिटी कमीशन(विविधता आयोग) गठित करने, राष्ट्रव्यापी आर्थिक – सामाजिक जनगणना कराने, एससी,एसटी,ओबीसी के लिए आरक्षित सभी रिक्त पदों को एक साल मे भरने, सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में संविदा की जगह स्थायी नौकरी देने, एससी,एसटी वर्ग के ठेकेदारों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक खरीद का दायरा बढ़ाने, सामाजिक न्याय का संदेश फैलाने के लिए बहुजन समाज सुधारकों की जीवनी और उनके कार्यों को विद्यालयों के पाठ्यक्रम मे शामिल करने, शैक्षणिक परिसरों में पसरे भेदभाव को खत्म करने के लिए रोहित वेमुला अधिनियम बनाने सहित ढेरों ऐसी बातें थीं, जिससे चुनाव अभूतपूर्व रूप से सामाजिक न्याय पर केंद्रित हो गया और मोदी किसी तरह केंचुआ के सहारे हारते-हारते बचे।

बहरहाल रायपुर अधिवेशन के बाद राहुल गांधी का आंधी- तूफान की भांति 2024 में सामाजिक न्याय के सबसे बड़े नायक और संविधान के संरक्षक के रुप में जो उदय हुआ, वह अस्थाई न होकर चिरस्थाई हो गया है, जिसका साक्ष्य उनके हर संबोधन में मिल रहा है! पिछले दिनों उन्होंने देश के समक्ष सवाल उछाला था,’देश को चलाता कौन है? किसी भी देश को उसकी उत्पादक शक्ति चलाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर उत्पादक शक्ति देश को कुछ दे रही है: भोजन देती है; औजार देती है; ये इमारतें देती है तो उस शक्ति के खून – पसीने के लिए देश क्या देता हैं?

मेरा लक्ष्य है हिन्दुस्तान में उस उत्पादक शक्ति को रिस्पेक्ट और हिस्सेदारी मिले!’नव वर्ष में उन्होंने बहुत ही दृढ़ता के साथ कहा है ,’ हम आपके साथ हैं और मैं ऐसा दिन देखना चाहता जब हिन्दुस्तान की हर संस्था और हर सिस्टम में, लीडरशिप में दलित, आदिवासी और पिछड़े हों। मैं वह दिन देखना चाहता हूँ जब हिन्दुस्तान की टॉप 10 कंपनियों का  मालिक दलित , आदिवासी पिछड़े वर्ग से  हों और मैं उसके लिए लड़ रहा हूँ और लड़ता रहूँगा !’राहुल गांधी के ये बयान बताते हैं कि दलित, आदिवासी, पिछड़े ,अल्पसंख्यक और आधी आबादी से जुड़ी जिस 90% अधिक वंचित आबादी की मुक्ति के लिए दूसरी आजादी की लड़ाई की जरूरत है, उसको नेतृत्व देने का मन, विजन  और क्षमता किसी के पास है तो वह उन्हीं के पास  हैं!         

आजादी की दूसरी लड़ाई की ज़रूरत खुद कांग्रेस को भी है !

वैसे तो इतिहास की मांग है कि कांग्रेस देश और बहुजन हित में संघ के  ‘हिन्दू राष्ट्र’ के बरअक्स ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ में उतरे! लेकिन इतिहास की मांग को सम्मान करने के साथ खुद एकाधिक कारणों से स्व-हित में भी कांग्रेस के लिए आजादी की दूसरी लड़ाई में उतरना ज़रूरी है। राहुल गांधी ने महीना भर पहले बर्लिन के एक स्कूल में विद्वानों को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस ने देश की संस्थाओं को बनाया, लेकिन कभी उन्हें अपनी जागीर नहीं समझा.. हमने उन्हें देश की संस्थाएं ही माना ! बीजेपी इन्हीं संस्थाओं का इस्तेमाल अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए कर रही है। इसलिए विपक्ष की लड़ाई सिर्फ भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि इन संस्थाओं पर उसके नियंत्रण के खिलाफ है।

ऐसे में जब देश की संस्थाओं का निर्माण खुद कांग्रेस ने किया है तो उन्हें बीजेपी के नियंत्रण से मुक्त करने के लिए आजादी की दूसरी लड़ाई में उतरना कांग्रेस का नैतिक कर्तव्य बन जाता है।राहुल गांधी और उनकी पार्टी को औरों से बेहतर पता होगा कि मानव जाति के समग्र इतिहास में चंगेज खान, एटिला द हूण, हिटलर, मुसोलिनी जैसे एक से एक संहारक शक्तियों का उदय धरा पर हुआ , किन्तु विश्व के क्रूर से क्रूरतम शासक ने भी अपने गुलामों को धन-धरती से महरूम करने का उपाय जरुर किया, किन्तु शिक्षा, अच्छा नाम रखने और धार्मिक क्रियाकलापों से दूर रखने जैसा जघन्य काम अंजाम नहीं दिया।

ऐसा काम सिर्फ हिन्दू धर्म को मानने वाले शासकों ने किया। लेकिन हिन्दू शासकों ने ऐसा  किया भी तो बर्बर युग में किया । लेकिन आज के सभ्यतर युग में भी हिन्दू धर्म का ठेकेदार संघ परिवार हिन्दू राष्ट्र के जरिए विश्व की विशालतम आबादी को शिक्षा, धार्मिक गतिविधियों , अच्छा नाम रखने इत्यादि से महरूम करने  की भयावह परिकल्पना कर रहा है। उसके ऐसे घृणित मंसूबों पर पानी फेरने के लिए ज़रूरी है कि कांग्रेस आजादी की एक और लड़ाई में उतरे! कांग्रेस ने आजादी की जो सफल लड़ाई लड़ी उसका मकसद सिर्फ अंग्रेजों के हाथ से सत्ता छीनना न होकर देश के नवनिर्माण और शक्ति के स्रोतों में सबको वाजिब हिस्सेदारी सुलभ कराना था और इसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रही थी ।

लेकिन संघी सत्ता ने कांग्रेस द्वारा खड़े किये गए उपक्रमों को औने-पौने दामों में बेच एवं देश की संस्थाओं का स्व-हित में इस्तेमाल करने के साथ जिस तरह शक्ति के समस्त स्रोत हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे लोगों को सौपने का महाघृणित काम अंजाम दिया , उससे कांग्रेस के आजादी की ऐतिहासिक लड़ाई का मकसद काफी हद तक व्यर्थ हो गया है। 2024 के मई में आई वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब के मुताबिक देश के 89% धन-संपदा पर संघ के चहेते अपर कास्ट का कब्ज़ा हो गया है और दलित-आदिवासी 2।6 % धन पर, जबकि  विशाल पिछड़ा समाज मात्र 9% वेल्थ पर गुजर-बसर करने के लिए विवश है। वहीँ विश्व में सबसे ज्यादा बदहाली का शिकार भारत की आधी की आधी आबादी को ग्लोबल जेंडर गैप की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक पुरुषों की बराबरी में आने 257 साल लगने हैं। इस सूरत को बदले बिना कांग्रेस आजादी के अपने संघर्ष पर गर्व नहीं कर सकती!

दलित बहुजनों को राहुल गांधी से है: दूसरी आजादी की उम्मीद!  

कांग्रेस आज जिस भाजपा को शिकस्त देने के लिए संघर्ष कर रही है, वह भाजपा आज की तारीख में न सिर्फ अप्रतिरोध्य बन चुकी है, बल्कि ऐसी-ऐसी शातिराना चालें  चल रही है कि कांग्रेस उद्भ्रांत सी हो गई है। इसलिए वह लगातार विभिन्न मुद्दों पर आन्दोलन चलाती रहती है। आज वह वोट चोरी के बाद मनरेगा के स्वरूप पर हमले के खिलाफ जोरदार तरीके से आंदोलित है।ऐसा करके वह प्रमुख विपक्षी दल का कर्तव्य तो निभा रही है पर, इसका अवाम के बीच इसका खूब प्रभावी संदेश नहीं जा पा रहा है!लोगों को लगता है कांग्रेस के पास वैसी विचारधारा नहीं है, जैसी भाजपा के पास है!

यदि कांग्रेस भाजपा के हिन्दू राष्ट्र के बरक्स आजादी की दूसरी लड़ाई की घोषणा कर दे तो उसे ऐसा मुद्दा मिल जायेगा ,जिसके समक्ष हिन्दू राष्ट्र का सपना भी बौना लगने लगेगा और कांग्रेस को काफी माइलेज मिल जायेगा! राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राहुल गांधी द्वारा लोकप्रियता की सारी हदें पार करने के बावजूद कांग्रेस अपने दुर्दिन से अब तक इसलिए नहीं उबर पाई है, क्योंकि अब तक वह दलित, आदिवासी ,पिछड़े और अल्पसंख्यको का भरोसा पूरी तरह से जीत नहीं पाई है! इस बात को स्वीकारते हुए खुद राहुल गांधी ने पिछले साल महात्मा गांधी के शहादत दिवस पर दिल्ली में आयोजित दलित इंफ्लूएंसरों को सभा में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी। तब उन्होंने कहा था,’ हमने दलितों , पिछड़ों , अति पिछड़ों का विश्वास बरकरार रखा होता तो आरएसएस कभी सत्ता में नहीं आ पाता।। इंदिरा जी के समय पूरा भरोसा बरकरार था ।

दलित, आदिवासी , पिछड़े और अल्पसंख्यक सब जानते थे कि इंदिरा जी उनके लिए लड़ेंगी। लेकिन 1990 के बाद विश्वास में कमी आई है। इस वास्तविकता को कांग्रेस को स्वीकार करना पड़ेगा । पिछले 10- 15 सालों में कांग्रेस ने जिस प्रकार आपके हितों की रक्षा करनी थी , नहीं कर पाई।’  उन्होंने अपने संबोधन में यह भी याद दिलाया था कि मौजूदा ढाँचे में दलित और पिछड़ों की समस्याएं हल नहीं होने वाली हैं। क्योंकि बीजेपी और आरएसएस ने पूरे सिस्टम को नियंत्रण में ले लिया है। दलित और पिछड़े वर्गों के लिए दूसरी आजादी आने वाली है, जिसमें सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए नहीं  लड़ना है, बल्कि संस्थाओं और कार्पोरेट जगत में हिस्सेदारी लेनी होगी।’ हो सकता है कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व साल भर पहले जननायक राहुल गांधी द्वारा की गई उस स्वीकारोक्ति को भूल गया हो, लेकिन दलित – बहुजन नहीं भूले हैं !

वे इस उम्मीद में रोजाना भारी संख्या में कांग्रेस से जुड़ते जा रहे हैं कि एक दिन उन्हें भी कांग्रेस और राहुल गांधी के सौजन्य से सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर प्राइवेट कंपनियों , विश्वविद्यालयों, बड़े-बड़े अस्पतालों , अख़बारों , चैनलों का मालिक और मैनेजर बनने का अवसर मिलेगा!ऐसे में कांग्रेस यदि आजादी की दूसरी लड़ाई में उतरने की घोषणा करते हुए कह दे कि वह  राजनीति के साथ सेना, न्यायपालिका, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, अर्ध सैन्य बल, कारपोरेट, शिक्षण संस्थानों इत्यादि को संघ के चहेते वर्ग के एकाधिकार से मुक्त कर,  उसमें  दलित – आदिवासी ,  पिछड़ों , अति पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के स्त्री- पुरुषों को वाजिब हिस्सेदारी देगी: स्थिति रातोंरात बदल जायेगी! तब कांग्रेस के पक्ष में वोटों का ऐसा सैलाब उमडेगा कि केचुआ के साथ मिलकर संघ- भाजपा ने ईवीएम, एसआईआर के सहारे विपक्ष की राह में जो दीवार खड़ी की है वह तिनकों की भांति बह जाएगी!

(लेखक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ओबीसी विभाग के आइडियोलॉजिकल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं।)

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