मुनरो से डुनरो के बीच का फासला दो सौ साल का है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र में जब अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को पढ़ाया जा रहा था, तब मुनरो के ‘सिद्धांत’ को एक अनिवार्य सवाल की तरह पढ़ना पड़ा था। यहां सिद्धांत थियरी का अनुवाद नहीं, डाॅक्ट्रीन का अनुवाद है। अमेरीका ब्रिटेन से आजाद होकर एकीकरण के प्रयासों में लगा। पूंजीवाद ‘अमेरिकन’ का रूप ले चुका था। अमेरीका के बाहर यूरोप दुनिया के बंटवारे में लगा हुआ था। जापान का उद्भव अभी नहीं हुआ था।
अमेरीकी साम्राज्यवाद को ‘अपने उपनिवेश’ की जरूरत थी। उसने इसके लिए सबसे मुफीद जगह दक्षिणी अमेरीका को पाया। यहां किसी मजबूत यूरोपीय साम्राज्यवाद की उपस्थिति नहीं थी।
स्पेन जैसे देश पूंजीवादी विकास में घिसट कर चल थे और इस द्वीप में इसकी उपस्थिति काफी कमजोर हो चली थी। मुनरो ने इसी दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप में ‘अपना उपनिवेश’ बनाने के लिए यूरोपीय शक्तियों को यहां नये उपनिवेश न बनाने का सिद्धांत प्रस्तुत किया और यहां के उभरे नये देशों में किसी भी तरह के हस्तक्षेप करने को ‘अपने खिलाफ’ शत्रुतापूर्ण कार्यवाही की तरह देखने की नीति को प्रस्तुत किया।
यह अहस्तक्षेप के सिद्धांत के साथ-साथ खुद को संरक्षक देश की तरह प्रस्तुत करने की वह नीति थी जो ब्रिटिश और फ्रेंच उपनिवेशवादियों से भिन्न थी। यह एक नये तरह का उपनिवेशवाद था जिसे ‘नव-उपनिवेशवाद’ का नाम दिया गया।
नवम्बर-दिसम्बर में जब अमेरीका ट्रम्प के नेतृत्व में एक नये तरह की ‘सुरक्षा के सिद्धांत’ को अंतिम रूप देने में लगा था तब वह एक ओर इजरायल के कब्जा अभियान को समर्थन देने और यूक्रेन को रूस के हवाले कर देने के लिए आगे बढ़ चुका था। जब नई रणनीति अंतिम रूप में प्रकाशित हुई तब इसमें दक्षिणी अमेरीकी देशों पर अमेरीकी नियंत्रण पर काफी जोर दिया गया था। अनायास ही इस जोर ने मुनरो के सिद्धांत की याद दिला दिया।
हालांकि, तब और अब के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में काफी फर्क आ चुका है। उस समय दुनिया का सबसे बड़े साम्राज्यावादी देश ब्रिटेन का दायरा सिमटता गया है और नीतियों के मामले में काफी हद तक अमेरीका पर ही निर्भर रहने लगा है। अफ्रीका, एशिया का राजनीतिक मानचित्र काफी कुछ बदल चुका है।
दो विश्वयुद्धों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति काफी बदल दिया और अमेरीका साउथ-ईस्ट और मिडिल -ईस्ट में अपनी सैन्य रणनीतियों के साथ उतरकर ‘संप्रभु राष्ट्रों’ को तबाह करने और यहां के संसाधनों पर कब्जा करने की नीति पर चल निकला। मुनरो के समय का नवउपनिवेशवाद 1970 के दशक में उपनिवेशवाद में बदल चुका था। ‘वैश्वीकरण’ की आकांक्षाएं इस उपनिवेशवाद से किसी भी तरह अलग नहीं थीं।
ट्रम्प के नेतृत्व में आई अमेरीका की सुरक्षा रणनीति मुनरो की भले ही याद दिला दे लेकिन व्यवहार में यह पूंजीवादी साम्राज्यवाद की खुली डकैती, लूट और कब्जा अभियान है जिससे होने वाली तबाही इंसानियत पर सबसे बड़ा धब्बा होता है। पिछले छह महीनों में वेनेजुएला पर अमेरीकी दबदबा वहां की राष्ट्रीय संपत्ति पर कब्जा जमाने और लूटने में अभिव्यक्त हो रहा था।
ट्रम्प शांति का नोबेल पुरस्कार पाने का अभियान चला रहे थे जबकि वहां गुप्तचर एजेंसियां नोबेल प्रबंधन समिति के माध्यम से पुरस्कार की राजनीति करते हुए वहां राजनीतिक अस्थिरता बनाने का प्रयास करने में लगी हुई थीं। सफल न होने पर सीधे एक चुने हुए राष्ट्रपति पर डकैतों की तरह हमला किया गया और उनका अपहरण कर अमेरीका ले जाया गया। उन पर कथित तौर पर ‘कानूनी मुकदमा’ चलाया जा रहा है।
यह दुनिया के सामने खेला जा रहा न्याय का सबसे बड़ा प्रहसन है जिसके सामने फ्रेंज काफ्का का ‘द ट्रायल’ भी फीका लगेगा। हमने इस प्रहसन में सद्दाम हुसैन की हत्या का पूरा नजारा देखा है।
डोनाल्ड ट्रम्प की आकांक्षाएं लातिन अमेरीका तक कतई सीमित नहीं है। यह दुनिया को फिर से बांटने का वह अभियान है जिसके बिना अमेरिकी साम्राज्यवाद खड़ा रह सकने में अक्षम पा रहा है। वह रूस को पूर्वी यूरोप तक सीमित रखना चाह रहा है। वह चीन को मध्य एशिया, लातिन अमेरीका और अफ्रीका से बाहर रखना चाह रहा है। ईरान और इजरायल के बीच हुए युद्ध के बाद अमेरिका काफी बौखलाया हुआ है और ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करने के लिए बेचैन है।
ईरान ने युद्धक हथियारों के मामले में काफी बढ़त ली है जिसमें चीन और रूस दोनों ने ही उसे सहयोग दिया है। चीन ने पूंजीवाद की खुली साम्राज्यवादी नीति, जिसमें उपनिवेश होना एक शर्त की तरह है, से भिन्न रास्ता लेकर अमेरिकी साम्राज्यवाद को गहरा धक्का दिया है और उस धक्के से अमेरीका का संभलने में दिक्कत भी हो रही है। अमेरीका रूस को यूक्रेन पर कब्जा हो जाने देना चाह रहा है और इसके बदले में रूस से तटस्थता की उम्मीद कर रहा है।
यदि हम आंकड़ों में जाएं तब हमें साफ दिखता है कि वेनेजुएला में चीन का हित सबसे अधिक जुड़ा हुआ है। चीन वेनेजुएला से तेल और अन्य खनिज खरीदता है और बदले में अपने यहां के बने माल को वहां भेजता है। यह 4 बिलियन डालर से अधिक का व्यापार है जो वेनेजुएला का किसी भी देश से होने वाले लेन-देन में सबसे अधिक है। चीन का प्रभाव सिर्फ वेनेजुएला तक सीमित नहीं है।
उसके आर्थिक परिक्षेत्र में लातिन अमेरीका के देशों के साथ साथ अफ्रीकी देश और ईस्ट एशिया में उसकी उपस्थिति को देखा जा सकता है। चीन और रूस का युद्ध से जुड़े उपकरणों के व्यापार में, जो पूरी दुनिया के कारोबार में बड़ी भूमिका निभाता है, पहले की तुलना में काफी अधिक हिस्सा बना है। यह अमेरिकी और यूरोपीय पूंजीवादी वर्चस्व का चुनौती दे रहा है।
अमेरीका ने वेनेजुएला के संदर्भ में जो कल बयान दिया है वह उस पर ‘कब्जे की संप्रभुता’ को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र में फैलाकर पेश कर रहा है। उसने वेनेजुएला के तेल से भरे उस टैंकर को कब्जे में ले लिया जिसे रूस पहुंचना था और उस पर रूस का झंडा लगा हुआ था। दरअसल, वह इस तरह की सीधी टकराहट से रूस से यूक्रेन पर टिक जाने और चीन पर आक्रामक रूख रखने का संदेश दे रहा है। इस माध्यम से वह भारत और इस जैसे देशों को वह चेतावनी भी दे रहा है जो रूस से तेल आयात कर रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प भारत के प्रधानमंत्री मोदी को लेकर जिस तरह की अपमानजनक टिप्पणियाँ समय-समय पर जारी कर रहे हैं, वह कब खतरनाक रूप ले लेगा, कहना मुश्किल है। अमेरिकी रणनीति में भारत की भूमिका चीन के संदर्भ में और उसके खिलाफ होनी है। लेकिन, भारत की चीन पर बढ़ती आर्थिक निर्भरता उसे चीन के खिलाफ जाने से रोक रही है। इस संदर्भ में विदेशमंत्री जयशंकर के बयानों को जरूर देखना चाहिए जिसमें वह चीन की आर्थिक ताकत का हवाला देते हुए उचित संबंध का तर्क रखते हुए दिखते हैं।
स्थिति आज उलट गई है। चीन भारत के मानचित्र को ‘ग्रेजोन’ की रणनीति पर चलते हुए उसे बदलने की ओर आगे बढ़ता जा रहा है। भारत में मोदी के आने के बाद से राजनीतिक नीतियों को मानो सर्द मौसम का पाला मार गया है। विश्वगुरू का दावा करते करते वह दुनिया के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक तरह से गायब दिख रहा है। इसकी आर्थिक स्थिति लगातार तबाही की ओर बढ़ती जा रही है।
सेवा क्षेत्र में हो रहे तकनीकी परिवर्तन में भारत जिस तरह से पिछड़ता जा रहा है, उससे निकट भविष्य में निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। मैन्युफैक्चरिंग की स्थिति बहुत सारे दावों के बावजूद बेहतर होते हुए नहीं दिख रही है। भारत में व्यापार का माहौल बनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में जा रणनीति अपनाई गई उससे फायदा होने की बजाय घाटा होते हुए दिख रहा है।
एक ओर विकास की दर बढ़ी हुई दिख रही है, सकल घरेलू उत्पाद का आंकड़ा और बजट में पेश की गई अर्थव्यवस्था विकास पर रिकार्डतोड़ तरीके से बढ़ रहा है। वहीं आंकड़ों पर अर्थशास्त्री ही नहीं, विश्व बैंक संस्था भरोसे लायक नहीं मान रही हैं। नीति आयोग व्यापार घाटा दिखा रहा है। डालर के मुकाबले रुपैया रिकार्ड स्तर पर नीचे आ गया है। संस्थागत निवेश की स्थिति और भी भयावह है।
हम कुल निवेश में 2024 के मुकाबले 2025 में 29 प्रतिशत की वृद्धि देख सकते हैं। लेकिन, आंकड़ों में यदि उद्योग व वेयरहाउस में निवेश को देखें तब वहां हमें -71 प्रतिशत की गिरावट दिख रही है। रियल स्टेट, ऑफिस और इसी तरह की गतिविधियों में यह 500 प्रतिशत का उछाल लिए हुए है। गांव से लेकर शहर तक में कथित अवैध निर्माणों को हटाने और वहां की जमीनों का कथित तौर विकास के पीछे का अर्थशास्त्र इसी उछाल को दिखा रहा है।
इन आंकड़ों को यदि आप भारत में बढ़ती असमानता के सामने रखें, तब इसका परिदृश्य और साफ दिखाई देगा और इस तरह के निवेश का क्रूर चेहरा और भी साफ दिखेगा।
अमेरीका दुनिया का नक्शा का बदलने में युद्ध की विभीषिका और भी तेजी से बढ़ा रहा है। उसका व्यवहार एक डकैत की तरह हो गया है जो भारत के बाहुबलियों से मिलता जुलता है। कुछ लोग इसे मध्ययुगीन सम्राटों की तरह बता रहे हैं और कुछ लोग उसे सनक भरा तानाशाह बता रहे हैं। दुनिया में जब भी तानाशाही चरम अवस्था में पहुंचती है, इसके किरदार अक्सर मूर्ख, अनपढ़, पागल, हत्या करने के लिए आतुर आदि जैसे दिखते हैं।
इन किरदारों की सारी सनक पूंजीवाद साम्राज्यवाद की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने और युद्ध की स्थितियों में निर्णय लेने में अभिव्यक्त होती है। इस सनक का राजनीतिक-अर्थशास्त्र यही है। ऐसे में ट्रम्प को और उनकी नीति को उनके व्यक्तिगत व्यवहारों से अधिक अमेरीकी साम्राज्यवाद की जरूरतों की रोशनी परखना अधिक जरूरी है।
भारत इन अंतर्राष्ट्रीय हालातों से अलग नहीं है। भारत के पास न तो आज चीन जैसी क्षमता है और न ही रूस जैसी विरासत। इसके पास यूरोपीय देशों जैसा इतिहास नहीं है। आजादी के 75 साल को अमृतकाल बताने के पीछे यहां के हुक्मरानों की क्या मंशा थी, यह साफ नहीं है, लेकिन जो हालात हैं वह काफी दयनीय हैं। यहां श्रमिकों और किसानों की हालात जिस तरह की बना दी गई है उसे यदि किसी माध्यम से व्याख्यायित किया जा सकता है तो वह शब्द ‘उपनिवेशवाद’ ही है।
डा. आंबेडकर ने दलित समुदाय के हालात को अभिव्यक्त करने के लिए जाति व्यवस्था को ‘आंतरिक उपनिवेशीकरण’ की संज्ञा दी थी। भारत में आंतरिक उपनिवेशीकरण की व्यवस्था आज कई स्तरों पर दिख रही है। श्रम पर कब्जा, भूमि पर कब्जा, संसाधनों पर कब्जा होते-होते यह धर्म, संस्कृति और व्यक्तियों पर कब्जा में बदलता जा रहा है। जहां संविधान आड़े आ रहा है वहां उसे भी संशोधित कर किनारे लगा दिया जा रहा है और यह सब संविधान और संसद के नाम पर हो रहा है।
हाल ही में अरावली पहाड़ की परिभाषा को जिस तरह न्यायपालिका ने मुहर लगाकर बदल देने का काम किया उसमें खुद प्रकृति पर इस कब्जा अभियान की शिकार हो गई। इसके पीछे भारत का राजनीतिक अर्थशास्त्र है जो दुनिया के नक्शे पर खुद का खड़ा न कर पाने के कारण वह आंतरिक उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया को ही तेज करने में लगा हुआ है।
मुनरो से डुनरो का सफर साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, नवउपनिवेशवाद और एक बार उपनिवेशवाद की शब्दावलियों और इसके राजनीतिक निहितार्थों के साथ इतिहास और वर्तमान बना रहा है।
भारत उपनिवेशवाद से एक बाद फिर आंतरिक उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में खुद के लिए भयावह घुटन भरे जीवन का एक माॅडल पेश कर रहा है। यहां युवाओं की पीठ पर बूट समेत खड़े होकर न्याय की इबारत लिखी जा रही है और ‘दस मिनट’ की अवधारणा में तीव्र विकास का अर्थशास्त्र पढ़ाया जा रहा है।
देश और दुनिया अलग-अलग नहीं हैं। वेनेजुएला हमारे देश जैसा ही देश है। वहां के रहने वाले लोग हमारे जैसे ही इंसान और नागरिक हैं। गुलामी से मुक्ति की तलाश वहां भी है और यहां भी, बस संदर्भ अलग है निहितार्थ एक जैसे हैं।
(अंजनी कुमार पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं।)