सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार पोक्सो एक्ट में एक “रोमियो-जूलियट” क्लॉज़ लाने पर विचार करे ताकि उन किशोरों को आपराधिक मुकदमों से छूट दी जा सके, जो आपसी सहमति से रिश्ते बनाते हैं, भले ही वे सहमति की उम्र (18 साल) से कम हों और उनके बीच उम्र का मामूली अंतर हो।
जस्टिस संजय कौल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़े मामले में दिए गए फैसले में पोस्ट-स्क्रिप्ट के तौर पर आदेश दिया,
“इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इन कानूनों के दुरुपयोग पर बार-बार न्यायिक संज्ञान लिया गया, इस फैसले की एक कॉपी भारत सरकार के कानून सचिव को भेजी जाए ताकि इस खतरे को रोकने के लिए संभव कदम उठाने पर विचार किया जा सके, जिसमें मुख्य रूप से एक रोमियो-जूलियट क्लॉज़ लाना शामिल है, जो सच्चे किशोर रिश्तों को इस कानून की पकड़ से छूट देगा। एक ऐसा तंत्र भी बनाया जाए जो उन लोगों पर मुकदमा चलाने में सक्षम हो, जो इन कानूनों का इस्तेमाल करके हिसाब बराबर करना चाहते हैं।”
हाईकोर्ट ने नाबालिग को जमानत देते समय जांच एजेंसियों को पीड़ितों की उम्र तय करने के लिए जांच की शुरुआत में ही ऑसिफिकेशन टेस्ट जैसे मेडिकल टेस्ट कराने के लिए व्यापक निर्देश जारी किए।
हाईकोर्ट के व्यापक निर्देशों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के खिलाफ था, जो पीड़ित की उम्र तय करने के लिए धारा 94 के तहत एक अनिवार्य प्रक्रिया बताता है। प्रावधान कहता है कि उम्र पहले मैट्रिक या समकक्ष प्रमाण पत्र के आधार पर तय की जाएगी, ऐसा न होने पर नगर निगम या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र पर भरोसा किया जाएगा। इ
न दस्तावेजों की अनुपस्थिति में ही ऑसिफिकेशन टेस्ट जैसे मेडिकल टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है।
जमानत देने पर हाईकोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप न करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में, हालांकि, फैसले के एक महत्वपूर्ण पोस्ट-स्क्रिप्ट में उन मामलों में पॉक्सो अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग को स्वीकार किया गया, जहां रिश्ता रोमांटिक और आपसी सहमति से होता है, लेकिन पार्टियों में से एक तकनीकी रूप से नाबालिग होता है।
बेंच ने कहा कि ऐसे मुकदमे अक्सर युवा रिश्तों को अपराधी बनाते हैं और न केवल आरोपी बल्कि पीड़ित और उनके परिवारों के लिए भी गंभीर परिणाम होते हैं। एक “रोमियो-जूलियट” क्लॉज़, जिसे कई जगहों पर मान्यता मिली हुई है, वैधानिक रेप कानूनों में एक अपवाद देता है, जहां पार्टियों के बीच उम्र का अंतर बहुत कम होता है और रिश्ता आपसी सहमति से होता है।
इसका मकसद ऐसे मामलों में कठोर कानूनी नतीजों से बचना है, जहां दो किशोरों की उम्र लगभग बराबर होती है और वे मर्ज़ी से रिश्ते में होते हैं। ऐसी स्थितियों को शोषण या दुर्व्यवहार वाले व्यवहार से अलग करना है।
इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसके फैसले की एक कॉपी भारत सरकार के कानून और न्याय मंत्रालय के सचिव को भेजी जाए। साथ ही सुझाव दिया कि विधायिका इस तरह के सुरक्षा उपायों को लागू करने पर विचार करे। कोर्ट ने यह भी सिफारिश की कि ऐसे लोगों को सज़ा देने के लिए एक सिस्टम बनाया जाए, जो निजी दुश्मनी निकालने या सामाजिक दबाव डालने के लिए जानबूझकर पाक्सो एक्ट के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल करते हैं।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)