कहीं राष्ट्र गणतंत्र दिवस के जश्न से महरूम तो नहीं हो जाएगा!


सबसे बड़ा राष्ट्रीय पर्व है गणतंत्र दिवस!

वैसे मुझे पता था, फिर भी यह लेख शुरू करने से पहले मैंने गूगल से पूछा, ‘भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय पर्व स्वाधीनता दिवस या गणतंत्र दिवस?’ जवाब मिला, ‘भारत के तीन मुख्य राष्ट्रीय पर्व: गणतंत्र दिवस (26 जनवरी), स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) और गांधी जयंती (2 अक्टूबर) हैं, और सभी का अपना-अपना महत्व है, लेकिन गणतंत्र दिवस भारत के संविधान लागू होने और देश के एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य बनने का प्रतीक है, जबकि स्वतंत्रता दिवस ब्रिटिश शासन से मिली आज़ादी का जश्न मनाता है, और दोनों ही पर्व देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय पर्व माने जाते हैं, जिनमें गणतंत्र दिवस विशेष रूप से देश के संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को दर्शाता है।

दोनों ही पर्व भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं, लेकिन गणतंत्र दिवस संविधान के लागू होने और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना का प्रतीक होने के कारण विशेष महत्व रखता है, जैसा कि कई स्रोतों से पता चलता है!’

तो यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि आज जो हम गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) मना रहे हैं, वह भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय पर्व और हर्षोल्लास का दिन है, क्योंकि इसी दिन 1950 में देश का संविधान लागू हुआ, जिससे भारत एक संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और लोकतांत्रिक गणराज्य बना, जो नागरिकों को अधिकार, समानता और स्वतंत्रता देता है और हमें अपने नेताओं के बलिदान तथा राष्ट्र-निर्माण के मूल्यों को याद दिलाता है।

यह दिन भारत की लोकतांत्रिक नींव, एकता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है, जो हर नागरिक को अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति जागरूक करता है! यहाँ बहुतों के मन में सवाल उठ सकता है कि हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने 26 जनवरी को ही गणतंत्र दिवस के रूप में क्यों चुना!

गणतंत्र दिवस के तौर पर 26 जनवरी को इसलिए चुना गया

इसका जवाब यह है कि 15 अगस्त, 1947 को स्वाधीन होने वाले भारत का संविधान लागू करने के लिए 26 जनवरी को चुनकर 1930 के पूर्ण स्वराज दिवस की घोषणा को याद किया गया। स्मरण रहे, 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में आज़ादी का जो आंदोलन चला, वह 1919 तक आते-आते विश्व इतिहास का सबसे बड़ा जनांदोलन बन गया। इसके असर में आकर 1929 में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने भविष्य में भारत को डोमिनियन का दर्जा देने की घोषणा कर दी, जिसका कांग्रेस के नेताओं ने स्वागत किया, क्योंकि वे लंबे समय से इसकी माँग कर रहे थे।

किंतु ब्रिटिश जनता के दबाव में इरविन अपने वादे से मुकर गए। इससे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नाराज़ हो गई और उसने डोमिनियन के दर्जे की माँग छोड़कर 19 दिसंबर, 1929 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए अपने लाहौर अधिवेशन में ऐतिहासिक ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव पारित कर दिया।

वह प्रस्ताव 750 शब्दों का छोटा दस्तावेज़ था, जिसमें पूर्ण स्वराज या पूर्ण स्वतंत्रता का दावा किया गया था। साथ ही भारतीयों पर अंग्रेज़ों द्वारा किए जा रहे आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अन्याय को उद्घाटित किया गया था। इसी के परिप्रेक्ष्य में 26 जनवरी, 1930 को भारतीयों से स्वतंत्रता दिवस मनाने का आह्वान किया गया। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अगुआई में 1947 में आज़ादी मिलने के समय तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।

परवर्ती काल में 26 जनवरी के महत्व को बरकरार रखने के लिए ही 1950 के 26 जनवरी से संविधान लागू करने का निर्णय लिया गया। इसी दिन से भारत का वह संविधान काम करना शुरू किया, जिसकी उद्देश्यिका में भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराने की घोषणा हुई। इसी दिन से आज़ादी के संघर्ष के दौरान भारत की जनता से किए गए वादों को पूरा करने की शुरुआत हुई थी!

ऐसे मनाया जाता है गणतंत्र दिवस का उत्सव

बहरहाल पूर्ण स्वराज की घोषणा की याद दिलाता गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) देश में बड़े उत्साह से मनाया जाता है, जिसमें नई दिल्ली में राजपथ पर भव्य परेड होती है। परेड इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक आयोजित की जाती है। इस भव्य परेड में भारतीय सेना के विभिन्न रेजिमेंट, वायुसेना, नौसेना आदि सभी भाग लेते हैं। इस समारोह में भाग लेने के लिए देश के सभी हिस्सों से राष्ट्रीय कैडेट कोर व विभिन्न विद्यालयों से बच्चे आते हैं, समारोह में भाग लेना एक सम्मान की बात होती है। समारोह का मुख्य अतिथि कोई विदेशी राजनेता होता है।

परेड प्रारंभ करते हुए प्रधानमंत्री राजपथ के एक छोर पर इंडिया गेट पर स्थित अमर जवान ज्योति (सैनिकों के लिए एक स्मारक) पर पुष्पमाला अर्पित करते हैं। इसके बाद शहीद सैनिकों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखा जाता है। यह देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए लड़े युद्ध व स्वतंत्रता आंदोलन में देश के लिए बलिदान देने वाले शहीदों के बलिदान का एक स्मारक है। इसके बाद प्रधानमंत्री अन्य व्यक्तियों के साथ राजपथ पर स्थित मंच तक आते हैं, राष्ट्रपति बाद में अवसर के मुख्य अतिथि के साथ आते हैं।

परेड में विभिन्न राज्यों की प्रदर्शनी भी होती हैं। प्रदर्शनी में हर राज्य के लोगों की विशेषता, उनके लोकगीत व कला का दृश्यचित्र प्रस्तुत किया जाता है। हर प्रदर्शनी भारत की विविधता व सांस्कृतिक समृद्धि प्रदर्शित करती है। परेड और जुलूस राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रसारित होता है और देश के हर कोने में करोड़ों दर्शकों द्वारा देखा जाता है। यही नहीं, गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश भर में सभी सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर झंडा फहराया जाता है।

सांस्कृतिक कार्यक्रम: स्कूलों और समुदायों में देशभक्ति नाटक, लोकनृत्य और संगीत कार्यक्रम होते हैं। इस दिन पूरे देश में एक राष्ट्रीय अवकाश होता है। लोग अपने-अपने घरों पर तिरंगा फहराते हैं और बढ़िया पकवान का भोग लगाते हैं। बहुत से लोग मिठाई का आदान-प्रदान करते हैं!

बहरहाल, पिछले साल गणतंत्र दिवस के आसपास कुछ ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जिससे सबसे बड़े राष्ट्रीय पर्व को लेकर दुश्चिंताएँ हावी होने लगी हैं!

मंडराने लगे हैं गणतंत्र दिवस पर संकट के बादल

दुश्चिंता इसलिए हावी होने लगी है क्योंकि जिस विचारधारा के राजनीतिक दल का देश पर अप्रतिरोध्य सत्ता कायम हो चुकी है, उसकी नज़रों में महात्मा गांधी के नेतृत्व में लंबे संघर्ष से मिली आज़ादी असली आज़ादी है ही नहीं। 13 जनवरी, 2025 को इस आशय की खुली घोषणा भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कर दी थी।

संघ भारत का वह संगठन है, जिसके इशारे पर देश चल रहा है। 13 जनवरी, 2025 को मोहन भागवत ने ग्वालियर में कह दिया था कि 15 अगस्त, 1947 को देश को सिर्फ राजनीतिक आज़ादी मिली; असल आज़ादी 22 जनवरी, 2024 को राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के दिन मिली।

उनका कहना था कि 15 अगस्त, 1947 को हमें अंग्रेज़ों से राजनीतिक आज़ादी मिली, जिससे हमारा भाग्य निर्धारण का अधिकार मिला, लेकिन यह पूरी तरह से देश के ‘स्व’ के अनुरूप नहीं था। भारत की सदियों की ग़ुलामी के बाद असली स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा (स्थिरता) 22 जनवरी, 2024 को राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ हुई, जिसे उन्होंने ‘प्रतिष्ठा द्वादशी’ कहा था।

संक्षेप में, भागवत का कहना रहा कि 1947 की आज़ादी एक शुरुआत थी, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर के साथ भारत ने अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान के साथ ‘सच्ची आज़ादी’ प्राप्त की है और उसे वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार रहना है।

बहरहाल, 13 जनवरी, 2025 को मोहन भागवत ने 1947 में मिली आज़ादी को नकारने की जो खुली घोषणा की, उसमें वह उसके असल कारण को सामने लाने की खुली घोषणा करने का साहस न जुटा कर काइयाँपन का इज़हार किए थे। दरअसल कांग्रेस अंग्रेज़ों के खिलाफ आज़ादी की जो लड़ाई लड़ रही थी, उसका मकसद सिर्फ अंग्रेज़ों को सत्ता से दूर भगाना न होकर, उन कारणों का दूरीकरण करना था, जिन कारणों से सारी दुनिया में आज़ादी की लड़ाई लड़ी जाती रही है।

इसलिए संघ बनाता रहा है भारत की आज़ादी की लड़ाई से दूरी!

स्मरण रहे, सारी दुनिया में आज़ादी की लड़ाइयाँ शासकों और पराधीन बनाए गए लोगों के मध्य शक्ति के स्रोतों के असमान बँटवारे को लेकर संगठित होती रही हैं। स्वाधीन और पराधीन, शासक और ग़ुलाम में मुख्य फर्क शक्ति के स्रोतों के एकाधिकार में निहित रहा है। शासक वह होता है, जिसका शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर एकाधिकार होता है, जबकि ग़ुलाम शक्ति के स्रोतों से शून्य व बहिष्कृत होते हैं।

अगर सारी दुनिया में शासकों ने पराधीन बनाए गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सा दिया होता, तो दुनिया में कहीं भी स्वाधीनता संग्राम संगठित नहीं होता। गांधी के नेतृत्व में भारतीयों को आज़ादी की लड़ाई इसलिए लड़नी पड़ी क्योंकि मुट्ठी भर अंग्रेज़ों ने शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार जमा कर भारतीयों को इससे पूरी तरह महरूम कर दिया था।

गांधी के नेतृत्व में लड़ी गई लड़ाई का लक्ष्य अंग्रेज़ों को सत्ता से हटाकर शक्ति के स्रोतों में विविध समुदायों में बँटे भारतीय लोगों को हिस्सेदारी सुलभ कराना था। इसके फलस्वरूप आज़ाद भारत में कांग्रेस अपने वादे के मुताबिक आज़ादी का सुफल अपर कास्ट सहित दलित, आदिवासी, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के मध्य भी वितरित कर रही थी, जो हिंदुत्ववादी संघ को बिल्कुल ही मंज़ूर नहीं था।

क्योंकि हिंदू धर्म में गहरी आस्था के कारण संघ से जुड़े लोग यह मन-प्राण से विश्वास करते थे और आज भी करते हैं कि शक्ति के स्रोतों के भोग का दैवीय अधिकारी सिर्फ हिंदू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं, जबकि दलित, आदिवासी, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं का शक्ति के स्रोतों का भोग पूरी तरह अधर्म है।

इसलिए संघ अपने जन्मकाल से हिंदू राष्ट्र का हिमायती रहा, क्योंकि इसमें हिंदू धर्माधारित कानूनों के ज़रिये वह शक्ति के समस्त स्रोत सवर्णों के हाथ सौंपकर आदर्श हिंदू राज की स्थापना कर सकेगा। अतः आज़ादी के बाद शूद्रातिशूद्रों को भी शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी मिलने की संभावना के कारण वह आज़ादी की लड़ाई से दूर रहा।

और 1947 में आज़ादी मिलने के बाद भी उसे आज़ादी इसलिए असल नहीं लगी, क्योंकि कांग्रेस ने आज़ादी के बाद गणतंत्र दिवस से संविधान के ज़रिये उन तबकों को शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी देना शुरू किया, जिनका शक्ति के स्रोतों का भोग संघियों और साधु-संतों की नज़रों में अधर्म था।

चूँकि आंबेडकर के प्रयासों से पूना पैक्ट के ज़माने से ही दलित-आदिवासी आरक्षण के ज़ोर से उन पेशों/कर्मों को अपनाने के अधिकारी हो गए, जो पेशे/कर्म हिंदू धर्म के प्राणाधार कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था में सिर्फ सवर्णों के लिए आरक्षित रहे, इसलिए संघ पूना पैक्ट के समय से आरक्षण के ख़ात्मे की ताक में रहा।

और जब 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट के सहारे आरक्षण का विस्तार हुआ, तो उसने राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर आज़ाद भारत का सबसे बड़ा आंदोलन छेड़ दिया। सदियों से हिंदू धर्मशास्त्रों द्वारा दैवीय-ग़ुलाम (डिवाइन-स्लेव) में तब्दील किए गए मूलनिवासी शूद्रातिशूद्र राम के नाम पर किए गए धार्मिक-प्रहार को झेल न सके और उस संघ की अप्रतिरोध्य सत्ता कायम करवा दी, जो हिंदू धर्म को अधर्म से बचाने के लिए शक्ति के समस्त स्रोत सिर्फ सवर्णों के हाथ में देने की योजना से वजूद में आया था।

2025 में संघ की स्थापना के सौ साल पूरे होने थे और मोहन भागवत को पूरा यक़ीन हो गया था कि दैविक ग़ुलामों की धार्मिक दुर्बलता के चलते अब संघ हिंदू राष्ट्र की घोषणा करवाने की स्थिति में आ गया है। इसलिए 13 जनवरी, 2025 को उन्होंने असल आज़ादी की घोषणा कर दी।

मोहन भागवत के बयान के कुछ अंतराल बाद, जब राष्ट्र 76वें गणतंत्र दिवस के उत्सव की तैयारियों में व्यस्त था, कुम्भ में संघ के ही चट्टे-बट्टे साधु-संतों के ज़रिये उन्होंने हिंदू राष्ट्र के संविधान का प्रारूप सामने ला दिया। यह काम वह प्रधानमंत्री मोदी से इसलिए न करवा सके, क्योंकि उनकी सत्ता नायडू-नीतीश की बैसाखियों पर टिकी थी।

2025 के कुम्भ में सामने आ गया हिंदू राष्ट्र के संविधान का स्वरूप

2025 में 13 जनवरी को ग्वालियर में मोहन भागवत द्वारा असल आज़ादी का संकेत किए जाने के दो सप्ताह के भीतर ही साधु-संतों ने कुम्भ में उस हिंदू राष्ट्र के संविधान का स्वरूप जाहिर कर दिया, जिसे संघ अपने राजनीतिक संगठन के ज़ोर से ज़मीन पर उतारने का वर्षों से सपना देखता रहा है।

इसे 12 महीने 12 दिन में 25 विद्वानों ने मिलकर तैयार किया है, जिसके पीछे चारों पीठ के शंकराचार्यों की सहमति है। 501 पन्नों के इस संविधान की निर्माण समिति में उत्तर भारत के 14 और दक्षिण भारत के 11 विद्वान शामिल किए गए हैं। संविधान निर्माण समिति ने धर्मशास्त्रों के साथ ही रामराज्य, श्रीकृष्ण के राज्य, मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के बाद हिंदू राष्ट्र के संविधान को तैयार किया है।

संविधान निर्माण समिति में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के विद्वान भी शामिल रहे। इसके संरक्षक शांभवी पीठाधीश्वर के अनुसार 2035 तक हिंदू राष्ट्र की घोषणा का लक्ष्य रखा गया है।

संविधान के अनुसार एकसदनात्मक व्यवस्थापिका होगी और सदन का नाम संसद नहीं, हिंदू धर्म संसद होगा। हर संसदीय क्षेत्र में एक धर्म सांसद निर्वाचित होगा। पूरे देश में 543 धर्म सांसद निर्वाचित होंगे। धर्म सांसद के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 और मतदान करने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 16 वर्ष होगी।

चुनाव लड़ने और लड़ाने का अधिकार केवल सनातन धर्म के अनुयायियों, भारतीय उपमहाद्वीप के पंथ जैन, बौद्ध व सिख मत के अनुयायियों को होगा। विधर्मियों को मताधिकार से वंचित किया जाएगा। धर्म सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को वैदिक गुरुकुल का छात्र होना अनिवार्य होगा।

हिंदू राष्ट्र में हिंदू न्याय व्यवस्था लागू की जाएगी। यह संसार की सबसे प्राचीन न्याय व्यवस्था है। राष्ट्राध्यक्ष के नियंत्रण में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश होंगे। कॉलेजियम जैसी कोई व्यवस्था नहीं रहेगी। भारतीय गुरुकुलों से निकलने वाले सर्वोच्च विधिवेत्ता ही न्यायाधीश के पद को सुशोभित करेंगे। सभी को त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। झूठे आरोप लगाने वालों पर दंड का विधान होगा। दंड सुधारात्मक होंगे।

हिंदू राष्ट्र में प्राचीन वैदिक गुरुकुल प्रणाली को लागू किया जाएगा। अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों को गुरुकुलों में परिवर्तित किया जाएगा और शासकीय धन से संचालित सभी मदरसे बंद किए जाएंगे। मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियों का व्यावहारिक उपयोग किया जाएगा। पिता की मृत्यु के उपरांत श्राद्ध करने वाला उत्तराधिकारी होगा। एक पति-एक पत्नी प्रथा चलेगी। हिंदू विधि का अंतिम व सर्वोच्च उद्देश्य वर्णाश्रम व्यवस्था की पुनः स्थापना है। कर्म-आधारित वर्ण-व्यवस्था को विधिक रूप दिया जाएगा।

हिंदू राष्ट्र में ऐसा होगा स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस का स्वरूप

संघ अपने जन्मकाल से ऐसे ही संविधान का सपना देखता रहा है। सवाल पैदा होता है, क्या संघ 2035 तक हिंदू राष्ट्र का संविधान लागू करने की स्थिति में आ पाएगा? मेरा मानना है कि जिस तरह संघ ने देश की सभी संस्थाओं में अपनी विचारधारा के लोगों से भरने के साथ, उसके राजनीतिक संगठन भाजपा ने केचुआ के सहयोग से एसआईआर के ज़रिये पूरे देश में विपक्ष के समर्थकों का वोट काटा एवं अपने लोगों का नाम जोड़ा है, उससे वह निकट भविष्य में हिंदू राष्ट्र की घोषणा के साथ उसका संविधान लागू करने की स्थिति में आ सकता है!

ऐसा होने पर देश के दोनों सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिवसों : स्वाधीनता और गणतंत्र दिवसों का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। तब प्रधानमंत्री दिल्ली के लाल किले की बजाय अयोध्या के राम मंदिर से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की जगह भगवा ध्वज फहराने के साथ 21 तोपों की सलामी और गार्ड ऑफ ऑनर लेकर राष्ट्र को संबोधित करते हुए अपने संबोधन में अंग्रेज़ों से आज़ादी के बाद कैसे राम जन्मभूमि को मुक्त कराया गया, इस पर प्रकाश डालेंगे!

वहीं गणतंत्र दिवस की परेड में विदेशी राजनेताओं की जगह विभिन्न धर्मों के धर्मगुरुओं को मुख्य अतिथि बनाया जाएगा। राजपथ पर दर्शक दीर्घा में सूटेड-बूटेड लोगों की जगह साधु-संत नज़र आएँगे! कुल मिलाकर गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर जो दृश्य देखने के हम अब तक अभ्यस्त हैं, वह पूरी तरह बदल जाएगा, जो निश्चय ही बहुत वीभत्स होगा!

तब सिर्फ स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस का स्वरूप ही नहीं बदलेगा, बल्कि सम्पूर्ण भारत मॉडर्न भारत से हज़ारों साल पूर्व वाले भारत में पहुँच जाएगा। जिस तरह इस्लामी कानूनों के ज़रिये मॉडर्न अफ़ग़ानिस्तान और ईरान को एक टिपिकल मुस्लिम देश में तब्दील कर दिया गया, वैसा ही कुछ हिंदू भारत में होगा, जो राष्ट्र और मानवता के लिए सबसे घातक होगा!

ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से भी बदतर स्थिति में पहुँच जाएगा भारत

स्मरण रहे, रज़ा शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान तेज़ी से पश्चिमीकरण, महिला शिक्षा और आर्थिक आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रहा था। किंतु शाह की दमनकारी नीतियों, धार्मिक वर्ग की उपेक्षा और अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई के कारण असंतोष फैल गया और 1979 में अयातुल्ला ख़ोमैनी के नेतृत्व में धार्मिक क्रांति हुई, जिसने शाह को हटाकर ‘विलायत-ए-फ़क़ीह’ (सर्वोच्च धार्मिक नेता) आधारित इस्लामी गणराज्य स्थापित किया।

इसी तरह 20वीं सदी के मध्य से अफ़ग़ानिस्तान में भी आधुनिकता लाने का प्रयास हुआ, लेकिन 1979 में सोवियत आक्रमण के बाद मुजाहिदीन का उदय हुआ। इसके बाद के गृहयुद्ध ने वहाँ के समाज को तहस-नहस कर दिया। मुजाहिदीन के आपस में लड़ने से पैदा हुई अराजकता के बाद 1990 के दशक में तालिबान ने शरीयत कानून लागू कर देश को कठोर रूढ़िवादिता में धकेल दिया।

अफ़ग़ानिस्तान और ईरान में कट्टरपंथी इस्लामी कानूनों (शरीयत) को लागू करने से दोनों देश सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से कई दशक पीछे चले गए। 1979 की ईरानी क्रांति और अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान (1996-2001, 2021-अब तक) के शासन ने महिलाओं की शिक्षा/काम पर पाबंदी, सख़्त हिजाब, सार्वजनिक कोड़े मारने और संगीत/मनोरंजन पर प्रतिबंध लगाकर आधुनिकता को अतीत के रूढ़िवादी ढाँचे में बदल दिया।

लेकिन हिंदू राष्ट्र में कट्टरवादी हिंदू धर्माधारित कानूनों के लागू होने से भारत ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से कई गुना बदतर स्थिति में चला जाएगा। कट्टरपंथी इस्लामी कानून लागू होने से ईरान-अफ़ग़ानिस्तान में मुख्यतः महिलाओं का जीवन और देश की आर्थिक स्थिति बदहाल हुई है और ये देश आधुनिकता के आलोक से महरूम हुए हैं।

किंतु भारत में कट्टरपंथी हिंदू कानूनों के लागू होने पर दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं से युक्त 90% से अधिक आबादी शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह महरूम होकर विशुद्ध ग़ुलामों की स्थिति में पहुँच जाएगी। इतनी विशाल आबादी के आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों से पूरी तरह बहिष्कृत होने से देश का 90% से अधिक मानव संसाधन मिट्टी में मिल जाएगा।

तब दलित, आदिवासी और पिछड़ों की विशाल आबादी तीन उच्चतर वर्णों : ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की निःशुल्क सेवा करने के लिए बाध्य होगी। तब उच्च वर्ण की महिलाएँ जहाँ सती-विधवा और बालिका विवाह-प्रथा का अनुशीलन करने के लिए बाध्य होंगी, वहीं शूद्रातिशूद्र महिलाओं के लिए कमर से ऊपर वस्त्र धारण करना निषिद्ध हो सकता है। तब अछूत समाजों के लोग उसी तरह फिर कमर में झाड़ू और गले में थूकदानी लटकाकर चलने के लिए बाध्य हो सकते हैं, जैसे उन्नीसवीं सदी में पेशवा राज में बाध्य रहे थे!

राहुल गांधी के नेतृत्व में दूसरी आज़ादी की लड़ाई में उतर सकती है सिर्फ कांग्रेस

कुल मिलाकर हिंदू राष्ट्र का संविधान लागू होने के बाद भारत में अमानवीयता का वह मंजर सामने आ सकता है, जिसकी कल्पना विश्व ने कभी नहीं की होगी! क्योंकि हिंदू धर्माधारित विधानों से अधिक अमानवीय विधान विश्व में किसी भी संगठित धर्म का नहीं है। ऐसे में जनवरी 2025 से हिंदू धर्माधारित कानून के वजूद में आने के जो लक्षण उभरे हैं, उसके खिलाफ 90% आबादी को आज़ादी की दूसरी लड़ाई में उतरने के सिवाय कोई उपाय नहीं रह जाएगा!

लेकिन पिछले कई सालों से हिंदू राष्ट्र का लक्षण उभरने के बावजूद जिस तरह दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों के सुप्रीमो टाइप नेताओं ने इस भयावह स्थिति की घोरतर उपेक्षा की है, उससे नहीं लगता कि वे ग़ुलामों की स्थिति में पहुँचते दलित-बहुजन और ईरान-अफ़ग़ानिस्तान से भी बदहाल स्थिति में पहुँचते भारत को बचाने के लिए संघ के खिलाफ आज़ादी की दूसरी जंग छेड़ेंगे! ऐसे में ले-देकर उम्मीदें सिर्फ राहुल गांधी पर टिक जाती हैं।

पिछले वर्ष जब मोहन भागवत के आज़ादी वाले बयान पर तमाम बहुजनवादी नेता चुप्पी साधे रहे, राहुल गांधी ने 15 जनवरी को गरजते हुए कहा था, ‘जो व्यक्ति 1947 की आज़ादी को आज़ादी नहीं मानता, वह ग़द्दार है और अन्य किसी देश में ऐसा बयान देने पर उस पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाता।’

देश में आरएसएस और भाजपा के खिलाफ सिर्फ राजनीतिक लड़ाई की आवश्यकता नहीं है। इन संगठनों ने भारत के लोकतंत्र, लोकतांत्रिक संस्थाओं और भारतीय राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया है। इससे डटकर कोई मुकाबला कर सकता है तो वह सिर्फ कांग्रेस पार्टी है। कांग्रेस पार्टी ने लोगों के साथ मिलकर संविधान की बुनियाद पर भारत की सफलता का निर्माण किया है। लोगों के अधिकारों के कवच, संविधान की रचना से लेकर रक्षा तक का दायित्व कांग्रेस ने निभाया है। हमारा नया मुख्यालय हमारी इस समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और विज़न का प्रतीक है। हमारी परंपराएँ, जड़ें और वजूद भारत की आत्मा में गहराई से बसे हुए हैं। इसी रास्ते पर चलते हुए हम आगे भी न्याय, समानता और संविधान की लड़ाई लड़ते रहेंगे!

राहुल गांधी ने 2025 की 15 जनवरी को जो कहा था, आज 2026 में भी संघ के खिलाफ वही दोहराया जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने कहा है, ‘आजादी के पहले जो हिंदुस्तान था, वैसा हिंदुस्तान बीजेपी लाना चाहती है।’

दरअसल देश को अंग्रेज़ों से आज़ाद कराने से लेकर भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराने वाला संविधान उपहार देने वाली कांग्रेस और नए ज़माने के गांधी को अपनी ज़िम्मेदारियों का इल्म है, इसलिए वे आख़िरी साँस तक प्रयास करते रहेंगे कि देश के दो महान पर्वों : स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस पर संघ-भाजपा की काली छाया न पड़े!

(लेखक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (ओबीसी विभाग) की आइडियोलॉजिकल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं।)

Leave a Reply