इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने BHU की CAS पदोन्नति प्रक्रिया को निरस्त किया, कुलपति की आपात शक्तियों की सीमा का फिर से निर्धारण

इलाहाबाद। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में वैधानिक प्रशासन और प्रक्रियागत पारदर्शिता को सुदृढ़ करने वाले एक महत्वपूर्ण निर्णय में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विशेष अपील संख्या 219/2025 (डॉ. दीपांविता सिंह रॉय बनाम भारत संघ एवं अन्य) में अपना निर्णय सुनाया। खंडपीठ ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के अंतर्गत पदोन्नति प्रक्रिया की वैधता की जांच करते हुए पाया कि चयन समिति का गठन गंभीर कानूनी त्रुटियों से ग्रस्त था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, जो BHU के नृत्य विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर थीं, ने प्रोफेसर (अकादमिक स्तर-14) पद पर CAS पदोन्नति प्रक्रिया को चुनौती दी। उनकी रिट याचिका को पूर्व में एकल न्यायाधीश द्वारा खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने विशेष अपील दायर की।

विवाद का मुख्य कारण यह था कि कार्यकारी परिषद (Executive Council) के अभाव में कुलपति द्वारा चयन समिति का गठन किया गया तथा बाहरी विशेषज्ञों का चयन कथित रूप से संबंधित विषय से भिन्न अनुशासन से किया गया।

अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए प्रमुख तर्क

अपीलकर्ता ने पदोन्नति प्रक्रिया को चुनौती देते हुए निम्नलिखित आधार प्रस्तुत किए:

कार्यकारी परिषद का अभाव: यह तर्क दिया गया कि BHU के अधिनियम एवं स्टैच्यूट 27 के अनुसार बाहरी विशेषज्ञों का नामांकन केवल कार्यकारी परिषद ही कर सकती है। कुलपति द्वारा धारा 7C(5) के अंतर्गत आपात शक्तियों का प्रयोग अवैध बताया गया।

चयन समिति का अनुचित गठन: पदोन्नति कथक नृत्य अनुशासन से संबंधित थी, जबकि चयन समिति में अन्य नृत्य शैलियों के विशेषज्ञ शामिल किए गए, जिससे विषय-विशेष विशेषज्ञता की वैधानिक आवश्यकता का उल्लंघन हुआ।

पक्षपात का आरोप: एक प्रतिस्पर्धी उम्मीदवार द्वारा विशेषज्ञों की सूची अग्रेषित किए जाने से निष्पक्षता और संस्थागत पारदर्शिता पर प्रश्न उठे।

विश्वविद्यालय एवं प्रतिवादियों की दलीलें

विश्वविद्यालय ने प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि:

* कार्यकारी परिषद लंबे समय से अस्तित्व में नहीं थी, इसलिए कुलपति द्वारा आपात शक्तियों का प्रयोग उचित था।

* नृत्य विभाग एक समग्र शैक्षणिक इकाई है, जहाँ किसी एक नृत्य शैली में विशेषज्ञता अनिवार्य नहीं है।

* विशेषज्ञों का पैनल विभागीय समिति से प्राप्त हुआ था, किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार से नहीं।

न्यायालय द्वारा विचारित प्रमुख मुद्दे

खंडपीठ ने निम्न प्रश्नों पर विचार किया:

* क्या धारा 7C(5) के अंतर्गत आपात शक्तियों का प्रयोग वैध था?

* क्या चयन समिति का गठन BHU स्टैच्यूट एवं UGC विनियमों के अनुरूप था?

* क्या विशेषज्ञों का संबंधित विषय में विशेषज्ञ होना आवश्यक था?

* क्या प्रक्रियागत त्रुटियों और पक्षपात ने चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया?

उच्च न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष

आपात शक्तियों का दुरुपयोग: 

न्यायालय ने कहा कि आपात शक्तियाँ अपवादस्वरूप होती हैं और इनके प्रयोग के लिए वास्तविक तात्कालिकता का ठोस आधार होना चाहिए। CAS पदोन्नतियाँ, जो पूर्व प्रभाव से लागू हो सकती हैं, सामान्यतः आपात स्थिति नहीं मानी जा सकतीं। तात्कालिकता के अभाव में धारा 7C(5) का प्रयोग अस्थिर पाया गया।

कार्यकारी परिषद की अनिवार्य भूमिका: पीठ ने स्पष्ट किया कि विधि द्वारा निर्धारित कार्यकारी परिषद की शक्तियों को केवल उसके अस्तित्व में न होने के कारण दरकिनार नहीं किया जा सकता। जब कानून किसी प्रक्रिया को विशेष तरीके से करने का निर्देश देता है, तो उसी तरीके का पालन आवश्यक है।

विषय-विशेष विशेषज्ञों की आवश्यकता: न्यायालय ने पाया कि दोनों उम्मीदवार कथक नृत्य में विशेषज्ञ थे। ऐसे में संबंधित विषय में विशेषज्ञता न रखने वाले सदस्यों को चयन समिति में शामिल करना स्टैच्यूट 27 के विपरीत था और इससे चयन प्रक्रिया प्रभावित हुई।

प्रक्रियागत निष्पक्षता एवं संस्थागत विश्वसनीयता: यद्यपि केवल विशेषज्ञों की सूची अग्रेषित करना अपने-आप में पक्षपात सिद्ध नहीं करता, परन्तु समग्र प्रक्रियागत त्रुटियों ने चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर किया।

पुनः स्थापित कानूनी सिद्धांत:

निर्णय में विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांतों को दोहराया गया:

* आपात शक्तियाँ नियमित वैधानिक प्रक्रियाओं का विकल्प नहीं हो सकतीं।

* चयन समितियों का गठन स्टैच्यूट एवं UGC विनियमों के अनुसार ही होना चाहिए।

* निष्पक्ष अकादमिक मूल्यांकन हेतु विषय-विशेष विशेषज्ञता आवश्यक है।

* प्रशासनिक सुविधा कानून के शासन से ऊपर नहीं हो सकती।

मामले का परिणाम:

खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के निर्णय से असहमति व्यक्त करते हुए माना कि कुलपति द्वारा आपात शक्तियों का अनुचित प्रयोग तथा विशेषज्ञों के दोषपूर्ण गठन के कारण CAS पदोन्नति प्रक्रिया विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण थी।

व्यापक प्रभाव

इस निर्णय के केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है:

* कार्यकारी परिषद की वैधानिक भूमिका को पुनः सुदृढ़ करता है।

* कुलपतियों द्वारा आपात शक्तियों के एकतरफा प्रयोग पर स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित करता है।

* शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और वैधानिक सुरक्षा को मजबूत करता है।

* विश्वविद्यालय प्रशासन में विधिक प्रक्रिया के कठोर पालन पर एक महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित करता है।

यह निर्णय भविष्य में CAS पदोन्नति, चयन समितियों के गठन तथा केंद्रीय विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक संरचना से जुड़े विवादों को प्रभावित कर सकता है।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

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