इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में कहा कि राज्य अपनी हिरासत में किसी कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है, भले ही मौत आत्महत्या हो।
जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और इंसानी गरिमा का अधिकार एक मूलभूत, अलंघनीय और हर जगह मौजूद अधिकार है, जो उस व्यक्ति को भी दिया जाता है जिसे राज्य ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार और हिरासत में लिया हो।
खंडपीठ ने प्रेमा देवी की रिट पिटीशन को मंज़ूरी दे दी, जिसमें उन्होंने पीलीभीत ज़िला जेल में अपने नाबालिग बेटे की अप्राकृतिक मौत के लिए मुआवज़े की मांग की थी। उत्तर प्रदेश सरकार को तीन हफ़्ते के अंदर मृतक के कानूनी वारिसों को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश देते हुए बेंच ने उसे से मुआवज़ा तय करने के लिए गाइडलाइन बनाने को भी कहा।
इसमें यह भी कहा गया कि सरकार को मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 के तहत उपलब्ध उम्र, आय और आश्रित सदस्यों के आधार पर गुणात्मक पद्धति की तरह हिरासत में मौत के मामलों में मुआवजा देने के लिए ज़रूरी और ठोस पैमाने अपनाने चाहिए।
याचिकाकर्ता का बेटा एक पॉक्सो मामले में विचाराधीन कैदी था। वह 20 फरवरी, 2024 को जेल के शौचालय के वेंटिलेटर से लटका हुआ मिला। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पहले ₹3,00,000/- के मुआवजे की सिफारिश की थी। हालांकि, अधिकारियों के कोई भुगतान नहीं किया। इसलिए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनके बेटे को पुलिसकर्मियों ने टॉर्चर किया था।
दूसरी ओर, राज्य ने तर्क दिया कि मृतक ने खुद को फांसी लगाकर जान दी। यह कहा गया कि यह घटना आत्महत्या थी और रिकॉर्ड में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी कि जिससे पता चले कि पुलिस की तरफ से कोई लापरवाही, गलत काम किया गया। यह भी कहा गया कि एक बार पहचान की प्रक्रिया पूरी हो जाने और सरकार से ज़रूरी बजट मिल जाने के बाद मंज़ूर किया गया मुआवज़ा कानून के हिसाब से जारी कर दिया जाएगा।
हालांकि, खंडपीठ ने ज़िम्मेदारी से बचने की राज्य की कोशिश खारिज की, क्योंकि उसने कहा कि हिरासत में मौत भारतीय न्यायिक प्रणाली में मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है।
जस्टिस सराफ ने कहा कि यह ‘हैरान करने वाली’ बात है कि हमारे भारतीय संविधान में गैर-कानूनी हिरासत या हिरासत में मौत के लिए मुआवज़ा देने का कोई साफ़ आदेश नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर हिरासत में मौत प्राकृतिक होती है तो राज्य को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन, अगर मौत अप्राकृतिक हुई है तो राज्य अपने उस काम/चूक के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है जिसके कारण किसी व्यक्ति की मौत हुई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रुदुल साह बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि बुनियादी अधिकारों से वंचित करने पर मुआवज़े का आदेश देने से इनकार करना आज़ादी के अधिकार के प्रति सिर्फ़ दिखावटी वादा करना होगा।
कोर्ट ने नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य और डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को भी ध्यान में रखा, जिसमें यह कहा गया कि पैसे की भरपाई स्ट्रिक्ट लायबिलिटी के सिद्धांत पर आधारित एक सही और असरदार उपाय है, जिसके लिए सॉवरेन इम्यूनिटी का बचाव मौजूद नहीं है।
खास तौर पर मुआवज़े की रकम तय करते समय कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के एक फैसले (सुओ मोटो कस्टोडियल वायलेंस) की जांच की, जिसमें पीड़ित की उम्र के आधार पर मुआवज़े को श्रेण में बांटा गया। हालांकि, डिवीजन बेंच ने इसे आधिकारिक मिसाल के तौर पर मानने से यह देखते हुए इनकार किया कि उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय राज्य बनाम किलिंग जाना में रोक लगा दी थी।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने बिना किसी विवाद वाले रिकॉर्ड से नोट किया कि मृतक राज्य की कस्टडी में था और उसने आत्महत्या कर ली थी। बेंच ने कहा कि हो सकता है कि उसके आस-पास ऐसे हालात रहे हों, जिनकी वजह से उसने इतना बड़ा कदम उठाया, लेकिन मरने वाले की अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य पूरी तरह से ज़िम्मेदार है।
खंडपीठ ने कहा, “…पुलिस की हिरासत में किसी कैदी की मौत के लिए राज्य की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। कोई भी राज्य कैदियों को बेहतर सुविधाएं देने की अपनी ज़िम्मेदारियों से बच नहीं सकता। इसलिए इस मामले में हिरासत में मौत का मामला बनता है।”
इसे देखते हुए कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि यह संवैधानिक सुरक्षा का साफ़ उल्लंघन था, जिसके लिए संविधान के आर्टिकल 226 के तहत दखल देना ज़रूरी है। इसलिए कोर्ट ने रिट पिटीशन मंज़ूर कर ली और राज्य को तीन हफ़्ते के अंदर कानूनी वारिसों को मुआवज़े के तौर पर ₹10,00,000 देने का निर्देश दिया।
सिस्टम में सुधार लाने के लिए एक कदम और आगे बढ़ते हुए कोर्ट ने भविष्य में कस्टोडियल डेथ के सभी मामलों में सख्ती से पालन किए जाने वाले चार शुरुआती कदम बताए:
अ) जेल अधिकारियों को मृतक के परिवार वालों को मृतक की मौत के बारे में तुरंत बताना होगा। बिना किसी देरी के सीआरपीसी की धारा 174 (बीएनएसएस की धारा 194) के अनुसार, मौके पर ही स्वतंत्र पंचों के साथ एक पंचनामा तैयार किया जाएगा।
ब) बिना किसी देरी के मौत का कारण बताते हुए तुरंत पोस्टमॉर्टम जांच की जानी चाहिए। मृतक की हिरासत में मौत के मामले में पोस्टमॉर्टम जांच की वीडियो रिकॉर्डिंग ज़रूरी तौर पर की जानी चाहिए।
स) सभी गवाहों, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और पंचनामा पर विचार करने के तुरंत बाद सीआरपीसी की धारा 176 (बीएनएसएस की धारा 196) के अनुसार संबंधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा जांच रिपोर्ट जमा की जानी चाहिए।
द) हिरासत में मरने वाले के परिवार वालों को सांत्वना देने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा तय किया गया मुआवज़ा, हर मामले के खास तथ्यों और हालात पर विचार करने के बाद दिया जाना चाहिए।