नई दिल्ली। देश के संविधान ने सभी नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति की सभी विधाओं में बोलने की आजादी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, अपनी संस्कृति के अनुरूप खाने-पीने, पहनावे और अपनी मान्यताओं के अनुरूप धार्मिक क्रियाकलापों की स्वतंत्रता दी है। इन अधिकारों की गारंटी कानून देता है। तमाम विविधताओं का संरक्षण कानून देता है, लेकिन आरएसएस-बीजेपी की सरकारों के दौर में यह अधिकार छीने जा रहे हैं या उन्हें कमजोर किया जा रहा है।
असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान आदि राज्यों में अल्पसंख्यक निशाने पर हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्व सरमा के नफरती विचार और बोली कम पड़ रही थी कि वह बाकायदा मुस्लिमों पर डिजिटल बंदूक से निशाना साधते वीडियो जारी करते हैं। उत्तर प्रदेश में अब कानून का राज नहीं एनकाउंटर और बुलडोजर राज है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड भी पीछे नहीं हैं। इन स्थितियों के मद्देनजर जन हस्तक्षेप ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया दिल्ली में 26 फरवरी, 2026 को एक संगोष्ठी का आयोजन किया। “अल्पसंख्यकों पर हमला- कानून के राज पर निशाना” विषयक गोष्ठी में बड़ी संख्या में प्रोफेसर, वकील, पत्रकार, साहित्य कर्मी और बुद्धिजीवी उपस्थित थे और बीते 12 वर्षों में देश के तेजी से बदल रहे हालात पर चिंता व्यक्त की।
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ आरएसएस-बीजेपी और उसकी सरकारों द्वारा देश में फैलाए जा रहे नफरत का एक नरेटिव है। ताकि जनता का ध्यान असल बुनियादी सवालों, मजदूर, किसान, बेरोजगार, छात्र, युवा, महिलाओं की तकलीफों और बेरोजगारी, भूख, शिक्षा जैसे सवालों से ध्यान भटकाया जा सके। ऐसे में जरूरी है कि देश के नागरिक समाज और बुद्धिजीवी जनता के बुनियादी सवालों पर निरंतर इस तरह के संवाद कायम रखें और जनता के सरोकारों से जुड़ते रहें।
सभा को मुख्य रूप से पूर्व आईएएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, डीयू के पूर्व प्रोफेसर और सांस्कृतिक कर्मी शमशुल इस्लाम, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट और मानवाधिकार वादी कार्यकर्ता सुश्री शाहरुख आलम, डीयू प्रोफेसर अपूर्वानंद, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट अशोक पांडा और जेएनयू के डॉक्टर विकास बाजपेई ने संबोधित किया। वरिष्ठ पत्रकार अनिल दुबे ने चर्चा के लिए विषय की रूपरेखा प्रस्तुत की। संगोष्ठी की शुरुआत शमशुल इस्लाम द्वारा प्रस्तुत गीत से हुई और संचालन डॉक्टर वाजपेई ने किया।

हर्ष मंदर ने कहा कि 12 वर्षों से नफरत की राजनीति ने अब शर्म के सारे पर्दे गिरा दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव में जैसे नफरती भाषण दिए, उसी का परिणाम है कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेता, मंत्री और मुख्यमंत्री उनसे और ज्यादा नफरती बोल बचन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश आज फिर 1947 के उसी दोराहे पर आ गया है, जहां उस समय के लोगों ने तय किया था कि हम पाकिस्तान जैसा हिंदू राष्ट्र का रास्ता नहीं लेंगे, लेकिन आज उसे बदला जा रहा है।
हर तरह की आजादी पर हमले बढ़ रहे हैं, जबकि भारत विभिन्न धर्म, जाति और संस्कृतियों का देश है और बंधुत्व ही वह भावना है, जिससे सब एक दूसरे से बंधे हुए हैं। उसी बंधुत्व पर हमला बढ़ा है। उन्होंने नाजी जर्मनी से तुलना करते हुए कहा कि आज देश में लगभग 20 से अधिक ऐसी चीज हो रही हैं जो नाजी जर्मनी में हो रहा था। लोगों के खाने-पीने अपनी धार्मिक गतिविधियों, पहनावे पर लिंचिंग हो रही है और उसे गौरवान्वित भी किया जा रहा है। नाजी जर्मनी में जैसा सिनेमा, साहित्य और पत्रकारिता का दौर था वह यहां भी देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि 1947 जैसा ही यह नफ़रती दौर एक बड़े नरसंहार की भूमिका बनाता लग रह है।
शमशुल इस्लाम ने बीते एक दशक से देश में बढ़ रहे नफरती बयानों, प्रशासनिक निष्क्रियता और घटनाओं का ब्यौरा देते हुए आरएसएस की उत्पत्ति का इतिहास बताया। उन्होंने कहा कि गांधी की हत्या इसलिए हुई, क्योंकि वह भारत को हिंदूओं और मुस्लिमों का साझा देश मानते थे। इस सोच के खिलाफ ही डॉक्टर हेडगेवार ने आरएसएस की स्थापना की। सावरकर और गोलवलकर की किताबें हिटलर के ‘मीनकैंफ’ किताब की विचारधारा से भी अधिक खतरनाक हैं।
शाहरुख आलम ने कहा कि इस माहौल में बहुत सारे लोग सवाल करते हैं कि हम आज क्या करें। उन्होंने कहा कि बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिला स्तर पर कमेटी बननी चाहिए जो नागरिकों के अधिकारों पर काम करें। उनको राहत दें और अदालतों तथा पुलिस संबंधी मदद दें। इस तरह की बैठकें और गोष्ठियां देशभर में करने की कोशिश की जानी चाहिए। ताकि अपने आसपास नफरत के खिलाफ प्रेम और सकारात्मक माहौल बना सके।

अपूर्वानंद ने कहा कि बीते 12 वर्षों में लिंचिंग की सैकड़ों घटनाएं हुईं, हजारों लोगों पर बुलडोजर चले और विस्थापित किए जा चुके हैं और वह दिन दूर नहीं, जब हम अपने आस-पास मुस्लिम नाम के साइन बोर्ड, कारोबारी और मुस्लिम संस्कृति के अनुरूप पहनावा भी नहीं देख पाएंगे। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद मुसलमान डर नहीं रहे। देश के लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनका विश्वास और मजबूत हुआ है। वह जनतंत्र को मजबूती दे रहे हैं। और वह उन सभी पार्टियों को वोट भी दे रहे हैं, जो उनकी बात भी नहीं करते। यही कारण है कि तमाम प्रयासों के बावजूद नफरती विचार उस हद तक नहीं बढ़ रहा, जैसा बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने कहा कि हिंदुओं में भी इस बाबत प्रयास हो रहे हैं, लेकिन यहां संकट यह है कि एक बड़ी आबादी के पास सूचना का अभाव है या गलत जानकारी है। उन्होंने कहा कि अदालतें लोकतंत्र की सबसे बड़ी रक्षक हैं। चंद्रचूड़ जब मुख्य न्यायाधीश बने, तो उन्होंने कहा बहुसंख्यक राज में अदालत की भूमिका बढ़ जाती है, लेकिन हमने देखा कि अदालतों ने इसके विपरीत ही काम किया। एनसीईआरटी में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर सुप्रीम कोर्ट नाराज हो गया, लेकिन इतिहास से मुस्लिम शासकों का पीरियड हटाए जाने पर वह खामोश है।
अशोक पांडा ने कहा कि हिंदू मुस्लिम एकता ऐतिहासिक विरासत है और मौजूदा स्थितियों में महंगाई, बेरोजगारी और मजदूर व किसानों का संयुक्त संघर्ष ही सही उपाय और रास्ता है। गोष्ठी का समापन करते हुए विकास बाजपेई ने कहा कि आज के हालात में उम्मीद बनाए रखने की जरूरत है। निराशा और मायूसी की कोई जगह नहीं है, क्योंकि मजदूर, किसान, छात्र, युवा, बेरोजगार और आम जनता जिंदगी के रोजाना के सवालों से जूझ रही है और उस जद्दोजहद में संघर्ष के नए तरीके भी खोज रही है। और उनसे हमको सीखने की जरूरत है। जनता ही हर समस्या की मार्ग दर्शक होती है।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)