जजों को पदोन्नति, सत्ता से नाराज़गी मोल लेने की परवाह किए बिना सही फैसले लेने चाहिए : जस्टिस नागरत्ना

सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि जजों को सही फैसला लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, भले ही इससे उन्हें प्रमोशन मिलना बंद हो जाए या सत्ता में बैठे लोग नाराज़ हो जाएं। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियल रिव्यू के सही इस्तेमाल के लिए हिम्मत और पक्का यकीन बहुत ज़रूरी है।

केरल हाईकोर्ट में मंगलवार को दूसरा जस्टिस टी.एस. कृष्णमूर्ति अय्यर मेमोरियल लेक्चर देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ज्यूडिशियल रिव्यू के लिए अक्सर कोर्ट को कानून को अमान्य करना पड़ता है, कार्यपालिका के काम पर रोक लगानी पड़ती है और कभी-कभी तो राजनीतिक बहुमत से किए गए संवैधानिक बदलावों को भी रद्द करना पड़ता है।उन्होंने कहा, “ये आसान काम नहीं हैं। इनके अक्सर राजनीतिक नतीजे होते हैं।”

जजों को शायद पता हो कि कोई नापसंद फैसला उनके प्रमोशन, एक्सटेंशन की संभावनाओं पर असर डाल सकता है, या उन्हें “सत्ता में बैठे लोगों की नज़र में बुरा” बना सकता है। हालांकि, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संविधान जो मांग करता, उसे करने में जागरूकता कभी भी रुकावट नहीं बननी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पद की शपथ एक जज का “न्यायिक धर्म” है। इसका सम्मान किया जाना चाहिए, चाहे इसके निजी या पेशेवर नतीजे कुछ भी हों। अगर फैसले करियर के नतीजों की आशंका से लिए जाते हैं तो ज्यूडिशियल रिव्यू के असल होने के बजाय सिंबॉलिक होने का खतरा है।

जस्टिस नागरत्ना ने जस्टिस एच. आर. खन्ना को संवैधानिक हिम्मत का सबसे अच्छा उदाहरण बताया। इमरजेंसी के दौरान, एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से माना कि मौलिक अधिकारों के सस्पेंशन के दौरान, निजी आज़ादी को लागू करने के लिए कोर्ट जाने का अधिकार भी कम हो गया। जस्टिस खन्ना ने असहमति जताई और कहा कि संविधान राज्य को इमरजेंसी में भी जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को खत्म करने की इजाज़त नहीं देता।

उन्होंने कहा कि उनकी असहमति की वजह से उन्हें निजी कीमत चुकानी पड़ी। उन्हें मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए हटा दिया गया। फिर भी इतिहास और बाद में संवैधानिक न्यायशास्त्र ने उनकी बात को सही साबित किया। जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एडीएम जबलपुर के फैसले को साफ तौर पर खारिज कर दिया और इस बात की पुष्टि की कि मौलिक अधिकार कार्यपालिका की मर्ज़ी पर निर्भर नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि उस सुधार के पल ने दिखाया कि संवैधानिक ईमानदारी आखिरकार कुछ समय के राजनीतिक फायदे से ज़्यादा समय तक चलती है।

न्यायिक स्वतंत्रता में जज के असहमति जताने का अधिकार भी शामिल है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ संवैधानिक सुरक्षा उपायों या इंस्टीट्यूशनल डिज़ाइन से नहीं, बल्कि इस बात से निकलता है कि जज अपने पद का काम कैसे करते हैं।

इसके दो अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े हुए पहलू हैं। उन्होंने कहा, “पहला है बाहरी असर से आज़ादी। एक जज को राजनीतिक दबाव, संस्थानिक धमकी या लोकलुभावन मांग से आज़ाद होना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “एक न्यायिक राय कोई मोलभाव दस्तावेज नहीं है; यह संवैधानिक यकीन की बात है। अगर कानून की ज़रूरत है, तो आम सहमति के लिए उसे कमज़ोर करना एक तरह का समझौता है जिसे हमें करने को तैयार नहीं होना चाहिए।”

जस्टिस नागरत्ना का लेक्चर “ट्रांसफॉर्मेटिव कॉन्स्टिट्यूशनलिज़्म और बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन” विषय पर था। उन्होंने तर्क दिया कि ये दोनों संवैधानिक विचार आखिरकार एक ऐसी न्यायपालिका पर निर्भर करते हैं, जो आज़ादी से और बिना डरे काम करने को तैयार हो।

बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन के विकास को बताते हुए उन्होंने शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया और आई.सी. गोलक नाथ बनाम स्टेट ऑफ़ पंजाब जैसे शुरुआती मामलों का ज़िक्र किया, जिसका नतीजा केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरल में ऐतिहासिक फ़ैसले के रूप में सामने आया।

केशवानंद भारती में सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज किया कि संसद की बदलाव करने की शक्तियाँ असीमित हैं। संसद संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव कर सकती है, लेकिन वह इसके बुनियादी ढांचे को नहीं बदल सकती। इसके बाद के फ़ैसले जैसे मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया और एस.आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले ने इस सिद्धांत को और मज़बूत किया। साथ ही इस बात को मज़बूत किया कि संवैधानिक सर्वोच्चता, सेक्युलरिज़्म, फ़ेडरलिज़्म, शक्तियों का बंटवारा और न्यायिक समीक्षा संविधान की बुनियादी पहचान का हिस्सा हैं।

आज़ादी और बराबरी के लिए कटिबद्ध लोकतंत्र में बहुमत वाले संस्थान हमेशा लोगों के अधिकारों या अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा नहीं कर सकते। बहुमत के पास भले शासन करने का मैंडेट होता है, लेकिन वह मैंडेट बिना रोक-टोक के नहीं होता। यह न्यायपालिका ही है जो मेजॉरिटी की ताकत की संवैधानिक सीमाएं तय करती है। कोर्ट को वैधता लोकप्रियता से नहीं बल्कि संविधान के प्रति वफ़ादारी से मिलती है।

जस्टिस नागरत्ना ने यह दोहराते हुए अपनी बात खत्म की कि संवैधानिक शासन का टिकाऊपन न सिर्फ़ सिद्धांतों और इंस्टीट्यूशनल डिज़ाइन पर निर्भर करता है, बल्कि उन लोगों के नैतिक मूल्यों पर भी निर्भर करता है, जो संविधान की व्याख्या करते हैं और उसे लागू करते हैं। जजों को गैर-संवैधानिक कानूनों को अमान्य करने, गैर-कानूनी एग्जीक्यूटिव एक्शन को रोकने और संविधान की पहचान को बनाए रखने के लिए तैयार रहना चाहिए, भले ही ऐसा करने में उन्हें अपनी निजी कीमत चुकानी पड़े।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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