ब्रिटिश नागरिकता विवाद : हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय के राहुल गांधी को दिए नोटिस के रिकॉर्ड की जांच की

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने गुरुवार को गृह मंत्रालय द्वारा पेश किए गए उन आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच की, जो 2019 में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को जारी किए गए एक नोटिस से संबंधित थे। इस नोटिस में उनकी नागरिकता के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया था। ये रिकॉर्ड जस्टिस राजीव सिंह की बेंच के सामने 9 मार्च, 2026 के पिछले आदेश के पालन में रखे गए।

पिछला आदेश भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर द्वारा दायर एक याचिका पर पारित किया गया। शिशिर खुद कोर्ट में पेश हुए और उन्होंने लखनऊ मजिस्ट्रेट कोर्ट के 28 जनवरी, 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें गांधी की ब्रिटिश नागरिकता से जुड़े आरोपों पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया गया।

कोर्ट के आदेश के पालन में गृह मंत्रालय के विदेशियों के प्रभाग की नागरिकता शाखा के अवर सचिव विवेक मिश्रा और सहायक अनुभाग अधिकारी प्रणव राय बेंच के सामने पेश हुए। वे 29 अप्रैल, 2019 को तत्कालीन निदेशक (नागरिकता) द्वारा गांधी को जारी किए गए नोटिस से संबंधित पूरा रिकॉर्ड अपने साथ लाए थे।

दरअसल  बीजेपी नेता  सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत के बाद गृह मंत्रालय  ने 29 अप्रैल, 2019 को गांधी से उनकी नागरिकता के संबंध में “तथ्यात्मक स्थिति” बताने को कहा था। अपनी 2015 की शिकायत में डॉ. स्वामी ने आरोप लगाया था कि गांधी एक ब्रिटिश नागरिक हैं। फाइलों की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने मूल रिकॉर्ड अवर सचिव को वापस कर दिए।

कोर्ट ने औपचारिक रूप से आवेदक को भारत सरकार को भी इस मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दी और सरकारी वकील को अगली सुनवाई की तारीख तक अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया।

उल्लेखनीय है कि शिशिर ने हाई कोर्ट में अर्जी देकर रायबरेली के कोतवाली पुलिस स्टेशन को निर्देश देने की मांग की कि वे गांधी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 के विभिन्न प्रावधानों, ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 की धारा 3, 5 और 6, पासपोर्ट एक्ट, 1967 की धारा 12 और 13 और फॉरेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 14(B) और 14(सी) के तहत एफआईआर दर्ज करें।

यूनाइटेड किंगडम के ‘कंपनीज़ हाउस’ के रिकॉर्ड्स पर भरोसा करते हुए आवेदक ने कहा कि गांधी ब्रिटिश  नागरिक हैं, जिन्होंने अगस्त 2003 में मेसर्स बैकोप्स लिमिटेड नाम की एक कंपनी बनाई थी। आवेदक का आरोप है कि गांधी ने “स्पष्ट रूप से स्वीकार किया और स्वेच्छा से अपनी नागरिकता ब्रिटिश घोषित की,” उनके पास डायरेक्टर आइडेंटिफिकेशन आईडी थी और उन्होंने लंदन और हैम्पशायर में कुछ खास पते दर्ज कराए।

उनका आगे यह भी कहना है कि गांधी ने अक्टूबर, 2005 और अक्टूबर, 2006 में कंपनी के सालाना रिटर्न जमा किए, जिनमें उन्होंने अपनी नागरिकता ब्रिटिश बताई थी; इसके बाद 17 फरवरी, 2009 को एक अर्जी के ज़रिए कंपनी को भंग कर दिया गया।

इसके अलावा, उनका दावा है कि 2004 के लोकसभा चुनाव लड़ते समय गांधी ने एक हलफनामा दायर किया था, जिसमें उन्होंने मेसर्स बैकोप्स लिमिटेड का मालिक होने की बात स्वीकार की थी और बार्कलेज बैंक, लंदन ब्रांच में अपने एक विदेशी बैंक खाते की जानकारी दी थी।

गुरुवार को सुनवाई खत्म होने से पहले आवेदक ने यह गुज़ारिश की कि चूंकि सुनवाई काफी लंबी चली है, इसलिए इस मामले को ‘आंशिक रूप से सुना गया’ माना जाए। हालांकि, जस्टिस सिंह ने इस गुज़ारिश को साफ तौर पर ठुकरा दिया।

कोर्ट ने कहा कि सुनवाई, भले ही काफी लंबी चली हो, लेकिन वह सिर्फ़ ‘दाखिले के चरण’ (पर ही थी। नतीजतन, कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि “इस मामले को इस बेंच के सामने ‘जुड़ा हुआ’ या ‘आंशिक रूप से सुना गया’ नहीं माना जाएगा।” इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल, 2026 को तय की गई।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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