सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े 2018 के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट अब धर्म के भीतर अंधविश्वास की परिभाषा तय करने के अधिकार क्षेत्र पर विचार कर रहा है। बुधवार को एक नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण अवलोकन किया कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र रखता है।
यह टिप्पणी केंद्र सरकार की उस दलील के जवाब में आई, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकती, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, न कि धर्म के। मेहता ने तर्क दिया कि यदि कोई प्रथा अंधविश्वास मानी भी जाती है, तो यह तय करना अदालत का काम नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत विधायिका का काम है कि वह सुधार कानून बनाए।
उन्होंने कहा कि विधायिका किसी विशेष प्रथा को अंधविश्वास बताकर उसमें सुधार कर सकती है, जैसा कि जादू-टोना और अन्य ऐसी प्रथाओं को रोकने के लिए कई कानून बनाए गए हैं।
हालांकि, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मेहता के इस तर्क को बहुत सरल बताते हुए कहा कि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र है कि कोई चीज अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद क्या होगा, यह विधायिका का काम है, लेकिन अदालत में यह नहीं कहा जा सकता कि विधायिका का निर्णय ही अंतिम होगा।
सॉलिसिटर जनरल मेहता ने यह भी तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई धार्मिक प्रथा केवल अंधविश्वास है, क्योंकि अदालत के पास ऐसी विद्वत्तापूर्ण क्षमता नहीं हो सकती। उन्होंने कहा ‘आप (न्यायाधीश) कानून के क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं।’ मेहता ने यह भी कहा कि नागालैंड के लिए जो धार्मिक हो सकता है, वह किसी और के लिए अंधविश्वास हो सकता है, क्योंकि समाज अत्यंत विविध है।
इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि जादू-टोना को धार्मिक प्रथा का हिस्सा माना जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा? उन्होंने मेहता से पूछा कि यदि अदालत के पास अनुच्छेद 32 के तहत ऐसी याचिका आती है कि जादू-टोना की एक धार्मिक प्रथा मौजूद है, और विधायिका खामोश है, तो क्या अदालत ‘खाली क्षेत्र के सिद्धांत’ का उपयोग करके स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए ऐसी प्रथा को प्रतिबंधित करने का निर्देश नहीं दे सकती?
सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया कि न्यायिक समीक्षा की जा सकती है क्योंकि यह ‘स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था’ के अंतर्गत आता है, न कि इसलिए कि यह अंधविश्वास है।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा कि किसी आवश्यक धार्मिक प्रथा को निर्धारित करते समय, अदालत को उस विशेष धर्म की फिलॉसफी के लेंस से देखना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘आप किसी अन्य धर्म के विचारों को लागू नहीं कर सकते और कह सकते हैं कि यह आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। अदालत का दृष्टिकोण उस धर्म की फिलॉसफी को लागू करना है, जो स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन हो।’
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ‘परिवर्तनकारी संवैधानिकता’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ जैसे सिद्धांतों के उपयोग पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ को न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं बनाया जा सकता और यह अवधारणा स्पष्ट नहीं है।
उन्होंने कहा कि वह लंबे समय से ‘परिवर्तनकारी संवैधानिकता’ के बारे में सुन रहे हैं, लेकिन उनकी समझ में यह सिद्धांत ठीक से नहीं आता।
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि वर्तमान कार्यवाही में अदालत सीधे तौर पर ‘परिवर्तनकारी संवैधानिकता’ पर विचार नहीं कर रही है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि समाज में नैतिकता स्थिर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती रहती है।
मेहता ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 25 में प्रयुक्त ‘नैतिकता’ शब्द का अर्थ ‘संवैधानिक नैतिकता’ नहीं लगाया जा सकता। उनके अनुसार, ‘संवैधानिक नैतिकता’ एक अस्पष्ट और व्यक्तिपरक अवधारणा है, जो अलग-अलग न्यायाधीशों के लिए अलग अर्थ रख सकती है। इसलिए इसे धार्मिक प्रथाओं की वैधता जांचने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
जस्टिस जॉयमल्या बागची ने कहा कि अनुच्छेद 25(1) में ‘विवेक’ (का विशेष महत्व है। समाज के अलग-अलग वर्गों की नैतिक मान्यताएं अलग हो सकती हैं, और ये सभी एक व्यापक संवैधानिक ढांचे के भीतर सह-अस्तित्व में रह सकती हैं।
सॉलिसिटर जनरल ने 2018 के सबरीमाला फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि उसमें ‘संवैधानिक नैतिकता’ को आधार बनाना गलत था। उनके अनुसार, यह एक अस्पष्ट शब्द है, जिसे ‘सामाजिक नैतिकता’ के स्थान पर नहीं रखा जा सकता।
उन्होंने जोसफ शाइन बनाम केंद्र मामले पर भी सवाल उठाए, जिसमें व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था। उन्होंने कहा कि इस फैसले में ‘संवैधानिक नैतिकता’ का उपयोग उचित नहीं था।
हालांकि, चीफ़ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि इस सुनवाई में ‘जोसेफ शाइन’ मामले के मूल निर्णय पर कोई सवाल नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 इसलिए असंवैधानिक घोषित की गई थी क्योंकि वह महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण थी। जस्टिस बागची ने भी इस बात का समर्थन किया।
इस सुनवाई में ‘संवैधानिक नैतिकता’, ‘सामाजिक नैतिकता’ और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह बड़ी पीठ इन जटिल मुद्दों पर विचार कर रही है, जिसका असर भविष्य के संवैधानिक और धार्मिक मामलों पर पड़ सकता है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)