डॉ. अम्बेडकर ने कहा था : हर लड़की को चाहिए कि वह पति की दासी होने से इंकार कर दे

डॉ आंबेडकर भारतीय इतिहास की एक महान हस्ती रहे हैं। महान इस मामले में की उन्होंने अपना पूरा जीवन न्यायपरक और समतामूलक समाज के निर्माण के लिए समर्पित कर दिया था। वे ऐसा समाज चाहते थे जिसमें न्याय और समानता को महत्त्व मिले। ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें न्याय और समानता का बोलबाला हो। ऐसा समाज जो अपनी सोच और व्यवहार को न्याय और समानता की कसौटी पर कसे।

शिक्षा के क्षेत्र में डॉक्टर अंबेडकर के योगदान को अनेक नजरों से समझा जा सकता है। शिक्षा विषय का एक विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए उनके सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक योगदान यह है कि उन्होंने सामाजिक न्याय को समझने में हमारी मदद की I वे अपनी बात को अक्सर शोध के आधार पर कहते थे। उनके शोधों के कारण भारत में सामाजिक विज्ञान में ऐसे विषयों पर शोध करने के अवसर खुले, जिन्हें महत्वपूर्ण नहीं माना जाता था।

बिना सीढ़ी की चार मंजिला इमारत

डॉ अंबेडकर ने भारत में अन्याय की संस्कृति और ढांचे को समझने का प्रयास किया। अपने अध्ययनों में उन्होंने भारत में पाए जाने वाले अन्याय के ढांचे की एक विशेषता को चिन्हित कर उसे थियोराइज़ किया। उन्होंने बताया कि दुनिया के और देश में पाए जाने वाले अन्याय के ढांचों और भारतीय अन्याय के ढांचे में एक बुनियादी अंतर है। दुनिया के दूसरे देशों में एक वर्ग या नस्ल या लिंग दूसरे वर्ग या नस्ल या लिंग पर अन्याय करता है। लेकिन भारत में पाए जाने वाली वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत पैदा होने वाला अन्याय क्रमिक असमानताएं पैदा करता है।

चार वर्णों में बंटी व्यवस्था में प्रत्येक वर्ण के लोगों के पास कुछ विशेष अधिकार हैं और कुछ तिरस्कार भी हैं, अपमान भी है I लेकिन वर्ण व्यवस्था के शीर्ष पर माने गए ब्राह्मण पुरुष के पास केवल विशेष अधिकार हैं, तिरस्कार नहीं हैं। और वर्ण व्यवस्था के सबसे निचले पायदान के वर्ण के लोगों के हिस्से में सबसे कम अधिकार हैं और बहुत ज्यादा तिरस्कार हैं I

वर्ण व्यवस्था के सबसे निचले और चौथे वर्ण की महिलाओं के हिस्से में तिरस्कार-ही-तिरस्कार हैं I शुद्र को वैश्य, वैश्य को क्षत्रिय, और क्षत्रियों को ब्राह्मण से कम अधिकार प्राप्त हैं I वर्ण की ग्रेडेड व्यवस्था में शुद्र से ब्राह्मण वर्ण की ओर बढ़ने पर अधिकार और श्रद्धा क्रमश: बढ़ती जाती है और ब्राह्मण से शुद्र वर्ण की ओर बढ़ने पर क्रमश: तिरस्कार बढ़ते जाते हैं।

यही कारण है कि वर्ण-व्यवस्था के उत्पीड़न के खिलाफ वैसी मुकम्मल लड़ाई संभव नहीं हो पाई है, जैसी नस्लीय उत्पीड़न के खिलाफ संभव हो पायी। डॉ अंबेडकर ने वर्ण व्यवस्था में अंतर्निहित ग्रेडेड असमानता और छुआछूत को समझाने के लिए एक ऐसे चार मंजिला मकान की कल्पना की है, जिसमें सीढ़ियां नहीं है। प्रत्येक वर्ण का व्यक्ति अपनी मंजिल पर पैदा होता है और वहीं पर मर जाता है। कोई भी अपने वर्ण को बदल नहीं सकता। क्योंकि ऊपर या नीचे जाने के लिए सीढ़ी की जरूरत होती है I लेकिन वर्ण-व्यवस्था के चार मंजिला मकान में सीढ़ी होती ही नहीं।

लोकतंत्र की एंटी-थीसिस वर्ण-व्यवस्था के समर्थक

इसलिए किसी खास वर्ण में जन्म लेने के साथ ही उसके साथ जुड़े अपमान या सम्मान जन्म के साथ मिलते हैं और ताउम्र मिलते रहते हैं। यही कारण है कि वर्ण व्यवस्था एंटी-डेमोक्रेटिक होने के साथ-साथ, फ्रेटरनिटी यानि भाईचारे की मूल भावना के भी खिलाफ है। 

हालांकि गांधी सहित बड़े-बड़े लोगों ने वर्ण-व्यवस्था को अच्छा बताया है। दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में वर्ण व्यवस्था के पक्ष में वकालत की है। विभिन्न हिंदुत्ववादी और सनातनी संगठन भी वर्ण व्यवस्था के पक्षधर हैं। रामायण, महाभारत, तथा गीता जैसे महाकाव्य भी वर्ण-व्यवस्था के समर्थन में सदियों से मैदान में डटे हुए हैं। 

रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में तुलसीदास ने लिखा है कि – “पूजिअ विप्र सील गुन हीना, सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना। विशेष ध्यान देने की बात यह है कि तुलसीदास ने यह चौपाई अयोध्या के राजा राम के मुंह से कहलवाई है। तुलसी के राम मानते हैं कि सम्मान पर व्यक्ति का नहीं, बल्कि जाति का अधिकार होता है I 

तुलसी के राम के खिलाफ कबीर का विचार बिलकुल विपरीत है I तुलसी के राम मेरिट के खिलाफ खड़े हैं और कबीर मेरिट के पक्ष में हैं I कबीर कहते हैं कि – “जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान।।”

रामचरितमानस की उपर्युक्त चोपाई से भी पता चलता है कि भारतीय समाज और संस्कृति में लेवल प्लेयिंग फील्ड नहीं है I असमानता और अन्याय के पक्ष में झुकी हुई अनेक भारतीय ज्ञान परंपराओं के खिलाफ डॉक्टर अंबेडकर का व्यवस्थित संघर्ष, अनेक लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। एक रिसर्चर के तौर पर डॉक्टर अंबेडकर की भूमिका को शिक्षण-संस्थानों में याद किया जाना चाहिए। उनकी इस भूमिका के शैक्षिक महत्त्व पर स्कूल-कॉलेज में चर्चा होनी चाहिए। विशेषकर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से उनके काम पर और ज्यादा चर्चा होनी चाहिए।

डॉ. अम्बेडकर की पितृसत्ता को चुनौती

स्त्री-मुक्ति और स्त्री-अधिकारों के पक्ष में किए गए प्रयासों और इस बारे में विकसित की गयी चेतना के कारण भी डॉक्टर अंबेडकर का महत्त्व है। डॉ आंबेडकर लिबर्टी, इक्वलिटी, और फ्रेटरनिटी के अनुसार चलने वाले समाज और राज्य व्यवस्था की रचना करना चाहते थे। यहां पर हमें एक बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि लिबर्टी, इक्वलिटी, और फ्रेटरनिटी की चर्चा करते समय जाति और धर्म जैसी पहचानों पर तो बात होती है, लेकिन स्त्री पर किए जाने वाले जुल्मों पर बात, कम ही होती है।

जबकि सच्चाई यह है कि लिबर्टी, इक्वलिटी, और फ्रेटरनिटी जैसे सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने की राह में पितृसत्ता बहुत बड़ी बाधा है। डॉ. अम्बेडकर इस तथ्य को जानते थे। जब वे पितृसत्ता के प्रभावों को समझ रहे थे तो उनकी चिंता के केंद्र में केवल ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ही नहीं थी I उनकी चिंता के दायरे में विभिन्न प्रकार की पितृसत्ताएँ थी। 

उन्होंने ऐसी अनेक सांस्कृतिक निशानियां और प्रक्रियाओं की पहचान की जिनके सहारे पितृसत्ता को व्यवहार में उतारा जाता है I उन्होंने बताया कि वो कौन से तरीके हैं जिन्हें आम और स्वीकार्य बनाकर पितृसत्ता के अमूर्त विचार को व्यवहार में उतारा जाता है। वे तरीके इतने बारीक़ होते हैं कि आसानी से दिखाई नहीं देते I उन तरीकों से पुरुष का, स्त्री पर वर्चस्व और प्रभुत्त्व बनाया जाता है और उसे चुनौती भी कम ही मिल पाती है I

1942 में आल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस महिला फेडरेशन ने एक कांफ्रेंस का आयोजन किया I उसमें डिप्रेस्ड क्लासेस के 75000 लोग शामिल हुए थे जिनमें 25000 महिलाएँ थी। वह कॉन्फ्रेंस 18 से 20 जुलाई 1942 को नागपुर में हुई थी। उस कॉन्फ्रेंस में 20 जुलाई के दिन महिलाओं को संबोधित करते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने अनेक महत्त्वपूर्ण बातें कही। उनकी बातों से हमें पितृसत्ता को व्यवहार में उतारने के तरीकों का भी पता चलता है और साथ ही पितृसत्ता से लड़ने के कुछ औजार भी हाथ लगते हैं।

पितृसत्ता को चुनौती देने के लिए जो सबसे बड़ा काम डॉ. अम्बेडकर ने किया वो ये कि उन्होंने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की पहचान की और यह भी समझाया कि उसके काम करने और बने रहने के कारक कौन से हैं I उनके अनुसार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को बनाने और बनाए रखने का सबसे बड़ा कारक वर्णव्यवस्था है I और वर्णव्यवस्था को बनाए रखने का केन्द्रीय कारक सजातीय विवाह है I इसलिए सजातीय शादियाँ, जातिव्यवस्था को बनाए रखने की कारक हैं I 

इसके आलावा डॉ अम्बेडकर ने पितृसत्ता के प्रभाव को कम करने के लिए भी कुछ व्यवहारिक सुझाव दिये I उनमें से कुछ सुझाव उन्होंने 1942 में हुई की कांफ्रेंस में दिये I उस कांफ्रेंस में 25 हज़ार डिप्रेस्ड क्लासेस की महिलाओं की भागीदारी को देखकर उन्होंने कहा कि, “जब मैं ऐसी सभा को देखता हूँ तो मुझे विश्वास और प्रसन्नता दोनों ही होती है कि हमने प्रगति की है।”

उनके लिए महिलाओं का पब्लिक स्पेयर में आना प्रगति की निशानी थी I जबकि उस समय अनेक लोग और अनेक संगठन महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद रहने को समाज और राष्ट्र के लिए अच्छा बता रहे थे I हम जानते हैं कि आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई I आरएसएस में महिलाओं की भागीदारी के बारे सोचा ही नहीं गया था I

लेकिन आरएसएस से जुड़े एक व्यक्ति के परिवार की एक सदस्य लक्ष्मीबाई केलकर के आग्रह पर आरएसएस ने 1936 में राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की I यानि आरएसएस ने महिलाओं को परिधि पर जगह दी, उसके केंद्र में तो पुरुष ही बना हुआ है I वह भी सवर्ण और उनमें भी मुख्यतः ब्राह्मण I

उसी कांफ्रेंस में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि “मैं किसी समुदाय की प्रगति का मूल्यांकन महिलाओं द्वारा की गई प्रगति से करता हूं I”

1942 में हुई उस कांफ्रेंस में डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि मैं आपको कुछ बातें बताना चाहूंगा जिन्हें आपको अपने मस्तिष्क में रखनी चाहिए। उन्होंने डिप्रेस्ड क्लासेस के लोगों से कहा कि आप अपने बच्चों को शिक्षा दें। अपने बच्चों में महत्वाकांक्षा पैदा करें। उनके मस्तिष्क में महान बनने की बातें भरें। अपने बच्चों के मन से सभी प्रकार की हीन भावनाओं को निकाल दें। वे कौन थे जो दलितों, वंचितों, और महिलाओं में हीन भावनाएँ भरते थे? 

डॉ. अम्बेडकर के लिए बच्चों का शिक्षित होना बेहद महत्त्वपूर्ण था। वे चाहते थे कि भारत में सताई गई जातियों के बच्चे भी बड़े सपने देखें और उन्हें पूरा करने के लिए अपने जीवन में शीशा और आर्थिक तौर पर मजबूत होने को प्राथमिकता देंI   

उसी कांफ्रेंस में डॉ. अम्बेडकर ने वहां उपस्थित लोगों से कहा कि आप अपने बच्चों का विवाह करने की जल्दी न करें क्योंकि विवाह एक ज़िम्मेदारी है। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि आपको विवाह को अपने बच्चों पर थोपना नहीं चाहिए जब तक कि वे विवाह से उत्पन्न अपने दायित्वों को पूरा करने में वित्तीय रूप से सक्षम न हो जायें।

वे लोगों को समझा रहे हैं कि अपने बच्चों की शादी तब-तक मत करो जब-तक कि वे शादी की जिम्मेदारियां उठाने के लायक पैसे न कमाने लग जाएँ I उनके अनुसार शादी कोई बच्चों का खेल नहीं है I शादी एक बड़ी जिम्मेदारी है I

जिस समय अम्बेडकर शादी करने में जल्दबाजी करने के बुरे नतीजों के प्रति आगाह कर रहे हैं, उससे कुछ ही समय पहले 1929 में शारदा एक्ट बनने का मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा विरोध कर रही थीI ये लोग नहीं चाहते थे कि लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 14 साल तय की जाएI मदनमोहन मालवीय तथा बाल गंगाधर के अनुयायी भी लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 14 साल किये जाने का विरोध कर रहे थेI उन लोगों का विचार था कि लड़कियों की शादी जल्दी-से-जल्दी कर देनी चाहिएI 

1942 की उस कांफ्रेंस में डॉ. अम्बेडकर ने यह भी कहा कि “जो विवाह करेंगे उन्हें अपने मस्तिष्क में यह बात रखनी चाहिए कि अधिक बच्चे उत्पन्न करना एक अपराध है। अभिभावकों का सबसे बड़ा कर्तव्य इसमें निहित है कि वे प्रत्येक बच्चे को उसके माता-पिता से बेहतर शुरुआत दें।” (वही) I डॉ. अम्बेडकर समझा रहे हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा करना अपराध है I जाहिर सी बात है कि उनका आशय क़ानूनी अर्थों में अपराध होने से नहीं है I वे ज्यादा बच्चे पैदा करने को नैतिक अर्थ में अपराध कह रहे थे I 

एक तरफ तो अम्बेडकर 1942 में कह रहे हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा मत करो I क्योंकि माता-पिता के लिए ज्यादा बच्चों को उचित शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास दे पाना काफी मुश्किल होता हैI और दूसरी तरफ़ आरएसएस से जुड़े संगठन कहते रहे हैं कि आप ज्यादा बच्चे पैदा करोI अब आप भी सोचिए कि डॉ. अम्बेडकर और हिन्दुत्त्ववादी संगठनों के विचारों में से जनहित और देश हित के पक्ष में किसके विचार हैं? 

 2014 में विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक ने कहा था कि हिन्दू औरतों को पांच बच्चे पैदा करने चाहिए I अशोक सिंघल के बयान के एक साल बाद 2015 में भाजपा के सांसद साक्षी महाराज और विहिंप नेता साध्वी प्राची ने दो अलग-अलग मौकों पर कहा कि हिन्दू औरतों को चार बच्चे तो जरुर पैदा करने चाहिए I 2025 में कुम्भ मेले के दौरान विहिंप के एक व्यक्ति ने कहा कि हर हिंदू औरत को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए।  

डॉ. अम्बेडकर की नज़र में माता-पिता बनना एक तार्किक फैसला होना चाहिएI ऐसा फैसला जिसके केंद्र में होने वाले बच्चे या होने वाली बच्ची की बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, और सपने होने चाहिएI लेकिन हिन्दुत्त्ववादियों की नज़र में माता-पिता बनना तार्किक फैसला न होकर साम्प्रदायिकता सोच से पैदा हुआ उन्मादी फैसला होना चाहिएI जिसमें माता-पिता को पैदा होने वाले बच्चे या पैदा होने वाली बच्ची की बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान देने की बजाय, उस बच्चे या बच्ची को साम्प्रदायिक और हिंसक बनाने पर ध्यान देना चाहिएI   

अगर आपने स्वामी दयानंद सरस्वती की किताब सत्यार्थ पढ़ी हो आपको पता होगा कि उन्होंने वेदों की आज्ञा का हवाला देकर कहा है कि हर स्त्री को दस बच्चे पैदा करने चाहिए I  

डॉ. अम्बेडकर कह रहे हैं कि कम बच्चे पैदा करो, और हिन्दुत्त्व और सनातन के पैरोकार ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए कह रहे हैं I जैसे कि किसी हिन्दू औरत का जन्म केवल बच्चे पैदा करने के लिए ही हुआ है I 

डॉ. अम्बेडकर का कहना था कि “अभिभावकों का सबसे बड़ा कर्तव्य इसमें निहित है कि वे प्रत्येक बच्चे को उसके माता-पिता से बेहतर शुरुआत दें।” यानि माता-पिता या गार्जियन की शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, मनोरंजन, एस्पिरेशन आदि के मामले में नयी पीढ़ी की स्टार्टिंग लाइन अपने बुजर्गों से आगे हो I  

उसी कांफ्रेंस में डॉ. अम्बेडकर ने एक ऐसी बात कही जो किसी भी पितृसत्तात्मक संस्कृति तथा पितृसत्तात्मक जीवन पद्धति के खिलाफ है I जहाँ अनेक धर्म और धार्मिक किताबें स्त्री को पति का गुलाम बनने की शिक्षा देती हैं, वहीं डॉ. अम्बेडकर हर लड़की से कह रहे हैं कि वो अपने पति की दोस्त होने का दावा करे और अपने आप को पति का दास नहीं समझेI 

याद कीजिए कि कुछ देर पहले मैंने बताया था कि डॉ. अम्बेडकर ने वंचितों से कहा था कि वे अपने बच्चों के मन से सभी प्रकार की हीन भावनाओं को निकाल दें। यह बात हर पत्नी पर भी लागू होती है। दरअसल जब कोई धर्म या संस्कृति लड़कियों को यह शिक्षा देती है कि वे अपने आप को पति की गुलाम समझे या वो अपने पति को देवता समझे, तब वह धर्म या संस्कृति लड़कियों में हीन भावना भर रही होती है।

चाहे मौलाना अशरफ अली थानवी द्वारा लिखी हुई किताब बहिश्ती जेवर हो या मनुस्मृतिI तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस हो या  गुरू गोविन्द सिंह द्वारा लिखित चरित्रोपाख्यान नामक किताब। या गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होने वाला साहित्य हो। इस तरह का साहित्य लड़कियों को नियंत्रित करने और उन्हें पति का गुलाम बनने की शिक्षा देते हैं। अगर आप अक्षय मुकुल की किताब गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ़ हिंदू पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि हिन्दू महिलाओं को हिन्दू पुरुषों की उपनिवेश बनाए रखने के उद्देश्य से भी गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना की गयी थी I गीता प्रेस ने अपनी कल्याण नामक पत्रिका के माध्यम से ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का जमकर प्रचार किया।

ऐसे देश और ऐसे वातावरण में अम्बेडकर कह रहे हैं कि “विवाह करने वाली प्रत्येक लड़की को उसके पति के साथ खड़ा होने दें, उसे पति का मित्र होने का दावा करने दें और उसके समान होने का दावा करने दें, और उसकी दासी होने से इंकार करने दें।” 

इसलिए जिन लोगों को लगता है कि डॉ. अम्बेडकर केवल जाति का विनाश करना चाहते थे उन्हें पढ़कर समझना होगा कि वे पितृसत्ता का भी विनाश चाहते थे।

(बीरेंद्र सिंह रावत का लेख। रावत दिल्ली-विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग से संबद्ध हैं।)

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