अमरीकी आयोग ने बताया हिमंता, धामी और योगी को घोर साम्प्रदायिक

अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की वर्ष 2026 की वार्षिक रिपोर्ट ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, राज्य-स्तरीय शासन और प्रशासनिक नीतियों को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है। स्वतंत्र और द्विदलीय अमेरिकी संघीय निकाय माने जाने वाले यूएससीआईआरएफ ने अपनी रिपोर्ट में लगातार सातवें वर्ष भारत को “विशेष चिंता वाले देश”  की श्रेणी में शामिल करने की सिफारिश की है।

इस बार रिपोर्ट की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इसमें केवल केंद्र सरकार की नीतियों या राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर ही नहीं, बल्कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्रशासनिक कार्रवाइयों, सार्वजनिक बयानों और विधायी पहलों का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि विभिन्न राज्यों में प्रशासनिक और कानूनी तंत्र का उपयोग धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रभावित करने वाले उपायों के लिए अधिक आक्रामक रूप से किया जा रहा है। हालांकि, भारत सरकार ने रिपोर्ट को “पक्षपातपूर्ण”, “पूर्वाग्रहपूर्ण” और देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाला दस्तावेज बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया है।

राज्य-स्तरीय सत्ता का केंद्रीकरण और ‘बुलडोजर न्याय’ का उदय

यूएससीआईआरएफ की 2026 की रिपोर्ट में एक बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित है कि कैसे भारतीय राज्यों में न्यायपालिका की सामान्य प्रक्रिया को दरकिनार कर प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग किया जा रहा है। इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीतियों को एक मिसाल के रूप में पेश किया गया है।

रिपोर्ट में ‘बुलडोजर संस्कृति’ या ‘सजात्मक लोक प्रशासन’ के बढ़ते चलन पर गहरी चिंता जताई गई है। आयोग का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में दंगों, विरोध प्रदर्शनों या गोकशी के आरोपियों—जो बहुधा मुस्लिम समुदाय से आते हैं—के घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया या अदालत के अंतिम फैसले के, ‘अवैध अतिक्रमण’ हटाने के बहाने ढहा दिया गया। रिपोर्ट इसे कानूनी व्यवस्था का उल्लंघन और सामूहिक सजा का एक रूप मानती है।

इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश में कड़े आतंकवाद विरोधी और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों (जैसे रासुका ) के उपयोग को लेकर भी टिप्पणी की गई है, जिसके तहत कई पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों को लंबे समय तक हिरासत में रखा गया। रिपोर्ट में राज्य प्रायोजित या राज्य समर्थित इस तरह की कार्रवाइयों को अल्पसंख्यक समुदायों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा करने वाला बताया गया है।

विस्थापन, जनसांख्यिकी और हिमंत बिस्वा सरमा

रिपोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण और विस्तृत अध्याय असम और वहां के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा करता है। यूएससीआईआरएफ ने अपनी रिपोर्ट और विशेष कांग्रेस सुनवाइयों में असम को “राज्य-नेतृत्व वाले विस्थापन” का एक प्रमुख केंद्र माना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि असम सरकार द्वारा चलाए गए बड़े पैमाने पर बेदखली अभियानों के कारण हजारों बंगाली भाषी मुस्लिम परिवार बेघर हो गए हैं।

आयोग ने मुख्यमंत्री सरमा के सार्वजनिक बयानों को सीधे तौर पर उद्धृत करते हुए आरोप लगाया है कि उनकी भाषा अक्सर ध्रुवीकरण करने वाली और बंगाली मूल के मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’ या राज्य की संस्कृति के लिए ‘अस्तित्वगत खतरा’ दिखाने वाली होती है। रिपोर्ट का दावा है कि इस तरह के बयानों से न केवल सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है, बल्कि जमीन पर गोरक्षकों और दक्षिणपंथी समूहों को हिंसा करने के लिए एक प्रकार की मूक सहमति या प्रोत्साहन मिलता है।

इसके अलावा, असम मवेशी संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों के सख्त कार्यान्वयन को लेकर भी चिंता जताई गई है, जिसके कारण अल्पसंख्यक समुदायों के पारंपरिक व्यवसायों और आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हुआ है। पुलिस मुठभेड़ों की बढ़ती संख्या को भी इस रिपोर्ट में मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के हनन से जोड़कर देखा गया है।

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता और धामी

यूएससीआईआरएफ की इस रिपोर्ट का एक बिल्कुल नया और तकनीकी पहलू उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उठाए गए विधायी कदमों से संबंधित है। उत्तराखंड भारत का पहला ऐसा राज्य बना जिसने समान नागरिक संहिता को विधानसभा से पारित कर कानून का रूप दिया। यूएससीआईआरएफ ने अपनी 2026 की रिपोर्ट और कंट्री अपडेट्स में इस कानून की बारीकियों की आलोचना की है।

रिपोर्ट का तर्क है कि हालांकि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए एक समान व्यक्तिगत कानून बनाना है, लेकिन उत्तराखंड के प्रारूप में कुछ ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से, ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (बिना शादी के साथ रहने वाले जोड़ों) के अनिवार्य पंजीकरण और ऐसा न करने पर जेल व जुर्माने की सजा के प्रावधान को आयोग ने व्यक्तिगत गोपनीयता और स्वतंत्रता का हनन माना है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रकार के कानून राज्य की मशीनरी को अंतर-धार्मिक जोड़ों को परेशान करने, उनकी निगरानी करने और उन्हें निशाना बनाने के लिए एक कानूनी हथियार प्रदान करते हैं। इसके साथ ही, उत्तराखंड में लागू किए गए सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून की भी रिपोर्ट में आलोचना की गई है, जिसके तहत ईसाई मिशनरियों, पादरियों और स्थानीय मुस्लिम नागरिकों को कथित तौर पर जबरन धर्मांतरण के झूठे आरोपों में फंसाने और प्रताड़ित करने की घटनाएं सामने आई हैं।

प्रतिबंधों की मांग और अमेरिकी नीति पर संभावित प्रभाव

इस वर्ष की यूएससीआईआरएफ रिपोर्ट में जो बात सबसे ज्यादा चौंकाने वाली और अभूतपूर्व है, वह है इसकी सिफारिशों का दायरा। आयोग ने न केवल भारत को ‘सीपीसी’ श्रेणी में रखने की बात दोहराई है, बल्कि अमेरिकी सरकार से यह भी सिफारिश की है कि वह उन भारतीय सरकारी एजेंसियों, राज्य स्तर के अधिकारियों और नेताओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाए, जो धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर और व्यवस्थित उल्लंघनों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

इसमें संपत्तियों को फ्रीज करने और वीजा प्रतिबंध लगाने जैसी कार्रवाइयां शामिल हो सकती हैं। यद्यपि ये सिफारिशें अमेरिकी विदेश मंत्रालय  के लिए बाध्यकारी नहीं होती हैं और अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को देखते हुए अक्सर इन सिफारिशों को दरकिनार करता आया है, फिर भी अंतर्राष्ट्रीय पटल पर इस तरह की रिपोर्टों का आना भारत की वैश्विक छवि को प्रभावित करता है।

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा केवल आंतरिक मानवाधिकारों का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिरता और अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी के लोकतांत्रिक मूल्यों को भी प्रभावित कर सकता है।

भारत सरकार ने किया  रिपोर्ट को सिरे से खारिज

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कैसे पश्चिमी मानवाधिकार संगठन और अमेरिकी नियामक संस्थाएं भारत के भीतर हो रहे वैधानिक और प्रशासनिक बदलावों को बहुत बारीकी से देख रही हैं। बहरहाल, भारत का विदेश मंत्रालय इस पूरी रिपोर्ट को सिरे से खारिज करता रहा है। भारत सरकार का स्पष्ट स्टैंड है कि भारत एक जीवंत और मजबूत लोकतांत्रिक देश है, जहां कानून का शासन चलता है और सभी नागरिकों को संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की पूर्ण गारंटी प्राप्त है।

भारत के अनुसार, यूएससीआईआरएफ जैसी संस्थाएं भारत के सामाजिक ताने-बाने और जटिलताओं को समझे बिना, चुनिंदा और मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर एकतरफा नैरेटिव तैयार करती हैं। मुख्यमंत्रियों पर लगाए गए आरोपों के जवाब में भारतीय समर्थकों और राज्य सरकारों का कहना है कि ये सभी कार्रवाइयां कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अवैध घुसपैठ को रोकने, राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून के दायरे में रहकर की गई हैं। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच वैचारिक और कूटनीतिक मोर्चे पर एक बार फिर से खींचतान और असहमति के बिंदुओं को उजागर करती है।

(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं।)

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