Wednesday, August 17, 2022

बयानों तक क्यों सीमित हैं मी लॉर्ड के अल्फाज?

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‘अधिनायकवादी सरकारें अपनी सत्ता को मजबूत करने की खातिर झूठ पर निर्भरता के लिए जानी जातीं हैं, हम देखते हैं कि दुनियाभर के देशों में कोविड-19-डेटा में हेर-फेर करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, इसलिए जरूरी है कि समाज के प्रबुद्ध लोग सरकारों के झूठ का पर्दाफाश करें, एक लोकतांत्रिक देश में सरकारों को जिम्मेदार ठहराना और झूठ तथा झूठे आख्यानों व फर्जी ख़बरों से बचाव करना बहुत जरूरी व महत्वपूर्ण है, सत्य के लिए केवल राज्य पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ट्विटर, फेसबुक आदि जैसे सोशल मीडिया मंचों को झूठी सामग्री के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, लोगों को सतर्क रहना चाहिए और पढ़ने, बहस करने और अलग-अलग राय स्वीकार करने के लिए अपना जेहन बिल्कुल खुला रखना चाहिए, आज हमारी सच्चाई बनाम आपकी सच्चाई के बीच एक प्रतियोगिता है..और सत्य को अनदेखा करने की एक प्रवृत्ति है।

हम केवल वही अखबार पढ़ते हैं, हम उसी टीवी चैनल को देखते हैं, जो हमारे विश्वासों से मेल खाते हैं, नहीं तो उसे लेना बंद कर देते हैं या म्यूट कर देते हैं, हम उन लोगों द्वारा लिखी गई किताबों को नजरंदाज कर देते हैं, जो हमारी राय या मत से संबन्धित नहीं हैं, हम वास्तव में सच्चाई की परवाह ही नहीं करते। हमें स्कूलों और कॉलेजों में सकारात्मक माहौल का निर्माण करके छात्रों को झूठ से सच्चाई को अलग करने को प्रेरित करना चाहिए, ताकि वे सच्चाई को अलग करना सीख सकें और सत्ता में बैठे कर्णधारों से सवाल पूछ सकें, पिछले दिनों दुनियाभर की सरकारों द्वारा कोविड-19 के संक्रमण या मृतकों की संख्या के आँकड़ों में हेराफेरी करके आम जनता को भ्रमित करने का काम किया गया है। लोकतंत्र में राज्य या केन्द्र की सरकारें राजनैतिक कारणों से झूठ नहीं बोल सकतीं, आजकल फेक-न्यूज का चलन खूब बढ़ा है।

इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहचान लिया है, इसे इन्फोडेमिक कहते हैं, आजकल लोगों में सनसनीखेज़ खबरों की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति होती है, इस स्थिति में मीडिया को निष्पक्षता सुनिश्चित करनी चाहिए, आजकल ट्विटर, फेसबुक आदि पर झूठ का बोलबाला है, सिर्फ सरकारी बयान और आँकड़ों को चरम् और परम् सत्य नहीं माना जा सकता, जनता को अपने विवेक का इस्तेमाल करना ही चाहिए, झूठ को बेनक़ाब करने का जिम्मा बुद्धजीवियों का है, सबके झूठ को सार्वजनिक करना बुद्धिजीवियों का परम् कर्त्तव्य है, हमारा आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते ‘है, वाट्सएप और ट्विटर जैसे सोशल मिडिया के प्लेटफॉर्मों के अध्ययन से यह पता चलता है कि वहाँ झूठ का ही बोलबाला है,सत्य आधुनिक लोकतंत्र के कामकाज का अभिन्न अंग है, लोकतंत्र और सच्चाई साथ-साथ चलते हैं, लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए सच्चाई की अत्यंत जरूरत है, चूँकि लोकतंत्र स्पेस ऑफ रीजंस है, इसलिए सत्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि कारण झूठ पर आधारित नहीं हो सकते, लोकतंत्र में जनता के विश्वास बहाली के लिए सत्य का बहुत ज्यादा महत्व है,सत्य को जानने के लिए ‘किसी एक पर ‘भरोसा नहीं किया जा सकता, अमेरिकी लब्धप्रतिष्ठित बुद्धिजीवी नोआम चॉम्स्की को उद्धृत करते हुए कहा कि बुद्धिजीवियों का यह कर्तव्य है कि वे राज्य के झूठ का पर्दाफाश करें। ‘              

उक्त टिप्पणी भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश एमसी छागला स्मृति व्याखानमाला में ‘स्पीकिंग ट्रूथ टू पॉवर सिटिजंस एंड द लॉ ‘ या ‘ नागरिकों के सत्ता से सच बोलने के अधिकार ‘ विषय पर बोलते हुए सुप्रीमकोर्ट के जज न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने अपनी अभिव्यक्ति में कही हैं।

यक्ष प्रश्न है कि लोकतंत्र के लिए सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश के उक्त बयान से इतर कोई इतनी विस्तृत समीक्षा में और कुछ जोड़ने की गुंजाइश बहुत ही कम है, लेकिन इसी सत्य और निष्पक्ष विचार की अभिव्यक्तिकरण में इसी शासन व्यवस्था में इस देश के बहुत से बुद्धिजीवी आजकल जेलों में सड़ाए जा रहे हैं और बहुत से यथा स्टेन स्वामी, प्रोफेसर कलबुर्गी, कामरेड पानसारे, डॉक्टर दाभोलकर और गौरी लंकेश सहित पचासों सत्य को उद्घाटित करने वाले पत्रकारों व सुबोध कुमार सिंह जैसे कर्तव्यपरायण तथा कर्मठ और सत्य निष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर को सत्ता प्रायोजित गुँडों द्वारा निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतारा जा चुका है।

लेकिन उन सत्ता प्रायोजित गुंडों को अभी तक कोई सजा नहीं हुई है, वे आज भी इस देश में खुले साँड़ की तरह स्वच्छंदता और निर्भीकता से घूम रहे हैं और किसी गरीब चूड़ीवाले को पीट रहे हैं, एक गरीब आदिवासी युवक को ट्रक के पीछे बांधकर उसे सड़क पर निर्ममता से घसीट कर मौत के घाट उतार रहे हैं। किसी दलित वर्ग की लड़की से दिन-दहाड़े बलात्कार कर,उसकी रीढ़ तोड़कर, उसकी जीभ काटकर उसकी हत्या कर दे रहे हैं। इससे भी भयावहतम् दुःस्वप्निल स्थिति यह है कि उस राज्य का मठाधीश मुखिया उस बेसहारा लड़की के घर वालों के लाख रिरियाने और अनुनय के बावजूद उस दलित लड़की को रात के अंधेरे में जलाकर सभी सबूत नष्ट कर देने का अक्षम्य अपराध कर देता है। वास्तविकता यही है कि सरकारों के झूठ के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वाले पत्रकारों, एक्टिविस्टों, व्हिसिलब्लोवरों के सिर पर सत्ता प्रायोजित गुंडों से उनके सिर पर सदा मौत भी मंडराती रहती है। सुप्रीम कोर्ट इस भयावहतम् स्थिति पर मौन है, इस पर भी कथित लोकतांत्रिक अधिनायकवादी कर्णधारों के खिलाफ माननीय सुप्रीमकोर्ट को बेखौफ, बेबाकी से और निष्पृहता से अपनी राय रखनी ही चाहिए।

(निर्मल कुमार शर्मा पर्यावरणविद और टिप्पणीकार हैं।)

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