Sunday, December 4, 2022

उत्तर प्रदेश: वहशत भला जाती क्यों नहीं है?

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अब उत्तर प्रदेश में जंगल राज की चर्चा नहीं होती। इसका एक कारण तो यह है कि अपने खास चरित्र के बन्दी मीडिया ने 2017 में अखिलेश के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी का राज खत्म होते ही उसको खत्म मान लिया और अब कई निहित स्वार्थों के चलते योगी आदित्यनाथ की भारतीय जनता पार्टी सरकार को असुविधा में डाल सकने वाले किसी भी मुहावरे के इस्तेमाल से बचने में ही भलाई समझता है। भाजपा के प्रतिद्वंद्वी विपक्षी दल जंगल राज की बात भी करते हैं तो वह उसे तवज्जो नहीं देता।

दूसरा कारण यह है कि प्रदेश में जंगल राज के, खासकर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों, यौन हमलों और अत्याचारों के मामले में, न्यू नार्मल में बदल जाने के बावजूद योगी सरकार ने अपने अलोकतांत्रिक, पितृसत्ता के हामी और इस कारण बेदिल समर्थकों के बूते उसे झुठलाने के अपने सामर्थ्य का ऐसा वितान रच रखा है कि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की राम की शक्ति पूजा की बहुचर्चित पंक्ति ‘अन्याय जिधर है उधर शक्ति’ बार-बार सार्थक होती दिखती है।

स्वाभाविक ही जंगल राज से पीड़ित व पस्तहिम्मत लोग खुद को भाजपा या योगी से यह शिकायत करने की स्थिति में भी नहीं पाते कि हमने तो आपके नेताओं द्वारा किये गये इस दावे पर एतबार करके आपको दोबारा सरकार चलाने के लिए चुन लिया था कि आप प्रदेश में ऐसा रामराज ले आये हैं, जिसमें गुंडों व लफंगों के डर से दिन में भी बाहर निकलने या स्कूल-कालेज जाने से डरने वाली महिलाएं या कि बहू-बेटियां आधी रात में भी कीमती गहने पहनकर सड़क पर निकल सकती हैं।

लेकिन किसान आन्दोलन के दौरान गृहराज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे द्वारा किसानों को कुचल मारने की वहशत के लिए चर्चित लखीमपुर खीरी जिले में दो अवयस्क दलित बेटियों के साथ हुई नई वहशत ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि प्रदेश में जंगल राज के ज्यादातर अंदेशे बेटियों के नाम ही लिखे हुए हैं। वे दलित या वंचित तबके से आती हैं, तब तो और भी। ऐसा नहीं होता तो यह क्यों कर हो सकता था कि वहशी उक्त जिले के निघासन कोतवाली क्षेत्र के लालपुर गांव की उक्त बेटियों को उनके घर से ले जाते, दरिन्दगी के बाद उनके ही दुपट्टों से उनके गले घोंट देते और मर जातीं तो उनकी लाशें एक खेत में स्थित पेड़ से लटका देते।

यह भी क्यों कर हो सकता था कि योगी सरकार इन बेटियों से हुई हैवानियत की शर्म महसूस करने के बजाय इसको लेकर अपनी पीठ ठोकने लगती कि उसकी पुलिस ने तुरत-फुरत वहशियों को पकड़कर उन पर कड़ी धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। क्या वहशियों को कड़ी से कड़ी सजा भी इन बेटियों के गरिमापूर्वक जीने के बर्बरतापूर्वक छीन लिये गये अधिकार की भरपाई कर सकती है? अगर नहीं तो यह सरकार क्यों कर उनके जीवन और उसकी गरिमा की सुरक्षा में अपनी विफलता को उनके कुसूरवारों को ‘ऐसी सजा दिलाने के जो मिसाल बन जाये’ के डपोरशंखी दावे के बोझ से दबा देना चाहती है? इस सवाल का सामना क्यों नहीं करती कि राज्य में कानून व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है कि अपराधियों को किसी भी वारदात को अंजाम देते कोई भय या झिझक नहीं होती?

इसी घटना पर केन्द्रित करें तो इससे पहले आई उन खबरों के बारे में वह मौन क्यों है, जिनके अनुसार उन बेटियों के माता-पिता ने दोनों के घर से कथित तौर पर अपहृत किये जाने को लेकर पुलिस से सम्पर्क किया तो पुलिस का रवैया बहुत बेरुखी वाला और प्रताड़ना भरा था? मां कह रही थी कि तीन नराधम जबरदस्ती उसकी बेटियों को खींचकर ले गए, तो अपने खास वर्गचरित्र के लिए जानी जाने वाली पुलिस किसी भी तरह उसकी बात सुनने या मानने को तैयार नहीं थी। मां की मानें तो उसकी बात को नकारने के लिए उसके द्वारा भरपूर पुलिसिया हथकंडे अपनाये गये।

फौरन निष्कर्ष निकाल लिया गया कि बेटियों का अपहरण नहीं हुआ, लेकिन उन्हें ढूंढ़ने में कोई रुचि नहीं दिखाई गई। दिखाई जाती तो कौन जाने, वहशियों को उनकी हत्या का समय नहीं मिलता और वे बच जातीं। लेकिन कैसे बच जातीं? पेड़ पर लटके उनके शव मिल जाने के बाद उनके क्षुब्ध परिजन रोते-बिलखते सड़क जाम कर रहे थे, तब भी पुलिस उनको कानून पढ़ाते हुए ऐसा न करने की हिदायत ही दे रही थी। अभी भी वह अपने इस दावे पर कायम है कि वहशी इन बेटियों को उनके घर से जबरन नहीं बल्कि बहलाकर खेत में ले गये थे, जहां रेप के बाद उन्होंने इसलिए उनकी हत्या कर दी क्योंकि ‘इज्जत लुट जाने के बाद’ वे उन पर खुद से शादी का दबाव बना रही थीं।

गौरतलब है कि एक ओर उपमुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य कह रहे हैं कि बेटियों के कुसूरवारों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवायेंगे, जबकि दूसरी ओर पुलिस का रवैया सामान्य इंसाफ की राह को भी कठिन बनाने वाला है। वह यह कहकर कि बेटियां अपनी मर्जी से वहशियों के साथ गयी थीं, परोक्ष रूप से उनके साथ वहशत की जिम्मेदारी उन पर ही डाल देना चाहती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह पितृसत्तात्मक रवैया अपनाकर उनके चरित्र हनन की भी कोशिश कर रही है, जबकि उसे इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि वे अपनी मर्जी से गईं या उन्होंने रेप के बाद रेपिस्टों पर खुद से शादी का दबाव डाला तो क्या उनका रेप और मर्डर कुछ कम गम्भीर या कम जघन्य हो जाता है? अगर उन्होंने शादी का दबाव डाला, हालांकि यह वहशियों द्वारा उनकी हत्या के लिए गढ़ा गया बहाना भी हो सकता है, तो उसके पीछे भी उनकी विवशता ही थी। उन्हें मालूम था कि अन्यथा पितृसत्तात्मक समाज उनके साथ हुए रेप की भी उन्हें रेपिस्टों से कहीं ज्यादा सजा देगा।   

अब वे इस संसार में नहीं हैं तो भी उनके मामले को लेकर प्रदेश सरकार और विपक्षी दलों के बीच छिड़े वाक्युद्ध के बीच, जैसा कि कई प्रेक्षकों ने लिखा है, साफ नजर आ रहा है कि उनके परिजनों ने उनके लिए इंसाफ की लम्बी लड़ाई की हिम्मत नहीं दिखाई, साथ ही सत्ताधीशों व उनके द्वारा नियंत्रित प्रशासनिक अधिकारियों के आगे अपनी आवाज ऊंची नहीं रख पाये तो यह वहशत भी गहरी कालिख की तरह दमनात्मकता से भरे भारतीय समाज की विडम्बनाओं के लम्बे इतिहास में विलीन हो जायेगी। हां, उन्हें यह भी समझना होगा कि मुख्य धारा के मीडिया में अभी उन्हें जो सहानुभूति या समर्थन मिलता दिख रहा है, उसके पीछे कोई सदाशयता या ईमानदारी नहीं है।

दरअसल, वहशियों के अल्पसंख्यक समुदाय से होने के कारण उसे इस मामले में अल्पसंख्यकों को खलनायक बनाने का नया अवसर हाथ आता दिख रहा है और वह उसका बदनीयती भरा इस्तेमाल करना चाहता है। अन्यथा उसके लिए उनका दर्द भी बिलकिस बानो या कठुआ की बच्ची के दर्द से अलग नहीं है।

यह बात समय रहते नहीं समझी गई तो वह सामाजिक अन्याय और बड़ा होकर दलितों व वंचितों की राह रोकने लगेगा, जो आजादी के 75 साल बाद भी उन्मूलित नहीं हो पाया है, और बहू-बेटियों की ही नहीं, उन सबकी दुर्दशा का कारण बना हुआ है।

(कृष्ण प्रताप सिंह जनमोर्चा के संपादक हैं और आजकल फैजाबाद में रहते हैं।)

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