चुनावी धांधलियों के संदर्भ में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सबूतों का एटम बम फोड़ने की बात कही थी। राहुल गांधी ने धांधलियों के पांच तरीकों को सब के सामने रख दिया, उदाहरण के साथ। अब इस पर तरह-तरह की चर्चा हो रही है। चुनाव आयोग ने हलफनामा के साथ सबूत देने की बात कही है। चुनाव आयोग हलफनामा लेकर क्या करेगा! नतीजा पर तो वह पहले पहुंचा हुआ है। कह रहा है कि राहुल गांधी के आरोपों में कुछ भी नया नहीं है, सब पहले का स्क्रिपटेड है! तो फिर चुनाव आयोग हलफनामा का क्या करेगा भला! यह बहुत ही गंभीर मामला है और हर जगह हुज्जत करने वालों के फूंक मारने से आरोपों के पहाड़ उड़ नहीं जायेंगे! चुनाव आयोग की तरफ से भारतीय जनता पार्टी के लोग दीवार बनकर खड़े हैं! लेकिन यह दीवार बहुत कच्ची है। मामला अभी विचाराधीन है।
इसी सिलसिला में राहुल गांधी ने अलग से अपने बचपन को याद किया। राहुल गांधी ने 1980 के दशक में बनाने और पोस्टर चिपकाने की बात कही है। कुछ नामी-गिरामी पत्रकार लोगों को बता रहे हैं कि वे कहां पोस्टर चिपकाया करते थे? वे इतने बड़े परिवार से आते हैं! इन नामी-गिरामी पत्रकारों को पता ही नहीं है कि इमरजेंसी के समय 1977 में हुए चुनाव के बाद ‘गांधी परिवार’ की क्या स्थिति थी! ‘गांधी परिवार’ की जिंदगी कभी भी राजनीतिक चुनौतियों से खाली नहीं रही! लेकिन खैर! इस बात को जाने दिया जाये! रही बात कि कहां पोस्टर चिपकाते थे? इन नामी-गिरामी पत्रकारों को नहीं पता! सचमुच नहीं पता! अरे-अरे, परेशान न हों!
राहुल और प्रियंका गांधी उसी जगह पोस्टर चिपकाया करते थे जहां ‘अच्छे दिन लाने का वादा करनेवाले’ बड़े लोग मगरमच्छ पकड़ा करते थे! जाकर कोई भी देख सकता है। यकीनन, वहीं कहीं पकड़े गये उन मगरमच्छों के परिवार के कुछ सदस्य मिल जायेंगे, क्या पता वहीं राहुल और प्रियंका गांधी के चिपकाये पोस्टर भी देखने को मिल सकते हैं। खैर! इस बात को जाने दिया जाये!
असल में कुछ लोगों की संवेदना किसी खास परिस्थिति और प्रसंग में बनी अपनी राय के साथ इस तरह से जड़ीभूत हो जाती है कि उस खास परिस्थिति और प्रसंग के बदल जाने के बाद भी उन की राय किसी भी तरह के तर्क-वितर्क से नहीं बदलती है। राहुल गांधी की सात पीढ़ियों का इतिहास लोगों को पता है। कुछ लोग उन के परिवार के नकारात्मक तत्व को राहुल गांधी से जोड़कर अपने विचार की दिशा और दशा बना लेते हैं, कुछ लोग उन के परिवार के सकारात्मक तत्व को राहुल गांधी से जोड़कर अपनी राय बना लेते हैं।
बड़े परिवार से जुड़े लोगों के साथ इस तरह की समस्याएं होती ही है कि वह अपने पुरखों की छाया तले बोनसाई बनकर रह जाया करते हैं। कुछ ही लोग होते हैं जो ऐसे बड़े परिवार के व्यक्ति को उन के पुरखों की छाया की कैद से बाहर निकालकर विचार करते हैं। व्यक्ति के पारिवारिक संदर्भ के नकारात्मक और सकारात्मक तत्वों से मुक्त स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह से उसे देख पाते हैं। राहुल गांधी के व्यक्तित्व की खूबी-खामी का हिसाब-किताब यह है कि उस ने अपने पुरखों की छाया से बाहर निकलकर खुदमुख्तारी का ऐलान किया और बोनसाई बनने से इनकार कर दिया। यह कोई आसान काम नहीं होता है।
भारत की राजनीति में राहुल गांधी अकेले राहुल नहीं रहे हैं! दूसरा राहुल! जी राहुल महाजन। प्रमोद महाजन, भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता रहे हैं 2006 में जिनकी हत्या हो गई थी। उन के पुत्र हैं राहुल महाजन और पुत्री पूनम महाजन! क्या हुआ उन लोगों का! पूनम महाजन तो कर दी गई थी। उनके दो बच्चे हैं – बेटी पूनम महाजन और बेटा राहुल महाजन। दोनों ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का मौका मिला। राहुल महाजन को तो खैर, जाने दिया जाये! लेकिन पूनम महाजन तो की कोशिश की, लेकिन केवल पूनम महाजन ही सक्रिय रूप से राजनीति में शामिल हुईं।
प्रमोद महाजन की पुत्री पूनम महाजन 2009 में घाटकोपर वेस्ट संसदीय सीट से पहला चुनाव लड़ी, हार गई। लेकिन 2014 और 2019 में तो दो बार मुंबई नॉर्थ सेंट्रल लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं! 2024 में भारतीय जनता पार्टी से टिकट नहीं मिला! क्या हुआ प्रमोद महाजन के परिवार के राजनीतिक विरासत का? तो यह कि लोकतंत्र में परिवार के राजनीतिक विरासत को बचाना और पुरखों की छाया से बाहर निकलकर अपने स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व को जनता के दिलोदिमाग से जोड़ लेना इतना आसान नहीं हुआ करता है। लेकिन नामी-गिरामी लोगों को भला कौन समझाये!
कांग्रेस के साथ-साथ भारत के राजनीतिक दलों ने आजादी और लोकतंत्र के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया है। हां, उन राजनीतिक दलों में राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ और उस से जुड़े संगठन शामिल नहीं रहे हैं। बल्कि यह माना जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ से जुड़े लोग लोकतंत्र, कम-से-कम लोकतंत्र के इस स्वरूप से पूरी तरह असहमत रहे हैं। लोकतंत्र ही क्यों लोकतंत्र के स्थापित करनेवाले संविधान से भी न केवल असहमत रहे हैं, बल्कि विरोधी भी रहे हैं।
यह इतिहास की विडंबना ही है कि आज राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ और उस से जुड़े संगठनों के हाथ भारत का लोकतंत्र भी है और संविधान भी है। सत्ता की शक्ति उन की ‘मुट्ठी’ में है। लोकतंत्र का मूलाधार है फ्री, फेयर चुनाव। इस के लिए संविधान में स्वयं-सक्षम चुनाव आयोग की व्यवस्था किये जाने के प्रावधान हैं।
आज मुश्किल यह है कि चुनाव आयोग खुद फ्री, फेयर नहीं दिखता है। ऐसे में हम भारत के लोगों के सामने लोकतंत्र का संकट न सिर्फ राजनीतिक है, न सिर्फ चुनावी है, बल्कि उस से कहीं अधिक गहरा और व्यापक है। आज के संकट को सिर्फ कांग्रेस का संकट मानना कहां तक उचित है! लोकतंत्र के संकट की गहराई और व्यापकता पर हर नागरिक को गंभीरता से सोचना होगा। सुप्रीम कोर्ट पर लोगों को भरोसा है, देखा जाये क्या फैसला होता है।
इतना अंधेरा क्यों है! 2014 में भारत के अधिकांश लोगों को लगा था, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘अच्छे दिन’ आयेंगे! भारतीय जनता पार्टी और उन के सत्ता सहयोगी के लिए यह पचा पाना बहुत मुश्किल हो रहा है कि राहुल गांधी अब मात्र कांग्रेस के नेता नहीं हैं, बल्कि देश के नेता के रूप में स्वीकृति हासिल कर रहे हैं। दशक बाद, अब अधिकांश लोगों को लग रहा है, राहुल गांधी देश को ‘अच्छे दिन के संकट’ से बचा लेंगे! परीक्षा तो बिहार में है!
लोगों को उम्मीद है राहुल गांधी देश को ‘अच्छे दिन के संकट’ से बचा लेंगे! क्या यह उम्मीद बिल्कुल बेबुनियाद है?
(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)