‘हो’ समाज के युवा, लेखन व साहित्य सृजन के कार्यों में आगे आएं – कानजी पटेल

उल्लेखनीय है कि झारखंड की द्वितीय राजभाषाओं में खोरठा, संथाली, बंगाली, उर्दू, नागपुरी, कुरुख, मुंडारी, हो, उड़िया, कुरमाली, पंचपरगनिया, खड़िया और माल्टो शामिल हैं। माल्टो जो उत्तरपूर्वी छोटा नागपुर पठार में राजमहल पहाड़ियों का एक आदिम जनजातीय समूह है, जिन्हें माल पहाड़िया भी कहा जाता है। आज उत्तरपूर्वी छोटा नागपुर पठार जो झारखंड के संथाल परगना डिवीजन के रूप में जाना जाता है।

बता दें कि 2018 में मगही, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका को भी दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया था। लातेहार, पलामू और गढ़वा में मगही और भोजपुरी बोली जाती है। दुमका, देवघर, गोड्डा और साहेबगंज में मैथिली और अंगिका बोली जाती है। वहीं जामताड़ा और पाकुड़ में अंगिका तथा जमशेदपुर में मैथिली भी बोली जाती है।

द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद आदिवासी समुदाय का ‘हो’ समाज के प्रबुद्ध वर्ग लेखक, कवि, साहित्यकार हर वर्ष राजभाषा का वर्षगांठ मनाते आ रहे हैं। जिसमें देश के विभिन्न राज्यों व क्षेत्र के लेखक, कवि, साहित्यकार शामिल होते हैं। इसी के आलोक में पिछले दिनों राज्य के चाईबासा स्थित पिल्लई टाऊन हॉल में झारखंड की द्वितीय राजभाषा ‘हो’ के 14 वें वर्षगांठ पर एक समारोह का आयोजन किया गया। 

उक्त 14 वें वर्षगांठ के अवसर पर समारोह के मुख्य अतिथि गुजरात के प्रख्यात साहित्यकार व राष्ट्रीय कवि कानजी पटेल द्वारा संकलित 140 भाषाओं में लिखी 400 आदिवासी कवियों की रचनाओं पर आधारित 600 पन्नों की पुस्तक “अनुत्तरित लोग : भारतीय समकालिन आदिवासी कविता संचय” का विधिवत विमोचन किया गया। 

इस अवसर पर कानजी पटेल ने आदिवासी ‘हो’ समाज के पढ़े-लिखे युवा लेखकों-कवियों को संबोधित करते हुए कहा कि “हो समाज के सभी पढ़े-लिखे युवा इस तरह लेखन व साहित्य सृजन के कार्यों में आगे आएं।” 

उन्होंने आदिवासी युवा लेखकों और कवियों का आह्वान किया कि वे आगे बढ़कर लेखन की परंपरा को सशक्त बनाएं और अपने समाज में पुस्तकों की संख्या में वृद्धि करें। बता दें कि ‘हो’ आदिवासी झारखंड के कोल्हान क्षेत्र का एक बहुसंख्य आदिवासी समुदाय है।

बताते चलें कि प्रख्यात साहित्यकार कानजी भाई पटेल ने भारत के 140 आदिवासी भाषाओं के 600 कवियों की कविताओं का हिंदी और अंग्रेजी में एक संकलन तैयार किया है, जिसमें खोरठा को भी शामिल किया है। इस संकलन में खोरठा के साहित्यकार प्रहलाद चन्द्र दास और शांति भारत की कविताएं भी शामिल हैं। इस समारोह में झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश आदि प्रांतों से कई साहित्यकार शामिल हुए। 

उड़िसा के आये युवा चित्रकार श्रमिक बारजो ने कानजी पटेल जी की अपनी एक पेंटिंग उनके मानचित्र के रुप में भेंट किया। इस अवसर पर क्रमशः श्री अनुज प्रधान, शान्ति भारत, मदन मोहन सोरेन, सिदेश्वर सरदार, प्रदीप कुमार, पाईकिराय चम्पिया, तिलक बारी, रमेश चन्द्र सावैयां, बेला जेराई, दांसर बोदरा, जवाहरलाल बांकिरा, गणेश मुर्मू, सतीश चन्द्र सामड़ एवं हो भाषा-भाषी छात्र-छात्राओं ने अपनी-अपनी मातृभाषा में कविता पाठ किया। 

अतिथि के तौर पर बोकारो से आए खोरठा कवि शान्ति भारत और खोरठा लोकगायक प्रदीप कुमार ने भी समारोह में भाग लिया और खोरठा भाषा के महत्व पर अपनी बात रखी।

अवसर पर श्यामलाल सिंह पुरती ने पंश्चिम बंगाल, ओडिशा व झारखंड के कवियों की उपस्थिति को ऐतिहासिक बताते हुए इसे आदिवासी साहित्यिक आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि कहा।

कार्यक्रम का प्रारंभ आदिवासी ‘हो’ भाषा की वाराङ क्षिति लिपि के आविष्कारक और ‘हो’ भाषा के महान साहित्यकार और भाषाविद् लको बोदरा की तस्वीर पर माल्यार्पण के साथ हुआ।

बता दें कि वाराङ क्षिति लिपि पूर्वी भारत की आदिवासी ‘हो’ भाषा को लिखने के लिए बनाई गई एक लेखन प्रणाली है। लको बोदरा ने इस लिपि के निर्माण के लिए गहन शोध किया और इसके विकास और प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने वाराङ क्षिति लिपि के निर्माण और हो भाषा के प्रसार में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। लको बोदरा ने न केवल वाराङ क्षिति लिपि का आविष्कार किया, बल्कि ‘हो’ भाषा का एक वृहद् शब्दकोश भी तैयार किया। 

उक्त आयोजन के निहितार्थ हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली बताते हैं कि ऑस्ट्रेलिया के मोनास युनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. प्रियदर्शी चौधरी सहित भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अमेरिका आदि 3 देशों के 8 वैज्ञानिकों की रिसर्च को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित जर्नल ‘प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस’ (पनास) ने सत्यापित किया है कि घरती पर समुद्र की सतह से ऊपर भूकम्प की वजह से उभरने वाला सबसे पहला भू-भाग झारखंड का ‘सिंहभूम’ है और हो समुदाय ने कई सभ्यताओं को अपने गीतों में, कहानियों में और मौखिक साहित्य में इसी का प्रमाण देते हुए सदियां गुजार दी।

वाराङ क्षिति लिपि प्रवर्त्तक लको बोदरा द्वारा लिखित पुस्तक ‘षड़ा बुड़ा संगेन’ में भी यही उद्धरण पढ़ने को मिलती है कि पहले यह धरती पूरी तरह से जलमग्न थी। पनास में प्रकाशित रिसर्च ने स्थापित सभ्यताओं को सोचने पर विवश कर दिया है कि दुनियां के स्थापित एवं प्रतिपादित सिद्धांतों का पुनरवलोकन करें।

डोबरो बुड़ीउली आगे कहते हैं कि सभ्यताओं के विकास की इस नवीन प्रतिपादित सिद्धांत की बात करें तो पूरी दुनिया को मानना होगा कि सिंहभूम, हो दिषुम, कोल्हान ही वह स्थान है जहां मानव ने भाषा का प्रयोग किया और हो समुदाय अब भी यहीं हैं, हो समुदाय का स्थान परिवर्तन नहीं हुआ है। आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा दिवस चौदहवां वर्षगांठ आयोजन का मूल बीज यही है।

डोबरो बुड़ीउली के अनुसार स्वतंत्रता की पूजा करने वाले ‘हो’ समुदाय की अपनी भाषायी पहचान बचाये रखने का संघर्ष-क्रम को इस तरह से हम तीन हिस्सों में व्यक्त कर सकते हैं – 

 – सन् 1800 से 1857

■ जमीन को बाहरी अतिक्रमण से बचाने के लिए हो समुदाय का सन् 1820-21 का हो विद्रोह, सिरिंगसिया घाटी युद्ध में जीत, 1831-32 का कोल विद्रोह, फिर बंगाल रेगुलेशन 1833 के द्वारा हो भाषायी क्षेत्र का निर्धारण और 1837 में नन रेगुलेटेड ट्रैक्ट के रुप में एक भाषायी स्वशासी प्रशासनिक क्षेत्र कोल्हान गवर्नमेन्ट ईस्टेट की घोषणा और हो भाषा को प्रशासनिक और न्यायिक भाषा बनाया जाना।

– सन् 1858 से 1847

■ कोल्हान में ब्रिटिश एजेन्ट के अधीनस्थ प्रशासनिक अधिकारी पदाधिकारियों का हो भाषा पर शोध, लेखन, प्रकाशन और प्रबन्धन की शुरुवात, प्रशासनिक कार्यों के विकास के लिए हो भाषा प्रशिक्षण हेतु सरकारी कोष की व्यवस्था एवं विभिन्न शोध संस्थानों, सोसाईटियों की स्थापना। कर्नल डाल्टन, एस आर टिकेल, थोमस विल्किनसन से लेकर डब्ल्यु जी. आर्चर तक हो भाषा पर काम।

– सन् 1948 से 2025

■ भारत के मौलिक अधिकार संविधान के भाग 3 अनुच्छेद 12 से 35 तक वर्णित हैं इन मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 19 से 22 में स्वतंत्रता भी एक अधिकार है भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। लेकिन 1947 के बाद मिले अधिकारों को लागू करने का जो कार्य सत्ताओं को, सरकारों को करना था वो आज भी कार्य संस्कृति में ईच्छा शक्तियों में कहीं नहीं है। हो समुदाय द्वारा अपने झारखण्ड राज्य में स्वअर्जित आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा भी एक स्वतंत्र विभाग के लिए मोहताज है। हो भाषा का मूल क्षेत्र कोल्हान है और इस भाषायी क्षेत्र में हो समुदाय की दावेदारी भी यही है कि भाषायी स्वाभीमान और स्वतंत्रता पर अनुवाद का आग्रह भारी है।

डोबरो बुड़ीउली ने बताया कि 30 अगस्त को हो समुदाय हर साल आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा दिवस के रुप में मनाता है।

आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा कार्य समिति के मुख्य संयोजक हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली एवं रांची से संयोजिका शांति सावैंया ने समारोह कार्यक्रम का संचालन किया। वहीं श्यामलाल पुरती व पूर्व संयुक्त निदेशक, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय (भारत सरकार) ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की और काशराय कुदादा ने बीजभाषण दिया।

(वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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