Saturday, October 1, 2022

देवगौड़ा की जीवनी के जरिये समाज और राजनीति का इतिहास

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पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा को मैंने संसद भवन, राष्ट्रीय राजधानी या देश के किसी अन्य हिस्से में आयोजित समारोहों या कार्यक्रमों में देखा और सुना है। किसी संकोच के बगैर कह सकता हूं कि ज्यादातर उत्तर-भारतीय लोगों की तरह मैंने भी उन्हें एक नीरस किस्म के राजनेता के तौर पर ही देखा। हालांकि एक पत्रकार के तौर पर मुझे प्रधानमंत्री देवगौड़ा के कुछ बेहतरीन कामों और कुछ गलतियों की ठीक-ठाक जानकारी जरूर थी। पर उनके संपूर्ण जीवन–एक राजनीतिज्ञ के तौर पर उनके अभ्युदय-विकास, फिर मुख्यमंत्री और अंततः प्रधानमंत्री बनने के उऩके लंबे राजनीतिक-सफर के हरेक महत्वपूर्ण मोड़ और पहलू की ऐसी जानकारी बिल्कुल नहीं थी, जैसी Furrows in a Field: THE UNEXPLORED LIFE OF H D DEVE GOWDA  शीर्षक वाली इस किताब से मिली।यह किताब हमारी तरह असंख्य लोगों को देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री की शख्सियत, काबिलियत और जहनियत की मुकम्मिल और तथ्यात्मक जानकारी देती है। यह किताब सिर्फ एच डी देवगौड़ा की जीवन-कथा या उनके राजनीतिक व्यक्तित्व और शासकीय कामकाज का मूल्यांकन भर नहीं है, यह भारत की समकालीन राजनीति और सामाजिकता का तथ्यपरक और वस्तुगत इतिहास भी है।   

लेखक-पत्रकार SUGATA  SRINIVASARAJU जिस खूबसूरती के साथ दैवगौड़ा की जीवन-कथा के साथ उस समय, समाज और सियासत का इतिहास लिखते चलते हैं, वह कोई आसान काम नहीं है। जीवन-कथा और इतिहास को पेश करने के क्रम में लेखक महत्वपूर्ण घटनाओं की तह में जाकर उऩकी तथ्यात्मक पड़ताल करते चलता है। इसके लिए वह उस वक्त और उस घटना से सम्बद्ध अलग-अलग ढंग के लोगों से पूछता-जांचता है। किसी अच्छे पत्रकार की तरह वह घटना या कथा के हर पहलू की तथ्य़ात्मकता परखता है और किसी सधे एकेडेमिशियन की तरह उऩकी गहराई में जाकर नतीजे निकालता है। ज्यादातर एकेडेमिक-लेखन में ऐसा विलक्षण संतुलन नहीं दिखता। मेरा पक्का यकीन है कि ऐसी जीवनी कोई आम लेखक या बुद्धिजीवी नहीं लिख सकता था, यह काम बौद्धिक रूप से समृद्ध एक ऐसे पत्रकार से ही संभव था, जो तथ्यों पर कोई समझौता नहीं करता।

देवगौड़ा जैसे नीरस लगने वाली सियासी शख्सियत पर इतनी सरस और सुंदर किताब लिखना अपने आप में एक चुनौती है। उस पर भी किसी जीवित व्यक्ति का जीवनी-लेखन तो और भी चुनौती-भरा काम है। जीवनी अगर उक्त व्यक्ति की जानकारी और भरोसे में लिखी जा रही हो तो चुनौती और बढ़ जाती है। सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह व्यक्ति अपने जीवनी-लेखक को प्रभावित न करने लगे! बीते कुछ वर्षों के दौरान देश के कई प्रमुख राजनेताओं की जीवनियां आई हैं। इनमें ज्यादातर जीवनियों में यह समस्या बुरी तरह व्याप्त है। इसलिए इनमें ज्यादातर ने हमारे जैसे पाठक को निराश किया। जीवनी-लेखक पर उस व्यक्ति की छाया लगातार मंडराती दिखती है, जिसकी जीवनी लिखी गई है। इससे वे पुस्तकें तथ्यपरकता और वस्तुगतता के स्तर पर प्रभावित हुई हैं। लेकिन सुगाता श्रीनिवासराजू न सिर्फ इस लेखकीय-जोखिम से बचते हैं अपितु वह देवगौड़ा के संपर्कों और साक्षात्कारों से किताब को और समृद्ध करते हैं।

वह देवगौड़ा के संक्षिप्त प्रधानमंत्रित्व काल की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियों का विस्तार से उल्लेख करते हैं। लेकिन इस क्रम में वह एकपक्षीय नहीं बनते। इसके लिए वह सिर्फ गौड़ा के कथन पर निर्भर नहीं रहते। तरह-तरह के लोगों से मिलते और संवाद करते हैं। इस जीवनी की यह सबसे बड़ी खूबसूरती है। यह एक कम प्रचारित तथ्य है कि देवगौड़ा ने जम्मू-कश्मीर में हालात को सामान्य बनाने में बड़ी कोशिश की। इसका गवाह तो मैं स्वयं भी हूं। संयोगवश, सन् 1997-98 से ही मैंने एक रिपोर्टर के रूप में जम्मू कश्मीर जाना शुरू किय़ा था। मैने स्वयं देखा—कश्मीर के हालात को संभालने और बदलने की कैसे पहल हो रही है! इसके लिए देवगौड़ा सिर्फ नौकरशाही पर निर्भर नहीं रहे, उन्होंने राजनीतिक पहल के लिए स्वयं मेहनत की। सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद वह जम्मू कश्मीर के दौरे पर गये। छह-सात साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री सरहदी सूबे गया।

अगस्त, 1996 की अपनी दूसरी कश्मीर यात्रा में उन्होंने राजनीतिक पहल के अलावा विकास कार्यक्रमों पर जोर दिया। 290 किमी लंबी ऊधमपुर-बारामूला रेलवे लाइन के निर्माण को राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर उस पर काम शुरू कराया। उसी दौरे में वह करगिल, लेह, राजौरी और जम्मू भी गये। उन्होंने अपने दौरे में साफ शब्दों में कहा कि उनकी सरकार जम्मू कश्मीर को अधिकतम स्वायत्तता देने को तैयार है। यह बहुत बड़ा ऐलान था। समझा जाता है कि घाटी में इस बयान का सकारात्मक असर पड़ा और माहौल सुधरना शुरू हुआ। कुछ ही समय बाद उन्होंने जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने का विचार बनाया। वर्षों बाद सरकार ने जम्मू कश्मीर को देशी-विदेशी मीडिया के लिए पूरी तरह खोल दिया। सन् 1996 के चुनाव में फारूक अब्दुला मुख्यमंत्री बने और अलगाववादी संगठनों के अलावा पाकिस्तान से भी संवाद के दरवाजे खुले। ‘सिस्टम आॉफ यूनिफाइड कमांड’ की शुरुआत भी उसी दौर में की गई।

अचरज होता है कि एक नेता जो इससे पहले कभी केंद्र की राजनीति की किसी महत्वपूर्ण भूमिका में नहीं था, भारत-पाकिस्तान जैसे वैदेशिक और कश्मीर जैसे जटिल घरेलू मामलों पर जिसकी कोई खास विशेषज्ञता नहीं थी, उसने कैसे इतने सारे चमत्कारिक फैसले किये! पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बातचीत के लिए देवगौड़ा ने ‘ट्रैक-टू’ का सहारा लेते हुए अपने ईएनटी-विशेषज्ञ डाक्टर हीरानंदानी की सेवाओं का उपयोग किया। विभाजन से पहले हीरानंदानी के पिता और नवाज के पिता दोनों गहरे दोस्त थे। डाक्टर ने अपने पारिवारिक रिश्तों के जरिये भारत और पाकिस्तान के सम्बन्धों को सामान्य बनाने की देवगौड़ा की पेशकश न केवल स्वीकार की बल्कि इसके लिए नवाज के लंदन-दौरे में उनसे और उऩके शीर्ष अधिकारियों से बातचीत कर दोनों मुल्कों के प्रधानमंत्रियों की भावी शिखर-वार्ता के लिए समय और स्थान आदि तय कराया।

लेकिन कांग्रेस ने इस घटनाक्रम के कुछ ही समय बाद देवगौड़ा सरकार गिरा दी। इस तरह एक महत्वपूर्ण सिलसिला और एक महान् संभावना का अंत हो गया। ऐसी कई महत्वपूर्ण सूचनाएं इस किताब का हिस्सा हैं। यह महज संयोग नहीं कि देवगौड़ा के विश्वास-मत पर जब संसद में बहस हो रही थी, जम्मू कश्मीर के प्रमुख नेता सैफुद्दीन सोज ने इसमें भाग लेते हुए कहा थाः ‘प्रधानमंत्री ने जम्मू कश्मीर के लोगों में भरोसा पैदा किया है। वह चार बार वहां गये। बीत छह सालों में वहां कोई प्रधानमंत्री नहीं गया था।’ पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में भी प्रधानमंत्री देवगौड़ा का दृष्टिकोण वहां के मसलों को समझने और फिर उनके समाधान का था। इस बाबत उन्होंने अपने संक्षिप्त कार्यकाल में कई ठोस पहल की। यही कारण है कि असम से मणिपुर और नगालैंड तक उन्हें काफी पसंद किया जाने लगा।

देवगौड़ा का सियासी-सफर उतना नीरस और उबाऊ भी नहीं है, जितना बाहर से देखने वाले समझते हैं। अपने जीवन की शुरुआत सिविल निर्माण के एक साधारण ठेकेदार के रूप में काम करने वाला शूद्र समाज का एक व्यक्ति अगर सन् 1996 में देश का प्रधानमंत्री बनता है तो यह महज हाथ की रेखाओं का (जिसमें देवगौड़ा को काफी भरोसा रहा है) का खेल नहीं हो सकता! सियासत के समीकरणों के अनुकूलन, व्यक्तिगत जिजीविषा, संघर्ष, तिकड़म और प्रतिभा के बगैर यह सब संभव नहीं। इस जीवनी में कई स्थानों पर ‘विनम्र किसान’ कहे गये देवगौड़ा की राजनीतिक शख्सियत में पिरोई चतुराई भी नजर आती है।

सुगाता श्रीनिवासराजू ने देवगौड़ा के दौर की सियासत और सम्बद्ध सियासी शख्सियतों के हर आम और खास पहलू, मिजाज और मोड़ को बहुत बारीकी से देखा-परखा है। तरह-तरह के लोगों से अपनी मुलाकात और साक्षात्कारों के जरिये वह नये-नये घटनाक्रमों और नयी-नयी कहानियों की जानकारी लेते हैं। फिर वे उन कहानियों का पीछा करते हुए उससे सम्बद्ध रहे अलग-अलग किरदारों और जानकारों से मिलकर उऩका ‘वर्जन’ लेते हैं। किताब से मैं ऐसे दर्जनों दृष्टांत दे सकता हूं। यहां सिर्फ एक उदाहरण देता हूं। लेखक जहां वरिष्ठ पत्रकार-संपादक एच के दुआ के प्रधानमंत्री देवगौड़ा के सूचना सलाहकार बनने का जिक्र करता है, वहां वह पूर्व प्रधानमंत्री का सिर्फ इतना ही वर्जन देता है कि उनके सूचना सलाहकार ने उन्हें निराश किया।

बकौल देवगौड़ा उन्होंने दुआ की नियुक्ति का फैसला एच वाई शारदा प्रसाद के कहने पर की थी। शारदा प्रसाद लंबे समय तक इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार रह चुके थे और वह देवगौड़ा के ही इलाके के रहने वाले थे। इसके बाद लेखक ये बताना नहीं भूलता कि दिल्ली दरबार और ‘लुटियन जोन’ से हमेशा दूर रहे एक दक्षिण भारतीय नेता के प्रधानमंत्री बनने पर दुआ जैसे दिल्ली-वासी पत्रकार कैसे उनके नजदीक आये और फिर सूचना सलाहकार के रूप में पीएमओ का हिस्सा बने। बाद में दुआ को प्रधानमंत्री वाजपेयी के कार्यकाल में राजदूत पद मिला और उन्हें डेनमार्क जैसे महत्वपूर्ण यूरोपीय देश में भेजा गया। वह पद्मा-अवार्ड से भी नवाजे गये। इस प्रकरण पर लिखने के लिए जीवनीकार ने उस दौर के कई प्रमुख लोगों से संपर्क किया और उनसे विस्तार से बातचीत की।

इस किताब के ज्यादातर अध्याय इतिहास-लेखन की खूबसूरत शैली पेश करते हैं कि कैसे तथ्यों और घटनाओं के विस्तृत विवरणों में भी इतिहास को नीरस होने से बचाया जा सकता है। The Epic Battle with Ramkrishna Hegde  हो या Devaraj Urs, Emergency and  a Stormy Decade या City of Intrigues and the September Shifts या Becoming Prime Minister and the Left Connection; ऐसे कई अध्याय इस शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इस जीवनी की एक विशेषता ये भी है कि देवगौड़ा की जीवन-कथा कहते हुए यह कर्नाटक के राष्ट्रीय ख्याति व फलक के बड़े नेताओं-देवराज अर्स और रामकृष्ण हेगड़े आदि के जीवन, उऩकी राजनीति और उऩके अवदान पर ढेर सारी महत्वपूर्ण जानकारियां देती है। देवराज अर्स के मुख्यमंत्रित्व काल में देवगौड़ा कुछ वर्ष विपक्ष के नेता रहे। वह अक्सर उनकी आलोचना करते रहते थे। पर अर्स उनके आलोचनात्मक रवैये से बिल्कुल नाराज नहीं होते।

अर्स शासन की कुछ बड़ी उपलब्धियों-यथा, कर्नाटक के प्रसिद्ध भूमि सुधार कानून के लाने और लागू किये जाने की कथा के साथ उन जैसे कद्दावर नेता के व्यक्तित्व के कुछ अनजाने और आकर्षक पहलुओं को भी इस अध्याय में जगह मिली है। एक बड़ा ही दिलचस्प प्रसंग सन् 1978 का है, जब चिकमगलूर चुनाव में इंदिरा गांधी को जिताकर अर्स ने उन्हें नया राजनीतिक जीवन दिया था। इस संसदीय सीट पर चुनाव की संभावना तैयार कराने वाले भी अर्स ही थे। देवगौड़ा के हवाले से लेखक ने एक बड़े तथ्य का रहस्योद्घाटन किया है कि कैसे मोरार जी भाई के कहने पर रामनाथ गोयनका और देवगौड़ा ने चिकमगलूर चुनाव में इंदिरा जी को हराने के लिए अर्स को ‘पटाने’ की भरपूर कोशिश की थी। उन दिनों इंदिरा जी और अर्स के रिश्ते पटरी से उतर चुके थे। श्रीमती गांधी अर्स के खिलाफ उनके एक मंत्रिमंडलीय सहयोगी-गुंडू राव को आगे करने की कोशिश में जुटी थीं। पर मुख्यमंत्री अर्स ने साफ शब्दों में गोयनका और गौड़ा से कहा कि मुझे मालूम है, इंदिरा जी मुझे मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहती हैं। वह गुंडू राव और एफ एम खान के साथ मिलकर काम कर रही हैं। पर वह अपनी नेता की पीठ में छुरा नहीं घोपेंगे।(Page-62). ऐसे थे-अर्स!  

हर तरह से सुघड़, शोधपरक और व्यवस्थित ढंग से लिखी इस उल्लेखनीय किताब में एक कमी जरूर दिखती है। वह है-देवगौड़ा-लालू प्रसाद अंतर्विरोधों पर लालू-पक्ष का समग्रता से न आ पाना। ये बात अपनी जगह है कि जीवनी देवगौड़ा की है, इसलिए उनके ऊपर आरोपों की बौछार के लिए इसमें जगह बनाना मुश्किल होता पर संक्षिप्त ही सही, लालू का पक्ष किसी न किसी जरिये आना चाहिए था। पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने जीवनीकार को दिये इंटरव्यू में बताया कि उन्हें लगता है कि एस आर बोम्मई, हेगड़े और एक सालिसिटर जनरल ने लालू प्रसाद यादव के दिमाग में यह बात डाली कि चारा घोटाले में उन्हें फंसाने के पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री का भी हाथ था। देवगौड़ा ने आधी रात की उस बहुचर्चित गौड़ा-लालू हंगामी बैठक का भी हवाला दिया है, जिसके बारे में गपशप थी कि उक्त बैठक में लालू ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को बहुत भला-बुरा कहा था। देवगौड़ा ने साफ किया है कि वह सचमुच लालू जी की मदद करना चाहते थे। पर उनके हाथ बंधे हुए थे।

सुप्रीम कोर्ट मामले की निगरानी कर रहा था। लेकिन लालू को अंत तक इसका भरोसा नहीं हुआ। हालांकि अपनी जीवनी(गोपालगंज से रायसीना, 2019, रूपा) में लालू ने इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा है। उन्होंने अपने को फंसाये जाने के पीछे बुनियादी तौर पर भाजपा-जद(यू) नेताओं का हाथ माना है। पर गौड़ा के कथन के संदर्भ में लालू का पक्ष आने से किताब का यह अध्याय ज्यादा दिलचस्प और मुकम्मल हो जाता। एक अन्य पहलू भी लगभग अव्याख्यायित रह गया कि नेहरू-गांधी परिवार और सीताराम केसरी की संभावित नाराजगी को नजरंदाज कर देवगौड़ा ने प्रधानमंत्री के तौर पर पी वी नरसिंहराव से इतनी निकटता क्यों बनाई? क्या उन्हें मालूम नहीं था कि स्वयं सोनिया गांधी और उनके इर्दगिर्द रहने वाले कुछ बड़े कांग्रेसी नेता भी श्री राव से काफी चिढ़े रहते हैं! वैचारिक तौर पर भी श्री राव किसी जनता-दली प्रधानमंत्री के लिए प्रेरक-शक्ति नहीं हो सकते थे, खासकर नव-उदारवादी अर्थनीति की अपनी मुखर पैरोकारी और बाबरी मस्जिद विध्वंस प्रकरण में उनकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार के स्तर से हुई रहस्यमय चूकों के चलते।  

उन दिनों ऐसा लगता था, मानो देवगौड़ा अपनी सरकार के खिलाफ चल रही व्यूह-रचना को भेदने की बजाय उससे बिल्कुल बेपरवाह हैं। कई बार तो अचरज होता था कि सरकार के गिरने-गिराने के प्रयासों में उनके अपने कुछ कदम भी कहीं कारक तो नहीं बन रहे हैं! इस किताब में ऐसी कुछ नियुक्तियों की भी चर्चा है, जिनसे अंततः गौड़ा को नुकसान हुआ। इसमें एक तो सीबीआई प्रमुख के तौर पर जोगिन्दर सिंह की नियुक्ति थी। जोगिन्दर की नियुक्ति कर देवगौड़ा को अंततः अफसोस हुआ। उस दौर में समझा गया कि उनकी नियुक्ति हरकिशन सिंह सुरजीत के कहने पर हुई थी। पर सच ये है कि कर्नाटक कॉडर के उक्त अफसर की नियुक्ति राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री पीजीआर सिंधिया के कहने पर हुई थी। इसके अलावा भी कई प्रमुख पदों पर ऐसे लोगों की नियुक्ति हुई थी, जो अंदर से घोर संकीर्णतावादी और धूर्त थे। इसमें कुछ ऐसे भी थे, जिनकी भाजपा से निकटता थी। निश्चय ही वे देवगौड़ा के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान ‘अंदर’ की बहुत सारी बातें ‘बाहर’ ले जाते रहे होंगे। जितना मैंने देखा, उस दौर में गौड़ा के इर्द-गिर्द ऐसे भरोसेमंद अफसरों-नेताओं का सख्त अभाव था, जो हिन्दी-भाषी उत्तर-भारत के राजनीतिक समीकरणों और प्रमुख लोगों को अच्छी तरह जानते-समझते हों! किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए यह आज भी एक जरूरी पहलू है।

देवगौड़ा ने जिस वक्त प्रधानमंत्री के रूप में अपना आखिरी भाषण दिया, संयोगवश मैं संसद भवन की प्रेस-दीर्घा में नोटबुक लिये बैठा था और कान में लगे हेडफोन के जरिये जल्दी-जल्दी उनके भाषण के प्रमुख अंशों को नोट करता जाता था। मुझे आज भी उनकी वह लाइन नहीं भूलतीः ‘आई विल राइज लाइक द फीनिक्स फ्राम द एशेज!’ लेकिन देवगौड़ा ‘फीनिक्स’ की तरह फिर नहीं उभरे। सन् 1999 में वह स्वयं अपना चुनाव हार गये। उऩकी पार्टी का वजूद कर्नाटक तक ही सीमित रहा। उसका विस्तार भी नहीं हो सका। उनके पुत्र कुमारस्वामी ने भाजपा से सत्ता का सहकार किया और अपने पिता की ‘सेक्युलर-प्रतिबद्धता’ के दावों को क्षत-विक्षत किया। देवगौड़ा एक लाचार पिता की तरह देखते रह गये!  प्रधानमंत्री पद से उनके हटे तकरीबन 25 साल हो गये।

इतने लंबे दौर में भारत की राजनीति में उऩका कोई खास अवदान या असर नहीं दिखा। वह महज एक पूर्व प्रधानमंत्री बनकर ही रहे! पिछले दिनों उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के साथ संवाद करते और दोनों को एक-दूसरे की तारीफ करते भी देखा गया। बहरहाल, Sugata Srinivasaraju लिखित उनकी जीवनी उनके जीवन की एक मूल्यवान उपलब्धि है। निस्संदेह, देवगौड़ा ने विपक्ष के नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में कुछ बड़े काम-बड़े मुकाम हासिल किये। मीडिया या समकालीन इतिहास में उनके साथ न्याय नहीं हो सका था। पर इस किताब ने निश्चय ही उनके साथ न्याय किया है। इसलिए यह जीवनी भी देवगौड़ा के जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसके जरिये सिर्फ आज के पाठक ही नहीं, आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें और इनके समय को सही परिप्रेक्ष्य में देख और समझ सकेंगी।

नोट-यह समीक्षात्मक आलेख मूलतः अंग्रेजी पत्रिका इकोनामिक एंड पोलिटिकिल वीकली(ईपीडब्ल्यू) के लिए लिखा गया, जो अंग्रेजी में अनूदित होकर उसके 16 अप्रैल, 2022 के अंक में छपा था। मूल रूप से हिन्दी में लिखे उक्त आलेख को यहां कुछ संक्षिप्त और संशोधित रूप में पेश किया जा रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की समीक्षा।)

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