Saturday, October 1, 2022

हम लड़ेंगे, क्योंकि हम इस देश के असली मालिक हैं…

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भारतीय संविधान में उल्लेखित 5वीं अनुसूची के तहत अनुच्छेद 244 (1) और (2) में आदिवासियों को पूर्ण स्वशासन व नियंत्रण की शक्ति दी गयी है। झारखण्ड के 13 अनुसूचित जिलों में राज्यपाल को शासन करना है। लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी किसी राज्यपाल ने इन क्षेत्रों के लिए अलग से कोई कानून नहीं बनाया। परिणामतः गैर अनुसूचित (अर्थात सामान्य) जिले के नियम कानून ही आज तक आदिवासियों के ऊपर लादे जाते रहे हैं। इस व्यवस्था के अंतर्गत एक आदिवासी सलाहकार परिषद का गठन तो किया जाता रहा है, लेकिन इस परिषद् को ही अपने कर्तव्यों की जानकारी नहीं है। अगर उसे अपने जिम्मेवारी का तनिक भी एहसास होता तो आज झारखण्ड में जितनी भी आदिवासी विरोधी नीतियाँ यथा उद्योग नीति, खनन नीति, विस्थापन नीति, भूमि अधिग्रहण नीति, स्थानीय नीति वगैरह विनाशकारी नीतियाँ नहीं बनती। अनुच्छेद 19 (5) और (6) में जनजातियों के स्वशासन व नियंत्रण क्षेत्र (अनुसूचित क्षेत्र) में गैर लोगों के मौलिक अधिकार लागू नहीं होते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी गैर लोग अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत निर्बाध गति से निवास, व्यवसाय, जमीन की खरीद आदि नहीं कर सकते। यहाँ तक कि गैर लोगों को इन इलाकों में प्रवेश के लिए वहाँ के परम्परागत प्रधानों से अनुमति लेनी पड़ेगी। लेकिन ऐसा कोई काम पिछले 60-70 सालों से चलन में नहीं रहने की वजह से यहाँ गैर लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। अनुच्छेद 244 (1) कंडिका (5) (क) में विधान सभा या लोक सभा द्वारा बनाया गया कोई भी सामान्य कानून अनुसूचित क्षेत्रों में हू-ब-हू लागू नहीं हो सकते। जैसे आईपीसी एक्ट, सीआरपीसी एक्ट, लोक प्रतिनिधित्व कानून 1991, भूमि अधिग्रण कानून, आबकारी अधिनियम, भू-राजस्व अधिनियम, पंचायत अधिनियम 1993, नगर पंचायत अधिनियम, नगरपालिका अधिनियम, मोटरयान अधिनियम, परिवहन अधिनियम, भारतीय चिकित्सा अधिनियम 1956 आदि।

अनुच्छेद 141 में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों को किसी भी विधान मण्डल या व्यवहार न्यायालय को अनुशरण करने की बात कही गयी है। ‘लोकसभा न विधानसभा सबसे ऊँची ग्रामसभा’, वेदांता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला 18.04.2013 को सुनाया था।

कहना ना होगा कि झारखण्ड राज्य कई तरह के खनिज संपदाओं से भरा पड़ा है, जिसका उत्खनन सदियों से गैर आदिवासियों/कंपनियों/सरकारों द्वारा किया जा रहा है। जबकि इन खनिजों का दोहन करने का अधिकार आदिवासियों को प्राप्त है। न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खण्डपीठ द्वारा 08-07-2013 के फैसले में कहा गया है, जिसकी जमीन उसका खनिज। लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले का उल्लंघन करते हुए यहाँ की सरकारों द्वारा दर्जनों एम.ओ.यू. सालों से किया जाता रहा है। ऐसे ही आदिवासियों की लाखों एकड़ जमीन अधिगृहीत कर ली गयी है और लाखों लोगों को अपने पैतृक भूमि से बेदखल होना पड़ा है। उच्चतम न्यायालय के समता जजमेंट (फैसला) 1997 के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में केन्द्र और राज्य सरकार का एक इंच भी जमीन नहीं है। यह बात धीरे-धीरे आदिवासियों के मन में घर कर रही है। उनके इस विचार को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू के द्वारा 05-01-2011 को एक रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायलय को सौंपी गयी है। जिसमें यह कहा गया है कि भारत देश के 8 फीसदी आदिवासी ही इस देश के असली मालिक हैं।उपरोक्त संवैधानिक प्रावधान पूर्णतः आदिवासियों के हक में हैं और ये ही उनके संघर्ष के असली हथियार भी।

असिस्टेंट प्रोफेसर रजनी मुर्मू कहती हैं कि विश्व आदिवासी दिवस भारत में हर साल की तरह इस साल भी आदिवासियों द्वारा मनाया जायेगा। पर इस साल के आदिवासी दिवस में नया ये हुआ है कि बीजेपी की तरफ से पहली बार एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति चुना गया है और ये भी पहली बार होगा कि बीजेपी ही आदिवासी दिवस का विरोध करेगी। जैसे कि उसके एजेण्डा में ही ये है कि वो आदिवासियों को आदिवासी न मानकर वनवासी मनाने पर तुली हुई है। एक आदिवासी को आदिवासी राष्ट्रपति बनाने की कीमत पर वो आदिवासियों के पूरे अस्तित्व को ही ध्वस्त करने पर तुली है।

जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज आदिवासियों से अपील करते हुए कहते हैं — ”इस विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर एक-एक आदिवासी को यह संकल्प लेने का वक्त आ गया है कि वह अपनी सांस्कृतिक धरोहर, जल, जंगल, जमीन और धरती माँ की रक्षा के लिए जो इतिहास काल से उनके पूर्वज संघर्ष करते रहे हैं। हम इस संघर्ष की परम्परा को अगली पीढ़ी के लिए मिशाल पेश करके रहेंगे। चाहे सरकार हमें देश द्रोही घोषित करे या विकास विरोधी या फिर नक्सली! हमने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए कदम बढ़ाया है। हम आदिवासियों ने अपने संघर्ष की बदौलत नेतरहाट फिल्ड फायरिंग रेंज में पिछले ढाई दशकों से भारतीय सेना को रोक के रखा है। कोयलकारो, औरंगा बांध, भूषण स्टील, मित्तल मेगा स्टील प्लांट जैसी कंपनियों को झारखण्ड में पांव रखने से भगाया, अब भी हमारा संघर्ष जारी हैं और हम आने वाली पीढ़ी को भी संघर्ष के लिए तैयार करेंगे। हम गीत गाकर संघर्ष करेंगे। अपनी भाषा बोलकर संघर्ष करेंगे। जंगलों, पहाड़ों और नदियों को बचाकर संघर्ष को जारी रखेंगे। हर जुल्म के खिलाफ हम बोलेंगे। हम विध्वंसकारी विकास नीति के खिलाफ मुट्ठी भरेंगे। अम्बानी और अडानी के विरुद्ध खड़े होंगे। क्योंकि हम इस देश के असली मालिक हैं।

जनजातीय परामर्शदाता परिषद के पूर्व सदस्य रतन तिर्की कहते हैं कि 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर फिर आदिवासी समुदाय अपनी पहचान, भाषा-हासा, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक उपस्थिति का एहसास पूरी दुनिया को बताने सड़कों में पारंपरिक खानपान, वेशभूषा के के साथ गीत गाएंगे, झूमेंगे, नाचेंगे। वे आगे कहते हैं मेरा इशारा सिर्फ यह है कि विश्व के आदिवासियों के बीच आज सबसे बड़ा खतरा उनका विनाश है। बताना जरूरी होगा कि आदिवासियों के लिये सैकड़ों कानून खुद सरकारों ने बनाया, पर आज देश की आजादी 75वें साल में है और आदिवासी आज भी अपनी पहचान, इतिहास, सभ्यता, संकृति, भाषा-हासा को बचाने के लिये संघर्ष करता आ रहा है। बड़ी बात तो यह भी है कि देश और झाड़खंड के आदिवासियों के पास जो राजनीतिक संसाधन (political Resources) जो उनके जनप्रतिनिधि सांसद-विधायक है। ये सांसद-विधायक आज भी आदिवासी समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारी को नहीं समझ पाए हैं या जिम्मेदारी को समझ कर भी नासमझ बना बैठे हैं। इसलिये एक संकल्पित समाज के सामने लेने का समय आ चुका है और वह है कि एक बार फिर सामाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक उलगुलान की!

आदिवासी मामलों के जानकार ग्लैडसन डुगडुग कहते हैं – आदिवासी हिन्दू नहीं हैं। जैसा क्रांतिकारी वक्तव्य देने एवं प्रतिवर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने वाले झारखंड के मुख्यमंत्री आगामी 9-10 अगस्त को जनजातीय महोत्सव मनायेंगे। यह एक सरकारी आयोजन है। वर्ष 2014 में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन एवं शिक्षामंत्री गीताश्री उरांव ने जमकर विश्व आदिवासी दिवस मनाया था। झारखंड सरकार के द्वारा कई कार्यक्रम आयोजित एवं प्रायोजित थे। लेकिन इस वर्ष विश्व आदिवासी दिवस अब जनजातीय महोत्वस में तब्दील हो गया है। क्या ऐसा बदलाव ईडी, सीबीआई, केन्द सरकार या संघ परिवार के डर से हुआ है? आदिवासियो को जनजातीय बनाना संघी षड्यंत्र है, इसे हेमंत सोरेन को समझना चाहिए।

 बता दें कि जब विश्व आदिवासी दिवस पर बात होती है तो सबसे पहले हमें यह जान लेना होता है कि विश्व आदिवासी दिवस का निहितार्थ क्या है?

तो ऐसे में यह बताना जरूरी हो जाता है कि पूरी दुनिया के तमाम आदिवासी समाज के लोगों का 9 अगस्त का दिन अपनी भाषा, संस्कृति व स्वशासन, परम्परा के संरक्षण और विकास के साथ-साथ जल, जंगल, जमीन व खनिज सम्पदा के पारम्परिक अधिकार के लिए संकल्पबद्ध होने का दिवस है।

बता दें कि “हम आपके साथ हैं” की घोषणा के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 अगस्त 1994 को जेनेवा में दुनिया के सभी देशों से आये प्रतिनिधियों के बीच प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस महासम्मलेन किया था। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव एंटोनियो ग्युटेरेस ने साथ ही यह भी घोषणा की कि “इस ऐतिहासिक अवसर पर हम आदिवासी समाज की आत्मनिर्भरता, स्वशासन, पारम्परिक भूमि क्षेत्रों और प्राकृतिक संसाधनों समेत उनके सभी अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा को पूरी तरह समझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” इसी महासभा में व्यापक चर्चा के बाद दुनिया के सभी देशों को 9 अगस्त को आदिवासी दिवस मनाने का निर्देश दिया गया था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस किया कि 21 वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में रहनेवाले आदिवासी समाज, भारी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा और न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के साथ-साथ बेरोज़गारी तथा बंधुआ मज़दूरी जैसे समस्याओं से ग्रसित है। इन्हीं संदर्भों में उक्त सवालों के साथ–साथ आदिवासियों के मानवाधिकारों को लागू करने के लिए 1982 में विश्व स्तर पर यूएनडब्ल्यूजीईपी नामक विशेष कार्यदल का गठन किया गया। 3 जून 1992 को ब्राजील में आयोजित ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ के अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में विश्व के आदिवासियों की स्थिति की समीक्षा–चर्चा कर इसके लिए विशेष प्रस्ताव पारित किया। 1993 में यूएनडब्ल्यूजीईपी के 11वें अधिवेशन में प्रस्तुत आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र के प्रारूप को मान्यता मिलने पर 9 अगस्त 1994 को यूएनओ के जेनेवा महासभा में सर्वसम्मति से इसे पूरी दुनिया के देशों में लागू करने का फैसला निर्देशित किया गया। इसके बाद से ही प्रत्येक 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस ( इंटरनेशनल डे ऑफ द वर्ल्ड इंडिजिनस पीपुल) मनाया जाने लगा।

पूरी दुनिया के इतिहास इस बात का गवाह है कि आदिवासी जनों का औपनिवेशिकरण कर उन्हें गुलाम बनाया गया। अपनी संस्कृति छोड़कर पराई संस्कृति को अपनाने के लिए मानसिक स्तर से मजबूर किया गया। उन्हें कई तरह के उत्पीड़नों का शिकार बनाया गया, जिसका आदिवासियों द्वार अलग-अलग तरीकों से प्रतिरोध भी किया गया।अपनी जमीनों और भू-भागों में ही रहने की आदिवासियों की सामाजिक व्यवस्थाओं, संस्कृति और पहचान के आधार की  मांगों को दुनिया के अधिकतर राष्ट्र-राज्य मानने से इनकार करते रहे हैं।

 24 अक्टूबर 1945 को गठित संयुक्त राष्ट्र संघ, जिसमें वर्तमान में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, भारत सहित दुनिया के कुल 192 देश सदस्य हैं, ने गठन के 50 साल बाद यह महसूस किया है कि 21 वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में रहने वाले जनजाति (आदिवासी) समाज अपनी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, मूलभूत स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, बेरोजगारी एवं बंधुआ मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित हैं। जनजातीय समाज के उक्त समस्याओं के निराकरण हेतु विश्व का ध्यानाकर्षण के लिए प्रस्ताव संख्या 49/214, दिनाँक 23 दिसंबर 1994 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा प्रति वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया गया। इसके बाद सम्पूर्ण विश्व में यथा अमेरिकी महाद्वीप, अफरीकी महाद्वीप तथा एशिया महाद्वीप के आदिवासी बाहुल्य देशों में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस बड़े जोर-शोर और हर्षोल्लास से मनाया जाता है, जिसमें भारत भी प्रमुखता से शामिल है।

भारत की जनगणना रिपोर्ट 2011 के अनुसार देश के 26 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में आदिवासियों की जनसँख्या 10 करोड़ से अधिक है। जो कि सम्पूर्ण जनसँख्या का 8 प्रतिशत है। आदिवासी समुदाय में साक्षरता दर सिर्फ 59 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय साक्षरता दर 73 प्रतिशत है।

यदि हम झारखण्ड राज्य पर गौर करें तो अविभाजित बिहार में 1931 ई० में आदिवासी जनसँख्या 38.06% था। झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद 2001 में यह घट कर 26.30% थी और 2011 में हुए जनगणना के अनुसार यह संख्या और भी कम होकर 26.02% रह गयी है। जबकि इसी समय और काल के दौरान भारत में आदिवासी समुदाय की जनसँख्या 1961 में 6.90% से बढ़कर 2011 में 8.60% हुई है।

झारखण्ड राज्य के लिए यह एक बड़ा सवाल है, आखिर यह नकारात्मक प्रभाव क्यों पड़ रहा है? जवाब बिल्कुल स्पष्ट है, स्थानीय आदिवासियों को विकास के नाम पर विस्थापन और पलायन का शिकार होना पड़ रहा है। इतिहास को पुनः दुहराते हुए खनिज भण्डार से संपन्न झारखण्ड प्रदेश बाहरी दिकूओं (मतलब परस्त, सत्ता के दलाल, परेशान करने वाला गैरआदिवासी) को हमारी सरकारों ने बसाने के लिए पांचवी अनुसूची में निहित प्रावधानों का जमकर दुरूपयोग किया है। सी० एन० टी० कानून, एस० पी० टी० कानून, विल्किंसन रुल, पेसा कानून तथा भूमि अधिग्रहण जैसे महत्वपूर्ण कानूनों में असंवैधानिक तरीके से संशोधन कर कार्पोरेट व पूंजीपति घरानों को सरकारें बाहें फैला कर स्वागत करती रहीं हैं।

यही वजह थी कि पिछली रघुवर सरकार ने कंपनियों को राज्य में सर्व सुविधा उपलब्ध हो इसके लिए वर्ष 2015 में सिंगल विंडो सिस्टम की शुरुआत की थी। जिससे कंपनी प्रतिनिधियों को अलग-अलग सरकारी कार्यालयों का चक्कर न लगाना पडे़। 16 एवं 17 फरवरी 2017 को तत्कालीन रघुवर सरकार ने मोमेंटम झारखण्ड का आयोजन किया। जिसमें देश और दुनिया के बहु-राष्ट्रीय कंपनियों को झारखण्ड में आकर निवेश करने का प्रस्ताव दिया गया था। 200 से अधिक कंपनियों ने निवेश के लिए सरकार के साथ समझौते किये थे। सरकारी दावा यह था कि इस आयोजन से राज्य में करीब 3 लाख करोड़ रूपये से अधिक का निवेश होगा।

 कानूनी प्रावधान के  आदिवासियों के निम्न अधिकार आज भी है-

1. आदिवासी क्षेत्रों (अनुसूचित क्षेत्रों) पर केन्द्र सरकार या राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं

– सुप्रीम कोर्ट (समता जजमेंट 11.07.1997)

2. लोकसभा न विधानसभा सबसे ऊँची ग्रामसभा – सुप्रीम कोर्ट (वेदांता 18.04.2013)

3. आदिवासी क्षेत्रों पर केन्द्र सरकार या राज्य सरकार एक व्यक्ति के समान है – सुप्रीम कोर्ट (पी. रमा. रेड्डी बनाम 14.07.1988)

4. अनुसूचित क्षेत्रों या जिलों पर जिला प्रशासन की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार राज्यपाल द्वारा नहीं हुआ है, इसलिए अवैध/असंवैधानिक है।

6. आदिवासी ही इस देश के असली मालिक है, बाकी सब आक्रमणकारी की संतानें हैं- कैलाश बनाम महाराष्ट्र (05.01.2011) सुप्रीम कोर्ट।

7. जिसकी जमीन उसका खनिज – सुप्रीम कोर्ट (केरल बनाम 08.07.2013)

8. भारत के संविधान में उल्लेखित 13 (3) (क) के अनुसार रूढ़ी प्रथा (अरी-चली) को विधि का बल प्राप्त है, जो अलिखित संविधान है।

9. भारत का संविधान अनुच्छेद 244 (1) भाग (ख) पैरा (5) 1 के अनुसार केन्द्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कानून आदिवासी क्षेत्रों (5वीं अनुसूचित क्षेत्रों) पर लागू नहीं होगी।

10. 5वीं अनुसूची के किसी भी भाग, खण्ड या उपखण्ड में लोक प्रतिनिधित्व (चुनाव) का जिक्र नहीं है, इसलिए यह असंवैधानिक है – भारत का संविधान

11. 5वीं अनुसूची, भारत शासन अधिनियम खण्ड 91, 92 में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण (रूढ़ी प्रथा) के बारे में उल्लेख है – भारत का संविधान

12. लोक प्रतिनिधित्व कानून (चुनाव) सन् 1951 को अनुसूचित क्षेत्रों में बिना लोक अधिसूचना के जारी किया गया है, इसलिए यह पूरी तरह असंवैधानिक एवं अवैध है।

13. अनुसूचित क्षेत्रों में जब केन्द्र सरकार या राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं है (समता जजमेंट 1997 के अनुसार) तो गैर आदिवासी का कैसे हुआ?

14. आदिवासी हिन्दू नहीं है वे हिन्दू कानून व्यवस्था से संचालित नहीं होते हैं (उच्चतम न्यायालय का फैसला ए. पी. सेन बनाम 1971)

15. नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत जो भी व्यक्ति संविधान को नहीं मानता हो या उल्लंघन करता हो तो उनकी नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।

16. अनुच्छेद 19, (5), (6) के अनुसार आदिवासियों के स्वशासन एवं नियंत्रण क्षेत्रों में गैर आदिवासी लोगों के मौलिक अधिकार लागू नहीं है।

17. अनुच्छेद 244 (1), (2) के अनुसार रूढ़ि या प्रथा द्वारा स्वशासन व नियंत्रण की शक्ति है।

18. रूढ़ी व प्रथा ही आदिवासियों का संविधान है।

19. केन्द्र सरकार ‘मोदी’, राज्य सरकार ‘रघुवर दास’ तो भारत सरकार आदिवासी (भारत शासन अधिनियम 1935 1935 “सेक्शन-2”)

20. आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी को हस्तांतरित हो ही नहीं सकती – सुप्रीम कोर्ट (प्रताप सिंह बनाम प्रजापति, 21)

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट)

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