Friday, December 2, 2022

शब्दों की रौशनी से मिली आज़ादी कहां गई?

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लाल किले के प्राचीर से हर साल देश के प्रधानमंत्री 15 अगस्त को इस बात का बखान करते हैं कि अब हम आज़ाद देश हैं और विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं लेकिन हर साल इस देश का अंतिम जन यह सोचता है क्या उसे कोई आज़ादी मिली क्या! उसके सपने पूरे हुए! लेकिन 15 अगस्त के जश्न में उसका सवाल हर बार कहीं खो जाता है। लेकिन हिंदी उर्दू के लेखकों को इस बात का अहसास हो गया था कि जो आज़ादी हमें मिलने जा रही है, वह न केवल अधूरी है बल्कि बहुत दर्दनाक है। यह लाशों की ढेर और इंसानों की चीख पुकारों की दहलीज़ पर मिल रही है। फ़ैज़ ने तभी सुबहे आज़ादी नामक नज़्म लिखी थी –

“ये दाग दाग उजाला ये सबगज़ीदा सहरा

वो इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं है

ये वह सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर

चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं”

फ़ैज़ की यह नज़्म केवल पाकिस्तान पर लागू नहीं होती थी बल्कि यह हिंदुस्तान पर भी लागू होती थी। हिंदी और उर्दू के तरक्की पसन्द लेखकों को यह अहसास हो गया था और वे इसलिए केवल राजनीतिक आज़ादी की बात नहीं कर रहे थे। चाहे प्रेमचन्द हों या मंटों या निराला या दिनकर या राहुल सांकृत्यायन या बेनीपुरी। वे अपनी रचनाओं में आम आदमी की हर तरह के शोषण से मुक्ति का सवाल उठा रहे थे। “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे” फ़ैज़ ने अपनी नज़्म में आज़ादी को लेकर जो आशंका व्यक्त की थी वह जल्द ही सही साबित हो गयी। चार साल के भीतर ही फ़ैज़ को रावलपिंडी साज़िश केस में फंसाकर जेल में डाल दिया गया।

भारत में भी मज़रूह सुल्तानपुरी को नेहरू की नीतियों की आलोचना के कारण जेल में डाल दिया गया और अब रावल पिंडी साज़िश केस की तरह भीमा कोरेगांव केस में कई लोगों को फंसा कर जेल में सड़ाया जा रहा है। फादर स्टेन्स की मृत्यु का हश्र हम लोग देख ही चुकें हैं। इन 75 सालों में सैकड़ों दंगों पुलिस फायरिंग फ़र्ज़ी मुठभेड जेल में निर्दोष लोगों पर बर्बर अत्याचार और मौत की घटनाओं ताकत के प्रदर्शन से यह सिद्ध होता जा रहा कि भारत की आज़ादी खतरे में है। आज़ादी के बाद ही आचार्य नरेन्द्र देव, जेपी, लोहिया और अम्बेडकर बार-बार समानता न्याय और लोकतंत्र की रक्षा की बात करते रहे लेकिन यह आज़ादी छीनती रही बल्कि अब तो हमारी चुनी हुई सरकार हमारी जासूसी करने में लगी है और जब भंडाफोड़ हुआ तो उसकी जांच भी नहीं कर रही, लेकिन 15 अगस्त को मोदी जी एक बार इस झूठी आज़ादी पर प्रवचन देंगे।

अब आज़ादी नहीं बल्कि आज़ादी का पाखण्ड अधिक है और हम अपने ही देश में गुलाम हो गए हैं। राजनीतिज्ञों और पूंजीपतियों के गठबन्धन तथा मीडिया और नौकरशाही के सहयोग से आम लोगों की गुलामी जारी है। प्रेमचन्द के गोदान का “होरी” रोज आत्महत्या कर रहा और “गोबर” एक साल से कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहा, लेकिन सरकार उसकी आवाज़ सुन नहीं रही। इससे तो अच्छी अंग्रेज सरकार थी कि चंपारण आंदोलन में गांधी जी की आवाज़ सुन ली गई और बिना गोली बन्दूक चलाए, बिना किसी हिंसक धरना प्रदर्शन के किसानों की मांग मान ली गई। गांधी जी ने केवल 8 हज़ार किसानों के दुःख दर्द का बयान भर लिया था। इस पर अंग्रेज सरकार हिल गयी पर अपने देश में गरीब आदिवासियों और दलितों पर नक्सल विरोधी कार्रवाई के नाम पर कितने जालियां वाला कांड हुए, इसका हिसाब कौन देगा।

हिंदी उर्दू के लेखकों ने अपने शब्दों की रौशनी से जो आज़ादी दिलाई थी वह कहां है।

अब पूरा देश आज़ादी की हीरक जयंती का उत्सव मना रहा है। यह आजादी हमें लंबे संघर्ष और कुर्बानियों से मिली थी। बंगाल के नवजागरण और 1857 के देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने देश में राष्ट्रीय चेतना की एक नई लहर फूंकी थी। इस लहर को आगे बढ़ाने में स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के अलावा हिंदी के लेखकों का भी योगदान था जिसे हम कभी नहीं भूल सकते हैं। सच पूछा जाए तो हिंदी का विकास ही राष्ट्रीय चेतना के विकास के रूप में हुआ है।

हिंदी भाषा राष्ट्रीय चेतना की एक अभिव्यक्ति थी। 1823 में जन्मे सितारे हिन्द, 1844 में जन्मे बालकृष्ण भट्ट, 1850 में पैदा हुए भारतेन्दु, 1857 में पैदा हुए अयोध्या प्रसाद खत्री ने नवजागरण काल में हिंदी को आगे बढ़ाने का काम किया था।

भारतेन्दु युग में हिंदी प्रदीप जैसा अखबार निकला जिसके 32 वर्ष तक सम्पादक भट्ट जी रहे। भारतेन्दु ने कवि वचन सुधा हरिश्चंद्र जैसी पत्रिका निकाल कर राष्ट्रीय चेतना विकसित की। उन्होंने निज भाषा की उन्नति पर जोर दिया। अयोध्या प्रसाद खत्री ने तो खड़ी बोली का आंदोलन ही चलाया। यह दौर राष्ट्रवाद के विकास का दौर था। कांग्रेस की स्थापना भी इसी दौर में होती है। नागरी लिपि का आंदोलन भी इसी दौर में तेज होता है और अंग्रेजों को देश को मुक्त कराने की चेतना फिर फैलती है। 1857 की क्रांति के विफल होने के बाद एक बार फिर देशभक्ति का उबाल चढ़ता है। राष्ट्रीय परिदृश्य पर तिलक, गोखले, लाला लाजपत राय, विपिन चन्द्र पाल उभर कर आते हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती के नेतृत्व में आर्य समाज आंदोलन भी चलता है। इन सारी घटनाओं का असर हिंदी के लेखकों पर पड़ता है और उनमें देश भक्ति की ज्वाला फूट पड़ती है।

1905 में माधव राव सप्रे को अपने लेखन के कारण देश द्रोह के मुकदमे का सामना करना पड़ता है। 1908 में प्रेमचन्द के सोजे वतन कहानी संग्रह को अंग्रेज सरकार जब्त करती है क्योंकि उनमें प्रकाशित 5 कहानियों से सरकार को उसके खिलाफ जनता के विद्रोह की चिंगारी दिखाई दी।

1908 में महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्पति शास्त्र किताब लिखकर जनता को बताया हैं कि अंग्रेज किस तरह लोगों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं। द्विवेदी जनता को गुलामी के खिलाफ जगाने का काम करते रहे। द्विवेदी युग में मैथिली शरण गुप्त रूप से राष्ट्रीय चेतना को फैलाने वाले प्रमुख कवि के रूप में सामने आते हैं। 1910 में जयद्रथ वध 1912 में भारत भारती और 1916 में किसान लिखकर गुप्त जी ने देशभक्ति की भावना को देश में फैलाया। 9 नवम्बर 1913 को गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप अखबार निकाल कर ब्रिटिश सरकार की नींद हराम कर दी। गांधी के भारत लौटने पर एक नया युग ही शुरू हुआ। 1916 के कांग्रेस अधिवेशन में गांधी की मुलाकात गणेश शंकर विद्यार्थी से हुई। वहीं मैथली शरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा, नवीन जी पहली बार सभी एक दूसरे में मिले।

जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो लेखकों पत्रकारों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लेख लिखे। मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचन्द और शिवपूजन जैसे लोगों ने सरकारी नौकरी का त्याग किया। 

प्रताप के अलावा सरस्वती मतवाला, कर्मवीर,  हंस, अभुदय चांद लीडर, युवक, भारत मित्र, जनता जैसे अनेक पत्र पत्रिकाओं ने राष्ट्रीय चेतना विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभाई जिससे लेखक जुड़े थे। इन पत्रिकाओं पर कभी छापे पड़े तो कभी जमानत देनी पड़ी तो कभी संपादक गिरफ्तार हुए और किताबें जब्त हुईं।

दिनकर ने अमिताभ नाम से सरकार के विरोध में कविता लिखी तो वह सेंसर होकर छपी। जब उनका का पहला संग्रह रेणुका छपा तो अंग्रेज मजिस्ट्रेट को पता चला कि इसमें सरकार विरोधी कविताएं हैं तो दिनकर से पूछताछ हुई और कहा गया बिना सरकार से पूछे आपने क्यों छपवाई फिर उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति को फैलाने में उस दौर में सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, दिनकर तथा श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की कविताओं ने बड़ा काम किया। झांसी की रानी, झंडा ऊंचा रहे हमारा, कलम उनकी जय बोल, पुष्प की अभिलाषा जैसी कविताएं लोगों की जुबान पर चढ़ गईं। झंडा गीत को प्रभात फेरियों में गया जाने लगा।

हिंदी के लेख इस मायने में सच्चे देशभक्त थे कि लिखने के साथ-साथ वे लड़ाई के मैदान में उतरे और जेल भी गए। हसरत मोहानी, मैथिली शरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, रामनरेश त्रिपाठी, पांडेय बेचन शर्मा, राहुल सांकृत्यायन, बालकृष्ण शर्मा, नवीन, सूर्य नारायण व्यास, रामबृक्ष बेनीपुरी, सुभद्रा कुमारी चौहान, यशपाल, फिराक, अज्ञेय और नरेंद्र शर्मा जैसे अनेक लेख जेल भी गए।

आज जो आजादी का जश्न मना रहे हैं हमारे लेखकों की आत्मा पूछ रही है जिस आज़ादी की कल्पना हमने की, क्या वह मिली। हमारे पास उसका क्या कोई जवाब है?

(वरिष्ठ पत्रकार और कवि विमल कुमार का लेख।)

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