जब लड़ाई ज़मीन के हिस्से की होती है, तब किसी भी तरह का तटस्थ रहना असंभव हो जाता है। यह वही लड़ाई है जो किसी नारे, प्रतीक या प्रतिनिधित्व से नहीं, बल्कि जीवन और भूख की बुनियादी ज़रूरत से उपजती है। ज़मीन की हिस्सेदारी का सवाल आते ही सामाजिक संतुलन की नींव हिल जाती है, और हर वह ताक़त जो अब तक दबे हुए लोगों को प्रतीकात्मक अधिकार देकर टालती रही है, वह खुलकर सामने आ जाती है।
साम्यवादी विचारधारा वर्षों से यह दावा करती रही है कि धन और धरती पर सबका बराबर हक़ है। लेकिन जब OSC (Other Scheduled Castes) ने ज़मीन की माँग ज़मीनी स्तर पर शुरू की, तो यही समाज, सत्ता और व्यवस्था उनके विरोध में खड़ी हो गई। ताज़ा उदाहरण है हरियाणा के नरवाना का उझाना गाँव, जहाँ OSC समुदाय ने पंचायती ज़मीन में से एक चौपाल के लिए ज़मीन माँगी। यह माँग महज़ सामाजिक हिस्सेदारी की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी। मगर ज़मींदार तबके ने इसे चुनौती मान लिया। माँग के विरोध में पंचायतें बुलाई गईं। जब OSC समाज के लोग चंडीगढ़ पैदल मार्च के लिए निकले, तो रास्ते में पुलिस ने उन्हें डिटेन कर लिया और जबरन गाँव वापस भेज दिया।
यह घटना अपने आप में संकेत है, अगर एक चौपाल की माँग से इतना ग़ुस्सा है, तो जब लड़ाई ज़मीन के बँटवारे की होगी, तब क्या हालात होंगे?
यह कोई पहली बार नहीं है। 1990 में जब मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू हुईं और आरक्षण पिछड़े वर्गों को मिला, तो विरोध ज़मींदार वर्गों की ओर से हुआ। दुखद यह था कि आरक्षण मिलने के बावजूद अधिकांश पिछड़ा वर्ग उसी विरोध के साथ खड़ा हो गया, जिसका नेतृत्व सवर्ण ताक़तें कर रही थीं। उसी दौर में OSC वर्ग आरक्षण विरोध का शिकार बना। वह न तो उसका सीधा लाभार्थी था, न ही उस विरोध का पक्षधर, लेकिन सबसे पहले वही निशाने पर आया।
यही तस्वीर 2 अप्रैल, 2018 के आंदोलन में भी दिखी। जब सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले से SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम को कमज़ोर किया गया, तब OSC वर्ग सबसे पहले और सबसे उग्र रूप में सड़कों पर उतरा। पिछड़ा वर्ग, जो संख्या में भी भारी है और राजनीतिक रूप से बेहतर संगठित है, पूरी तरह नदारद रहा। OSC पर गोलियाँ चलीं, मुक़दमे लगे, गिरफ़्तारी हुई। फिर भी उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा।
इन दोनों घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि जो वर्ग संघर्ष करता है, वही सबसे ज़्यादा उत्पीड़न झेलता है, भले ही लाभ का हिस्सा उसे न मिले। यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि सत्ता संरचना का स्थायी चरित्र है।
सत्ता और जाति के गठजोड़ ने एक और चाल चली — OSC और DSC (Deprived Scheduled Castes) के बीच कृत्रिम ध्रुवीकरण पैदा किया गया। इसका मक़सद आंदोलनकारी हिस्से को अस्थिर और विभाजित करना था। लेकिन सच्चाई यह है कि OSC तबका लगातार सामाजिक न्याय की अग्रिम पंक्ति में रहा है और हर बार अपनी अस्मिता और अस्तित्व की क़ीमत पर भी खड़ा रहा है।
अब OSC को यह स्पष्ट बोध हो चुका है कि केवल आरक्षण के सहारे जीवन संभव नहीं है। आरक्षण अब मात्र एक राजनीतिक झुनझुना बनकर रह गया है। पद रिक्त रखे जाते हैं, नियमों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है, अधिकारी उन्हें अपने अनुकूल प्रभावित करते हैं। इसलिए OSC अब धन और धरती के बँटवारे की प्राकृतिक न्याय की लड़ाई के लिए तैयार है।
एक ओर OSC इस लड़ाई में आगे बढ़ चुका है, वहीं दूसरी ओर DSC को धर्म, भक्ति और सेवा जैसे भावों की रस्सियों से बाँधने के प्रयास चल रहे हैं जिससे वे आंदोलन की बजाय पूजा में लगे रहें।
आज की ज़मीनी सच्चाई यह है कि ज़मींदार वर्ग के भीतर भी एक बड़ा तबका ऐसा है जो खुद ज़मीन विहीन है, लेकिन जातिगत गौरव उन्हें OSC के बराबर खड़ा होने से रोकता है। मज़दूरी से उन्हें शर्म आती है, मगर ज़मीन है नहीं। जब असली बँटवारा होगा, तब यही वर्ग यह तय करेगा कि वह जातिगत गर्व के साथ खड़ा रहेगा या धरती के हिस्से के साथ।
यह निर्णायक घड़ी है, ख़ासकर साम्यवादी राजनीति के लिए। क्या वे OSC वर्ग के नेतृत्व को स्वीकार करेंगे, और ज़मीनी संघर्ष की कमान उन्हें सौंपेंगे? या फिर एक बार फिर ज़मींदार नेतृत्व को ‘किसान’ कहकर असल सवालों से मुँह मोड़ लेंगे?
इतिहास हमें बार-बार अवसर देता है कि हम न्याय का साथ दें। मगर न्याय हमेशा सत्ता के विरुद्ध होता है। अब सवाल यही है कि हम किसके साथ हैं?
धरती के हक़ की लड़ाई में OSC आगे है। यह न तो अस्मिता का स्वाँग है, न प्रतीक की राजनीति। यह ज़िंदा रहने की बुनियादी लड़ाई है। और यही तय करेगा कि आने वाला समय किसका होगा- ज़मींदार का या ज़मीन के लिए लड़े लोगों का।
इसी मोड़ पर प्रश्न उठता है कि भूमिहीन ज़मींदार जातियों के लोग — जो जाति से ऊँचे माने जाते हैं, किंतु आर्थिक स्थिति में OSC से बेहतर नहीं -इस संघर्ष में किस पक्ष में खड़े होंगे? जातीय गौरव उन्हें केवल भ्रम देता है, जबकि वास्तव में वह श्रम से घृणा और सम्मानजनक जीवन से दूरी पैदा करता है।
अब जब ज़मीन का बँटवारा होगा, तो उनके हिस्से में कुछ छिनेगा नहीं, बल्कि कुछ मिलेगा। इसलिए यह संघर्ष जाति का नहीं, ज़मीन का है -और यही क्रांति की वास्तविक ज़मीन बनती है।
(सतीश कुमार टिप्पणीकार हैं।)