क्रिमिनल लॉ की समझ नहीं, इनको सीनियर जज के साथ ही बैठाएं, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पर भड़का सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को ‘सबसे खराब’ बताते हुए संबंधित जज जस्टिस प्रशांत कुमार को कड़ी फटकार लगाते हुए उन्हें क्रिमिनल मामलों की सुनवाई करने से रोक दिया है। अदालत ने कहा कि जज ने एक दीवानी मामले में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति देकर न्याय का मजाक उड़ाया है। मामला एक कारोबारी विवाद से जुड़ा था, जिसमें जज ने टिप्पणी की थी कि सिविल केस में देर लगती है, इसलिए क्रिमिनल केस के जरिए पैसा वसूला जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे चौंकाने वाला तर्क करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को अब तक का सबसे खराब आदेश बताया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व आदेश में निर्देश दिया है कि जज को रिटायर होने तक किसी भी क्रिमिनल मामले में सुनवाई नहीं करने दी जाएगी। शीर्ष अदालत ने उन्हें हाईकोर्ट के एक अनुभवी सीनियर जज के साथ एक खंडपीठ में बैठाया जाएगा। मामले से संबंधित जज ने माल की बिक्री के लिए राशि की वसूली के एक मामले में आपराधिक कार्यवाही की अनुमति दी थी।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा, ‘पूरे सम्मान और विनम्रता के साथ, हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि यह विवादित आदेश इस कोर्ट के जज के रूप में हमारे कार्यकाल में अब तक मिले सबसे बुरे और सबसे त्रुटिपूर्ण आदेशों में से एक है…..संबंधित जज ने न केवल खुद को एक दयनीय स्थिति में पहुंचाया है, बल्कि न्याय का भी मजाक उड़ाया है। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि हाईकोर्ट के स्तर पर भारतीय न्यायपालिका में क्या गड़बड़ है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज ने एक कंपनी के खिलाफ मजिस्ट्रेट के समन आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया था। इस कंपनी पर दीवानी प्रकृति के एक व्यावसायिक लेनदेन में शेष राशि का भुगतान न करने का आरोप था। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता को राशि वसूलने के लिए दीवानी उपाय अपनाने के लिए कहना अनुचित था क्योंकि इसमें बहुत समय लगता है।

हाई कोर्ट के जज की तरफ से पारित आदेश को ‘त्रुटिपूर्ण’ बताते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा कि जज ने यहां तक कहा कि शिकायतकर्ता को शेष राशि की वसूली के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश शीर्ष अदालत के जज के रूप में उनके कार्यकाल में मिले ‘सबसे खराब और सबसे त्रुटिपूर्ण’ आदेशों में से एक था। पीठ ने कहा कि संबंधित जज ने न केवल खुद को बदनाम किया है, बल्कि न्याय का भी मजाक उड़ाया है। बेंच ने कहा कि हम यह समझने में असमर्थ हैं कि हाईकोर्ट के स्तर पर भारतीय न्यायपालिका में क्या गड़बड़ है। कई बार हम सोच में पड़ जाते हैं कि क्या ऐसे आदेश किसी बाहरी विचार पर पारित किए जाते हैं या यह कानून की सरासर अज्ञानता है। जो भी हो, ऐसे बेतुके और त्रुटिपूर्ण आदेश पारित करना अक्षम्य है।

शीर्ष अदालत हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें मेसर्स शिखर केमिकल्स द्वारा वाणिज्यिक लेनदेन के एक मामले में समन आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई थी। इस मामले में, शिकायतकर्ता (ललिता टेक्सटाइल्स) ने शिखर केमिकल्स को 52.34 लाख रुपये मूल्य का धागा दिया था। इसमें से 47.75 लाख रुपये का भुगतान किया जाना था। हालांकि, शेष राशि का भुगतान आज तक नहीं किया गया है। ललिता टेक्सटाइल्स ने शेष राशि की वसूली के लिए एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।

इसके बाद, शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया गया और एक मजिस्ट्रेट अदालत ने आवेदक के खिलाफ समन जारी किया। कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि यह विवाद पूरी तरह से दीवानी प्रकृति का है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने आवेदक की याचिका खारिज कर दी।

4 अगस्त को शीर्ष अदालत ने कहा था कि हाई कोर्ट से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून की इस सुस्थापित स्थिति को जाने कि सिविल विवादों के मामलों में शिकायतकर्ता को आपराधिक कार्यवाही का सहारा लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया गया कि यह केस किसी और जज को सौंपा जाए.-जस्टिस कुमार से क्रिमिनल केस की जिम्मेदारी तुरंत वापस ली जाए.-जब तक वह सेवा में हैं, उन्हें कोई भी आपराधिक मामला ना सौंपा जाए.-अगर भविष्य में उन्हें सिंगल बेंच में बैठाया जाए, तब भी क्रिमिनल मामलों से दूर रखा जाए.-अब वे केवल सीनियर जज के साथ डिवीजन बेंच में ही बैठें।

भारत के न्यायिक ढांचे में सिविल और क्रिमिनल कानून की सीमाएं स्पष्ट हैं। एक कारोबारी लेन-देन को जानबूझकर आपराधिक रंग देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी एक स्पष्ट संदेश है कि कानून की बुनियादी समझ रखने वाले जज ही संवेदनशील मामलों की सुनवाई करें।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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