‘कुलपति को किसी से सीख लेने की ज़रूरत नहीं ‘, पत्रकारिता विभाग के आयोजन में कुलपति कुमुद शर्मा के बिगड़े बोल !

‘आज का व्यक्ति यह समझता है कि हम देश के प्रधानमंत्री को समझा सकते हैं। सुरेश जी (कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के. जी. सुरेश), ये (दर्शक दीर्घा की ओर इशारा करते हुए, जहां पत्रकारिता के विद्यार्थी और शिक्षक मौजूद थे) समझते हैं कि ये कुलपति को सिखा सकते हैं।…..लेकिन ये नहीं जानते हैं कि देश का प्रधानमंत्री हो या कुलपति हो या किसी संस्थान का निदेशक, कार्यकर्ता या चेयरपर्सन हो, उसे देश के नियमों के हिसाब से चलना पड़ता है वो आपके हिसाब से नहीं चल सकता।…तो ये मजबूरी है। ‘ ये बोल हैं इस समय महाराष्ट्र के एक मात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति कुमुद शर्मा के, जो विश्वविद्यालय के ही जनसंचार विभाग में आयोजित एक कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही थीं। यह आयोजन मीडिया साक्षरता पर केंद्रित था जिसमें मुझे वक्ता जाने माने पत्रकार के.जी. सुरेश मंच पर थे।

पत्रकारिता के मूल्यों और वर्तमान समय में मीडिया साक्षरता की जरूरतों को लेकर के. जी. सुरेश ने जहां एक ओर फैक्ट चेक, एजेंडा सेटिंग, फेक न्यूज जैसे विषयों पर गंभीर व्याख्यान दिया वहीं अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति कुमुद शर्मा के वक्तव्य ने मीडिया के छात्रों को चिंता से भर दिया। कुलपति एक तरफ अपने बयानों में सवाल और संवाद को जगह देने की बात करती हैं और दूसरी ओर उनका यह कहना कि कुलपति को कोई सिखा और समझा नहीं सकता, इस बात की ओर इशारा करता है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात को महज़ मंचों तक सीमित रखती हैं।

विभाग में स्टूडियो का खस्ता हाल, बाबा आदम के जमाने के संसाधन

विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में एक मीडिया लैब है। बाबूराव विष्णु पराड़कर मीडिया लैब। मगर वहां के स्टूडियो में पिछले कई सालों से जो संसाधन प्रयोग में लाए जा रहे हैं उनकी हालत ऐसी है कि उन्हें अब किसी संग्रहालय में रख देना चाहिए। विद्यार्थियों को स्टूडियो के भीतर भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है और सालों पुराने सॉफ्टवेयर से काम चलाना पड़ता है। कुलपति से जब इन समस्याओं को लेकर बात की गई तो उन्होंने कहा कि इन सबका प्रोसेस बड़ा लम्बा होता है जिसके लिए वो काम कर रही हैं। जिस आयोजन में कुलपति कुमुद शर्मा बोल रही थीं वहां विद्यार्थियों के द्वारा निर्मित न्यूज बुलेटिन भी दिखाया गया, मगर आए हुए अतिथि और उन्हें स्वयं मीडिया लैब तक नहीं ले जाया गया। कुलपति कुमुद शर्मा सिर्फ साहित्य से ही नहीं बल्कि मीडिया और जनसंचार के विषयों से भी काफ़ी गहराई से जुड़ी हैं। 

क्षेत्रीय केंद्र में प्रवेश रुका, मुख्य केंद्र में भी नहीं आ रहे विद्यार्थी

ऐसा ही कुछ हाल विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद का भी है। जहां के छात्रों का कहना है कि कुलपति से हुए संवाद में उन्हें यह आश्वासन दिया गया कि आने वाले कुछ महीनों में उन्हें पर्याप्त संसाधन और स्टूडियो मुहैया कराया जायेगा, मगर क्षेत्रीय केंद्र में जनसंचार पाठ्यक्रम ने प्रवेश यह कहकर रोक दिया गया है कि जब तक मुख्य परिसर में पंद्रह छात्र पूरे नहीं होंगे, क्षेत्रीय केंद्र पर प्रवेश नहीं लिए जाएंगे। सूत्रों से पता चला कि कुलपति के इस निर्णय से क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद में प्रवेश लेने आए कई विद्यार्थी वापस हो गए। 

सवाल यह है कि कुमुद शर्मा विश्वविद्यालय के जिस नियम और संविधान की बात कर रही हैं, उसमें यह कहां लिखा है कि मुख्य परिसर में सीटें भरने पर ही क्षेत्रीय केंद्रों में प्रवेश लिए जाएंगे? उनका यह निर्णय, जो कि कहीं कागज़ी रूप में आदेशित नहीं है, साफ़ दर्शाता है कि उनका उद्देश्य जैसे तैसे सीटें भरना है न कि विद्यार्थियों का हित और उनकी सहूलियत। क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद में विद्यार्थियों से किए गए संवाद में उन्होंने वहां अध्ययनरत विद्यार्थियों से यह तक कहा कि वे मुख्य परिसर चले आएं।

एक अनौपचारिक संवाद में जब मैंने उनसे उक्त विषय पर बात की और सवाल किया कि उन्होंने एक तरफ विद्यार्थियों को संसाधन मुहैया करने की बात कहीं और दूसरी ओर यह निर्देश दिया कि क्षेत्रीय केंद्र में प्रवेश न लिए जाएं, तो उनका कहना था कि जैसे हम आपसे बहुत कुछ कह दे रहे हैं वैसे उन विद्यार्थियों से भी कह दिया। हालांकि मुख्य केंद्र में भी विद्यार्थियों के लाले पड़ गए हैं। 

क्षेत्रीय केंद्रों में जिन विभागों में एक या दो विद्यार्थी हैं, उनको अनवरत संचालित किया जा रहा है और जिस विभाग में छात्र पढ़ने को इच्छुक हैं, उस विभाग में प्रवेश बंद कर दिया जा रहा है। क्षेत्रीय केंद्र इलाहाबाद में भ्रमण के दौरान हमने यह पाया कि अनुवाद विभाग, स्त्री अध्ययन विभाग और फिल्म विभाग में इकाई की संख्या में विद्यार्थी हैं। कुछ विभाग में तो एक या दो छात्र हैं जो नियमित भी नहीं हैं, मगर विभाग चल रहा और प्रोफेसर लाखों रूपये की तनख्वाह आराम फरमाकर पा रहे हैं। सूत्रों से प्राप्त खबरों से कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद को किसी अन्य अनुशासन की पढ़ाई के लिए केंद्र के रूप में बदला जा सकता है।

फिल्म अध्ययन विभाग को मुख्य परिसर में लाने की बात हुई तेज..

फिल्म अध्ययन विभाग को मुख्य परिसर में पुनः स्थापित करने की मांग छात्रों में तेज होती दिखाई दे रही है। कुछ छात्रों का कहना है कि इस विभाग के परिसर में आने से जनसंचार और मीडिया जैसे विभागों को और अधिक विस्तार मिलेगा एवं विदर्भ में रहने वाले मध्यम और निम्नवर्गीय परिवार से आने वाले विद्यार्थियों को आसान भाषा और कम शुल्क में सिनेमा और फिल्म की पढ़ाई करने का मौका भी मिलेगा। 

मीडिया से जुड़े विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए के. जी. सुरेश ने पत्रकारीय मूल्यों और प्रतिबद्धताओं पर भी बात की। साथ ही कहा कि इस विभाग को एक गांव को गोद लेकर वहां मीडिया साक्षरता के प्रति लोगों को जागरूक करना चाहिए। उन्होंने कुलपति कुमुद शर्मा को यह नवाचार शुरू करने का आग्रह किया। जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार कृपा शंकर चौबे भी मंच पर मौजूद रहे। मगर विद्यार्थियों के भीतर यह मलाल बना रहा कि सालों से मीडिया लैब की दुर्दशा को लेकर न तो कुलपति ने कुछ कहा और न ही विभाग के शिक्षकों ने, उलट इसके संचालिका डॉ. रेणु सिंह ने कुलपति को आगे भी विभाग में आते रहने का निवेदन किया।

कुलपति के बयान और जमीनी हकीकत को एक साथ रखकर देखें तो उनका बयान साफ़ इशारा करता है कि कुलपति से समस्याओं पर बात न की जाए और न ही समस्याओं को लेकर कोई सुझाव दिए जाएं। इंसान को जीवन के अंत तक सीखना और सिखाना पड़ता है। विश्वविद्यालय विद्यार्थियों से चलता है और स्वस्थ शैक्षणिक परिवेश के लिए उनके सुझावों और अपीलों पर प्रशासन को विचार करना पड़ता है। जरूरत पड़े तो नियमों में भी बदलाव करना पड़ता है। मगर अपने बयान कुमुद शर्मा यह कहना चाहती हैं कि उन्हें किसी से सीखने की आवश्यकता नहीं। ज्ञान के हिमालय पर इस तरह की बात तो बिल्कुल शोभा नहीं देती। यह उनका ज्ञान है, या ज्ञान पर गर्व अथवा अपने ज्ञान पर कुछ और ही….

(विवेक रंजन सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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