कृषि संकट और किसानी प्रतिक्रिया 

ट्रंप के राष्ट्रपति होने के बाद से ही भारत पर मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिए दबाव बढ़ गया है। जानकारी के अनुसार ट्रंप चाहते हैं कि भारत अमेरिकी सामानों पर टैरिफ घटा कर शून्य प्रतिशत कर दे। साथ ही एक ऐसा व्यापार समझौता हो जिसमें अमेरिका के कृषि, डेयरी और फल-फूल के उत्पाद को भारत का बाजार मिल सके। स्पष्ट है कि अमेरिकी बड़ी कंपनियों के लिए भारतीय कृषि बाजार में मुक्त विचरण करने की खुली आजादी हो।

इसके भारत के कृषि क्षेत्र में क्या सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे ।इस पर बहस जारी है। अभी तक भारत सरकार ट्रंप प्रशासन के प्रस्ताव को लेकर दुविधा में है। जानकारों का मानना है कि भारत सरकार अंततोगत्वा ट्रंप प्रशासन के सामने आत्म समर्पण करते हुए अमेरिकी शर्तों को स्वीकार कर लेगी।

ठीक इसी समय एक और खबर आयी। विदर्भ के नौ जिलों में विगत 90 दिन में 776 किसानों ने आत्महत्या की है। किसान आत्महत्या की परिघटना को लेकर सरकार और गोदी मीडिया द्वारा अनेक कारण गिनाए जाते हैं। लेकिन कुछ कारण हर जगह कामन हैं। जैसे फसलों का उचित दाम न मिलना, प्राकृतिक आपदा से फसलों की बर्बादी, कर्ज का बोझ कृषि में निवेश महंगा होता जाना। जिस कारण कृषि का घाटे में चले जाना। किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारक हैं।

असाध्य कृषि संकट

तीन दशक पहले शुरू‌ हुआ तीसरे दौर का कृषि संकट क्षणिक परिघटना नहीं है। इसलिए समाधान के लिए किए जाने वाले ऊपरी प्रयास से संकट को हल नहीं किया जा सकता है। वस्तुत: यह संरचनात्मक संकट है। जो भूमि संबंधों में बुनियादी बदलाव जैसे भूमि के मालिकाने यानी जमीन जोतने वाले, कृषि में पूंजी निवेश, विनिमय बाजार पर नियंत्रण और संरचनात्मक ढांचे में बदलाव के बुनियादी सवालों से जुड़ा हुआ है। इसलिए वर्तमान कृषि संकट को समझने और उससे कृषि को बाहर निकालने के लिए हमें भारतीय समाज के आर्थिक राजनीतिक सामाजिक ढांचे के स्वरूप को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

कृषि में संकट के लक्षण

कृषि संकट से आशय कृषक और ग्रामीण समाज द्वारा सामना की जाने वाली आर्थिक राजनीतिक सामाजिक चुनौतियों से है। जैसे कम फसल पैदावार, कृषि उपज की अस्थिर कीमतें (फसलों के दामों में उतार-चढ़ाव), उच्च इनपुट लागत (खेती में इस्तेमाल होने वाली बिजली खाद कीटनाशक बीज डीजल मशीनें आदि के मूल्य में वृद्धि), ऋण ग्रस्तता (किसानों पर बढ़ता कर्ज का बोझ) और श्रम बाजारों और बुनियादी ढांचे तक पहुंच की कमी (बैंकों से कर्ज लेने में जटिलता तथा उत्पादन बेचने के लिए मंडियों सरकारी केंद्रों आदि तक पहुंच में समस्या श्रम का उचित मूल्य न मिलना) जैसे कारकों से होती है।

ऋण ग्रस्तता 

कृषि उत्पादकता और लाभ प्रदत्तता में गिरावट के कारण कृषि क्षेत्र में सुस्त वृद्धि को संदर्भित करता है। जिससे उत्पादन और मुनाफे में कमी होने से कृषि घाटे का कारोबार हो जाती है। ठोस तौर पर कहा जाए तो किसान कर्ज जाल में फंस जाते हैं। हरित क्रांति की शुरुआती दौर के बाद फसलों के मूल्य का कृषि में प्रयोग होने वाले औद्योगिक उत्पाद के दाम के अनुपात में घटते जाना।

कर्ज की स्थिति-भारत के कुल 15.5 करोड़ किसानों पर 27 लाख करोड़ का कर्ज है। इसमें तमिलनाडु पहले नंबर पर है। 

देश में 27 राज्यों में करीब 2.76 करोड़ किसानों को रीजनल बैंकों से 2.58 लाख करोड़ रुपए का कर्ज मिला। कामर्शियल कैटेगरी के बैंकों से देश के 10.3 करोड़ किसानों ने कर्ज लिया है। जो 16.40 लाख करोड़ है। यानी औसत प्रति किसान परिवार 1.51 लाख रुपए है।

कोऑपरेटिव बैंकों से 2.67 करोड़ किसानों ने ऋण लिया है जो 2 लाख करोड रुपए से भी ज्यादा है। 37 राज्यों में से 9 राज्यों के किसानों ने इन बैंकों से कोई कर्ज नहीं लिया। यानी ऊपर का आंकड़ा 28 राज्यों का ही है। उत्तर प्रदेश में 1.51 करोड़ किसानों ने बैंकों से 1.71 करोड़ का कर्ज लिया है। निजी साहूकारों से किसानों ने बड़े पैमाने पर कर्ज ले रखा है।

आत्महत्या 

यह ऋण ग्रस्तता किसानों की आत्महत्या के रूप में दिखती है । विगत 20 वर्षों में छोटे मझोले किसानों से लेकर धनी किसानों तक आत्म हत्या का दायरा बढ़ता गया था। लेकिन कोविड के बाद इस सूची में ग्रामीण मजदूर भी शामिल हो गए हैं। आत्महत्या का दायरा बढ़कर दिहाड़ी मजदूरों और शहरी गरीबों तक फैल गया है। यह विकास मान परिघटना ग्रामीण समाज की आय में गिरावट बढ़ती दरिद्रता भुखमरी और कर्जदारी को प्रकट करती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष 15168 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। जिसमें 72% 2 हेक्टेयर से कम जोत वाले किसान हैं।

माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का कर्ज जाल

स्वयं सहायता समूह के निर्माण द्वारा ग्रामीण महिलाओं और गरीबों को सशक्त करने की योजना बांग्लादेश में एक हद तक सफल हुई थी। लेकिन भारत में यह योजना ग्रामीण महिलाओं के लिए आपदा बन गई है। स्वयं सहायता समूह को चलने वाली माइक्रो फाइनेंस कंपनियों में बड़े-बड़े माफिया प्रवेश कर गए। माइक्रो फाइनेंस से लिए गए कर्ज उत्पादक काम में नहीं लगाए जाते। गरीब महिलाएं बीमारी, बच्चों की पढ़ाई या शादी विवाह जैसे गैर उत्पादक कार्य के लिए कर्ज लेती हैं। इस लिए समय से लौटा पाना संभव नहीं होता। जिससे ग्रामीण गरीब खासकर महिलाएं कर्ज जाल में फंस जाती हैं। माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के संचालकों के अत्याचार से डर कर गांव से पलायन करने के साथ आत्महत्या की प्रवृत्ति मजदूरों में दिखाई देने लगी है।

श्रम पलायन

कृषि संकट का तीसरा लक्षण गांव से श्रम का पलायन है। खेती घाटे में चले जाने के कारण ग्रामीण मजदूर लंबे समय से शहरों की तरफ पलायन करते रहे हैं। इसका एक कारण वर्णवादी सामाजिक संरचना में भी निहित है। जिसमें आमतौर दलित अति पिछड़ी जातियों के किसान भूमि हीन या छोटी जोतों के मालिक होते हैं। इसलिए वे वैकल्पिक रोजगार की तलाश में शहरों या विकसित राज्यों की तरफ जाने को मजबूर हैं। 20वीं सदी के अंत में हरित क्रांति के ठहराव में चले जाने तथा ढांचागत परिवर्तन न होने के कारण स्थिति बहुत जटिल हो गई है। छोटे मझोले किसानों से लेकर मध्य और उच्च मध्यम तक के किसान परिवारों का खेती से गुजारा नहीं हो पा रहा है। गांव की स्वायत्तता समाप्त हो गई है और गांव कॉर्पोरेट नियंत्रित बाजार के अधीन हो  गए हैं।

पिछले दिनों यह परिघटना बटाईदारी में वृद्धि के रूप में देखी गई थी। जहां औसत जोत के किसानों ने अपनी जमीन बटाई या ठेके पर देकर अन्य वैकल्पिक रोजगार की तरफ रुख किया। लेकिन अब इस परिघटना में भी ठहराव आ गया है।जिस कारण से ग्रामीण जीवन और संकटग्रस्त हो चुका है।  पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक गांवों में घरों में ताले लटकने लगे हैं।

रोजगार के अभाव और शिक्षा स्वास्थ्य की उचित व्यवस्था न होने से शहरों पर दबाव बढ़ा है। भारत में रोजगार की स्थिति कितनी खराब है। इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि लाखों की तादाद में नौजवान युद्ध की विभीषिका में उलझे रुस और इजराइल जाने के लिए तैयार हैं। ट्रंप के आने के बाद अमेरिका ने जिस तरह से भारतीय कामगारों को हथकड़ियों बेड़ियो में जकड़ कर भारत भेजा। वह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय गांव किस तरह के जटिल संकट से जूझ रहे हैं। जहां किसानों के बेटे जमीन जायदाद  बेचकर डंकी रूट से अमेरिका जाने के लिए अभिशप्त हैं।

कारण

अपर्याप्त भूमि सुधार

भारत में 90% किसान एक या दो हेक्टेयर के मालिक हैं। आंकड़ों के अनुसार सीमांत किसान 80.15%, छोटे किसान 12.61 प्रतिशत, अर्ध माध्यम किसान 5. 51%, मध्य किसान 1.58% और बड़े किसान 0.10 प्रतिशत हैं। भारत की जीडीपी में कृषि का हिस्सा 15% है। ताजा आंकड़ों के अनुसार वह घटकर 14 प्रतिशत हो गया है। सीमांत किसानों की संख्या 126 मिलियन और उनके द्वारा संचालित जोत 37923 हेक्टेयर है। इसी तरह छोटे किसानों की संख्या 25 मिलियन और संचालित जोत 36151 हेक्टेयर, अर्ध माध्यम किसानों की संख्या 14 मिलियन संचालित जोत 37619 हेक्टेयर मध्यम किसानों की संख्या 6 मिलियन संचालित जो 318101 हेक्टेयर और बड़े फार्मर 84 मिलियन और इनके द्वारा द्वारा संचालित जोत 116311हेक्टेयर है। कुल किसानों की संख्या 1464 मिलियन और संचालित जोतो की मात्रा 157.817 मिलियन हेक्टेयर है। आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में भूमि सुधार आधा अधूरा हुआ‌ है। इससे किसानों की हकदारी तय करने में बेईमानी हुई और “जमीन जोतने वाले का नारा “हवाई बनकर रह गया है।

प्रकृति पर निर्भरता

संसद की कृषि संबंधी स्टैंडिंग कमेटी 2024 की रिपोर्ट के अनुसार 61% कृषि योग्य क्षेत्र प्राकृतिक वर्षा पर आधारित है। भारतीय कृषि की प्रकृति पर निर्भरता के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील है। देश के विभिन्न भागों में चरम मौसम के कारण फसल उत्पादन और आमदनी में गिरावट देखी गई है। कृषि मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार मार्च 2022 में ग्रीष्म लहर (हीट वेव )के कारण 36 लाख टन गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ था। 2014 और 15 में बेमौसम बारिश के कारण सोयाबीन की फसलों को भारी नुकसान हुआ। एक तरफ सुखाड़ और दूसरी तरफ बाढ़ के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। प्रतिवर्ष लाखों हेक्टेयर फसलें बाढ़ और सुखाड़ की भेंट चढ़ जाती हैं। अभी सितंबर में पंजाब में आई बाढ़ से हुए नुकसान की आने वाली सूचनायें डरावनी हैं। लगभग दो हजार गांवों में खरीफ की फसल पूरी तरह से बर्बाद हो गई है।

सरकार की फसल बीमा योजना

मौसम आधारित पुनर्गठन फसल बीमा योजना (स्ट्रक्चर्ड वेदर वेस्ट क्रॉप इंश्योरेंस) लागू की गई। जिससे केंद्र राज्य सरकारें बराबर के भागीदार हैं।विगत 4 साल में बीमा प्रीमियम की राशि 1.8 लाख करोड़ से बढ़कर 2.8 लाख करोड़ हो गई है। किसानों को कुल बीमा राशि में से 8 से 10 प्रतिशत ही भुगतान हुआ ।2020 कुल फसलों की बीमा 194689 करोड़ रुपए के विरुद्ध किसानों को 19385 ‌करोड़ रुपए का भुगतान हुआ। 2023 में तो स्थिति और खराब हो गई जब 278420 करोड़ रुपए के विरुद्ध किसानों को 7128 करोड़ रुपए का ही भुगतान हुआ। स्पष्ट है कि बीमा योजना देसी विदेशी बीमा कंपनी के लाभ के लिए ही लाई गई थी। जो किसानों को लूटने की एक और योजना भर है। बीमा योजनाएं कृषि संकट को हल करने की जगह किसने की लूट का हथियार हैं।

कृषि के ठहराव को इस तरह से सूत्रबद्ध किया जा सकता है। एक-  वर्षा और जलवायु पर निर्भरता ।दो- कृषि उत्पादों का व्यापक आयात। तीन- कृषि सब्सिडी में कटौती ।चार- कृषि के लिए आसान किस्तों पर ऋण का अभाव।5- साहूकारों पर निर्भरता। 6 -कृषि में सरकारी निवेश में गिरावट! छह- वैकल्पिक उपयोग के लिए कृषि भूमि का स्थानांतरण। सात- महिलाओं के श्रम का अवमूल्यांकन।

‌आर्थिक सुधार का मूलाधार है। सस्ता श्रम। सभी सरकारों में किसानों की इनकम कम हुई है। भारत ने कृषि का अमेरिकी मॉडल अख्तियार किया गया। जिसका परिणाम है कि अब ग्रोथ निगेटिव हो चुकी है। अमेरिका में भी किसानों की इनकम या तो ठहर गई है या घटी है। बड़े जोतदारों बड़ी कंपनियों और उच्च पूंजी निवेश पर आधारित अमेरिकी कृषि नीति ने बड़े पैमाने पर किसानों को खेती से बेदखल किया है। इसलिए वहां बड़ी कंपनियां लगातार किसानों‌ की खेती की भूमि का टेक ओवर कर रही हैं। भारतीय शासक वर्ग भी जोतदार केंद्रित कृषि अर्थव्य वस्था पर जोर देता है। जो उच्च पूंजी निवेश, उच्च कृषि तकनीक( ट्रैक्टर हार्वेस्टर और सिंचाई के पंपिंग सेटअप आदि) , विशालकाय कंपनियों के खाद बीज दवा कीटनाशक आदि पर टिकी है। जिस कारण से भारत के छोटे मझौले मध्यम  किसानों का दरिद्रीकरण और खेती से पलायन जारी है। इसलिए  भूमि सुधार और श्रम आधारित कृषि नीति अख्तियार किए बिना भारतीय कृषि के संकट को हल नहीं किया जा सकता है। लेकिन भारतीय शासक वर्ग कृषि‌ में बड़ी कंपनियां की घुसपैठ को सुनिश्चित कर रहा है ।और भारत की श्रम केंद्रित सामाजिक आर्थिक ढांचे को ध्वस्त करने में लगा है। 1985 से लेकर 2005 तक किसानों की इनकम में कोई वृद्धि नहीं हुई। 

मोदी सरकार आने के बाद लाए गये कृषि कानून इसी प्रक्रिया को तेज करने के लिए थे।। सरकार कारपोरेट कंपनियों के हाथ में भारतीय कृषि का नेतृत्व देने के लिए कटिबंध है।जिसे फिलहाल ऐतिहासिक किसान आंदोलन द्वारा रोक दिया गया है। लेकिन सरकार नए-नए तरीके खोजने और नियम कानून बनाने में व्यस्त है।

 उत्पादन और श्रम के मूल्य का सवाल-खेती किसानी का काम हुनर वाला है ।लेकिन कृषि में काम करने वालों को अकुशल श्रमिक का दर्जा दिया गया है। जिससे संगठित क्षेत्र के मुकाबले उनके श्रम की कीमत घट जाती है। संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र में पारिश्रमिक  तय करने का काम में भेदभाव है।  संगठित क्षेत्र में कामगारों को मजदूरी इस आधार पर तय की जाती है कि उससे पूरे परिवार का जीवन चल पाएगा या नहीं। लेकिन असंगठित क्षेत्र में यह मापदंड नहीं है। यहां काम करने वाले को परिवार की जिम्मेदारी दे दी जाती है। छोटे किसान एवं खेत में काम करने वाले मजदूर के श्रम का मूल्य कम आंका जाता है। इसके आधार पर कृषि पैदावार का मूल्य भी कम हो जाता है।

महिला श्रम-आजकल 35 से 40% कृषि कार्य महिलाओं द्वारा संपन्न होता है। लेकिन उन्हें नगद पारिश्रमिक नहीं मिलता। नीति निर्धारण में महिला श्रम की गणना नहीं की जाती है।इसे पारिवारिक श्रम की श्रेणी में रखकर अवमूलित कर दिया जाता है। जिस कारण से कृषि उत्पादन की लागत निर्धारण करने में बड़ी त्रुटि रहती है। आमतौर पर महिला श्रमिकों को पुरुष श्रमिकों के मुकाबले कम मजदूरी पर गुजारा करना पड़ता है ।जिससे उनकी सामाजिक भागीदारी और प्रतिष्ठा को भी गंभीर क्षति पहुंचती है।

“कृषि लागत और मूल्य आयोग” द्वारा फसलों का मूल्य तय होता है । उपयुक्त मापदंड के कारण फसलों के मूल्य घट जाते हैं ।मानवाधिकारों की राष्ट्रव्यापी घोषणा के अनुच्छेद 23(3) में हकदारी का सिद्धांत है । जिससे काम करने वाले प्रत्येक व्यक्तिको न्यायोचित और अनुकूल पारिश्रमिक का अधिकार प्राप्त होता है । इसलिए श्रमिक  को मिलने वाले पारिश्रमिक इतना होना चाहिए।जो श्रमिक और उसके परिवार के लिए मानवीय प्रतिष्ठा से जीवन सुनिश्चित कर सके। 

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का किसानों की आय बढ़ाने के सवाल पर कहना है कि भारत को विकसित करने के लिए कृषि को “ग्रोथ इंजन “बनाना होगा ।क्योंकि 45 से 50% आबादी कृषि से जुड़ी है ।इसलिए बजट का 50% यानी 24 लाख करोड़ रुपए का आवंटन कर चरणबद्ध तरीके से कृषि के विकास में लगाना होगा। इससे आर्थिक पहिया गतिशील होगा। इसमें छोटे किसानों को सशक्त करने का प्रयास करना होगा ।

जिसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करना टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना शामिल है। छोटे किसानों के लिए वित्त पोषण और संसाधनों तक पहुंच बढ़ानी होगी ।खाद्य सुरक्षा की सभी योजनाएं जिसमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) शामिल है, को स्थानीय उत्पादन खरीद भंडारण वितरण की सार्वभौमिक और केंद्रीकृत प्रणाली में बदला जाना चाहिए ।

बीज की विविधता किसानों के हाथ में सुरक्षित रखना होगा।

खेतिहर एवं खेतिहर परिवारों की न्यूनतम आयु सुनिश्चित करनी होगी ।खास कर दलित आदिवासी महिला एवं हांसिए के परिवारों को प्राथमिकता के साथ संबोधित करना होगा।

 ग्रामीण किसानों के नेतृत्व वाले कृषि प्रसंस्करण भंडारण और विपणन के लिए विस्तृत सुविधाएं विकसित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ऐसा बनाया जाए की भूमि हीन और छोटे किसानों की आय बढ़े।

कृषि अनुसंधान के तौर तरीके और दिशा को बदलने की जरूरत है। परंपरागत किसानों को केंद्र में रखकर कृषि पारिस्थितिकी वाले (पर्यावरण भूमि जल संरक्षण)तरीके पर ध्यान दिया जाना होगा। जो देश के लिए टिकाऊ खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय सुनिश्चित कर सके। 

 किसानों को सशक्त और कृषि समृद्धि करने का सवाल- इसके लिए समावेशी नीति, जिससे किसानों की संसाधनों तक पहुंच हो।भूमि सुधार के साथ  बुनियादी ढांचे का विस्तार और बाजार तक पहुंच को सुगम व आय में स्थिरता से संबंधित चुनौतियां का सामना करना पड़ता  है। नीति निर्धारण में किसानों का शामिल करना, एमएसपी की गारंटी और संसद में उचित प्रतिनिधित्व जैसे सवाल महत्वपूर्ण है।

संसाधनों का आवंटन और प्रबंध- कृषि उत्पादकता के लिए पानी बीज और उर्वरक जैसे संसाधनों तक किसानों की पहुंच बढ़ानी होगी।नीति निर्धारण में किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत है।  सामान वितरण टिकाऊ प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाना होगा।

भूमि सुधार-भूमि स्वामित्व में असमानताओं को दूर करने के लिए भूमि सुधार महत्वपूर्ण है। किसान हित धारकों के रूप में निष्पक्ष भूमि वितरण, भूमि स्वामित्व और भूमि विखंडन । जिससे  वास्तविक किसान के भूमि मालिकाने से ग्रामीण समाज वर्ग चरित्र बदल जाने  गुणात्मक परिवर्तन होगा। 

बुनियादी ढांचे के विकास ,नीति निर्धारण में किसानों की भागीदारी से लक्षित निवेश और बेहतर बुनियादी ढांचे को बढ़ावा मिलेगा

 बाजार तक पहुंच। किसानों की भागीदारी ।कुशल आपूर्ति श्रृंखला के निर्माण से फसलों के आने के बाद नुकसान को कम करना।

एयएसपी के माध्यम से आय में वृद्धि की जा सकती है। इसके निर्माण में किसानों की भागीदारी। क्योंकि उत्पादन लागत और बाजार  के प्रत्यक्ष ज्ञान से ही एमएसपी का सही निर्धारण हो सकता है। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर एमएसपी का निर्धारण कृषि संकट को हल करने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व

 समावेशी नीति निर्माण के लाभ। समग्र समाधान। नीति निर्माण। सशक्तिकरण जवाब देही। नवाचार और दक्षता।

 किसान अक्सर नवीन विचारों और प्रयासों के साथ आते हैं। उनकी भागीदारी कृषि नवाचार को बढ़ावा देगी। जिससे अधिक कुशल संसाधन उपयोग को बढ़ावा मिलेगा ।संसाधन उपलब्धता  ,भूमि सुधार ,बुनियादी ढांचे के विकास ,बाजार तक पहुंच, एम एसपी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित नीति निर्माण में भारतीय किसानों को शामिल करना केवल समानता का सवाल नहीं है ।यह राष्ट्रीय हित का भी सवाल है ।

कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में हित धारकों के रूप में किसानों को सशक्त करने से स्थाई कृषि विकास, गरीबी में कमी और किसान की आय में दोगुनी वृद्धि के लक्ष्य को हासिल करने की राह प्रशस्त करेगा।

 यह पहचानने का समय आ गया है कि किसान सिर्फ उत्पादक ही नहीं है। बल्कि भारत के कृषि भविष्य को आकार देने में सक्रिय भागीदार भी है। इसके अलावा गांव की समृद्धि भारत के औद्योगीकरण को गति देगी। बेरोजगारी जैसे सवालों को नियंत्रित करेगी ।खाद्य सुरक्षा की गारंटी देगी तथा बाजार को गतिशील करेगी। लगभग 50% आबादी की लोकतांत्रिक भागीदारी से समाज के लोकतांत्रिक कारण को बल मिलेगा ।लोकतंत्र की जड़ें गहरी होगी और सामाजिक जागरण का एक नया अध्याय शुरू होगा। जो भारत की ब्राह्मणवादी जातिवादी व्यवस्था और हिंदुत्व कॉर्पोरेट गठजोड़ के फासिस्ट प्रोजेक्ट पर मरणांतक प्रहार होगा।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी नेता और कार्यकर्ता हैं।)

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