आज़ादी से लेकर अमृत महोत्सव तक का आर्थिक सफ़र

आज़ादी से पहले भारत में केवल दो बड़े उद्योग थे एक जूट और दूसरा कपड़े का। हम क्योंकि ब्रिटिश सामान के आयात पर निर्भर थे इसलिए देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक आधारभूत ढांचे की ज़रूरत थी जिस पर देश के औद्योगिक व कृषि ढांचे की नींव रखी जाये। उसके लिए सबसे पहले ऊर्जा की ज़रूरत थी। ऊर्जा में बिजली जो कोयले, पानी और परमाणु तकनीक से हासिल होनी थी उसके लिए खनन और जल विद्युत के लिए बांध मशीनरी, सीमेंट, लोहा आदि वस्तुओं की आपूर्ति की योजना बनाने की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय योजना आयोग को दी गई और उसके उपयोग की प्राथमिकतायें तय की गयीं। जैसे बांध, पुल और मशीनरी के लिए लोहे और सीमेंट को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा गया।

किसी सेठ की कोठी, कार और अन्य निजी वाहन, आदि पर व्यय होने वाली धातु, सीमेंट आदि सामान का कोटा तय किया गया और उसे बाद की प्राथकिताओं में शामिल किया गया। लेकिन जैसे ही सरकार ने ऐसा किया तो ऐसी अर्थव्यवस्था के विरोधियों ने इस व्यवस्था को कोटा-परमिट राज कहकर बदनाम करना शुरु कर दिया। 

ऐसा कहने वालों में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी उर्फ़ राजा जी और उनके साथी थे। यह लोग चाहते थे कि भारत अपना स्वतंत्र आत्मनिर्भर आर्थिक विकास न करे बल्कि पाकिस्तान की तरह ही विदेशी वस्तुओं के आयात पर निर्भर हो जाये। इस तरह यह अप्रत्यक्ष रुप से विदेशी पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाना चाह रहे थे और अनेक समस्याओं से जूझ रही तत्कालीन सरकार को तंग व परेशान करने में लगे थे।

नेहरु ने जब 1955 में कांग्रेस के अवाड़ी अधिवेशन में समाजवादी तरह का समाज बनाने का प्रस्ताव पास किया और 1959 में कांग्रेस कार्यकारिणी की नागपुर सभा में सहकारी खेती और भूमि हदबंदी का प्रस्ताव पास किया तब राजा जी व उनके साथियों ने कांग्रेस छोड़कर राजा-नवाबों-उद्योगपतियों को लेकर एक अलग राजनीतिक पार्टी स्वतंत्र पार्टी का गठन कर लिया। इस तरह यह कांग्रेस से बाहर रहकर उस पर अपनी समाजवादी नीति बदलने के लिए दबाव डालने लगे।

उस समय विदेशी मुद्रा के स्रोत क्योंकि सीमित थे इसलिए उसकी मितव्ययिता भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल थी। इसके लिए विदेशी वस्तुओं की निर्भरता को न्यूनतम पर लाने का प्रयास किया गया और भोग विलास की आयातित वस्तुओं को हतोत्साहित करने के लिए उन पर भारी सीमा शुल्क लगाया गया।

अगर किसी अमीर को अपनी पत्नी या परिवार के लिए श्रृंगार या अन्य विलासिता की विदेशी वस्तुयें मंगानी भी हों तो उसे ज़्यादा सीमा शुल्क अदा करना पड़ता था। अधिक सीमा शुल्क लगाने का नतीजा यह निकला कि जहां सरकार की आय में वृद्धि हुई वहीं देसी उत्पादन और वस्तुओं की खपत बढ़ गई और इससे देसी उद्योग और रोज़गार में बढ़ोतरी होने लगी।

तबसे अबत क वह लोग जो इस केन्द्रीय स्तर पर सरकारी हस्तक्षेपकारी आर्थिक नीति के विरोधी थे एक तर्क बहुत देते हैं कि कारों, मोटर साइकिलों, स्कूटरों तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के तब गिने-चुने मॉडल उपलब्ध थे आज की तरह चुनने की आज़ादी नहीं थी लेकिन वह यह नहीं बताते हैं कि हमारे पास विदेशी मुद्रा के सीमित स्रोत थे और उनका इस्तेमाल औद्योगिक ढांचे के निर्माण में आ रही बहुत ज़रुरी सामग्री को आयात करने पर होना था।

इसके अलावा लोहा हमें बांधों, पुलों, मशीनरी आदि के लिए ज़्यादा ज़रुरी था वाहनों तथा अन्य उपभोक्ता सामानों के मॉडल हमारी प्राथमिकता में शामिल नहीं थे। तब यह सोचा गया कि जब अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा तैयार हो जायेगा जिस पर उद्योगों का जाल बिछ जायेगा तब अपने आप वाहनों के नये मॉडल तैयार हो जायेंगे।

देश उथल-पुथल और सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक कशमकश से ग़ुज़र रहा था वस्तुओं की कमी थी ऐसी स्थिति का लाभ उठाने के लिए कालाबाज़ारिये, जमाख़ोर, मुनाफ़ाख़ोर सक्रिय हो गये थे उनके काले कारनामों पर नियंत्रण करने के लिए जांच का एक तंत्र विकसित करना ज़रुरी था जो समय-समय पर छापामारी करके उनको नियंत्रित कर सके और इस तरह जनता को उनके द्वारा पैदा की गई उपभोक्ता वस्तुओं की कमी के संकट से छुटकारा दिला सके लेकिन इस व्यवस्था को भी इंस्पेक्टर राज कहकर बदनाम किया गया और आज तक किया जाता है जबकि पूंजीपति आज जबर्दस्त निगरानी यानि इन्स्पेक्टर राज की व्यवस्था लागू किये हुये हैं। 

दुकानों, डिपार्टमेंटल स्टोरों, शापिंग मालों, फैक्टिरियों में जनता और अपने कर्मचारियों पर नज़र रखने के लिए क्लोज़ सर्किट टीवी लगाये गये हैं। कारखानों से निकलने वाले कर्मचारियों की कड़ी तलाशी ली जाती है। शॉपिंग मॉल से एक सुई भी बिना गेट पर खड़े गार्ड की जानकारी के बाहर नहीं ले जा सकते लेकिन इस पूंजीवादी ‘इंस्पेक्टर राज’ की कभी आलोचना या चर्चा नहीं होती क्योंकि उसे सामान्य मान लिया गया है।

पूंजीवाद और उसके मुक्त बाज़ारवादी अर्थशास्त्री सरकार द्वारा केन्द्रीय स्तर पर की जाने वाली प्लानिंग के सख़्त विरोधी हैं। सरकार द्वारा इस तरह की प्लानिंग क्योंकि सबसे पहले 1917 की रुसी क्रांति के बाद सोवियत संघ में अपनायी गई इसलिए उस प्लानिंग के खिलाफ़ आस्ट्रियन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के प्रोफ़ेसर फ्रेडरिक अगस्त वॉन हायेक ने ‘रोड टू सर्फ़डम’ यानि ग़ुलामी का मार्ग नाम से 1944 में किताब ही लिख दी।

इसमें बताया गया कि जो देश केन्द्रीय स्तर पर प्लानिंग करके अर्थव्यवस्था चलाते हैं वह अपने देश को ग़ुलामी के मार्ग पर डाल देते हैं। असल में पूंजीवाद चाहता है कि केन्द्रीय स्तर पर योजना बनाकर जो बजट जनता के कल्याण और सार्वजनिक उद्योगों के विकास पर खर्च होता है वह उन पर खर्च होना चाहिये। वह चाहता है कि सरकार बजट की धनराशि उसको आवंटित कर दे ताकि वह अपनी मर्ज़ी से उसका उपयोग कर सके लेकिन कोटा-परमिट और इंस्पेक्टर राज की तरह ही पूंजीवाद का यह तर्क भी खोखला है क्योंकि पूंजीवाद अपना हर काम एक योजना के तहत ही करता है।

आपको बीमा कम्पनियां अपने अनेक प्लान समझाती मिलेंगी। मोबाइल कम्पनियों के प्लान तो आप रोज़ देखते हो। म्यूचल फंड कम्पनियां, स्टारअप कम्पनियां यानि निजी क्षेत्र जो सरकार द्वारा की जाने वाली प्लानिंग का सख़्त विरोधी है वह अपना एक क़दम भी बिना प्लानिंग के नहीं चल सकता। रियल स्टेट कम्पनियां अपने प्लान प्रकाशित करती रहती हैं लेकिन हायेक ने सरकार द्वारा की जाने वाली प्लानिंग के खि़लाफ़ किताब लिख दी और पूंजीवादी अर्थशास्त्री बाईबिल की तरह उसे पढ़े जा रहे हैं। मार्च 1944 के बाद से 2020 तक उस किताब की साढ़े बाईस लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। 

एक आत्मनिर्भर, सम्प्रभु देश का निर्माण कैसे होता है और उसके लिए नेतृत्व में किस स्तर की बौद्धिक क्षमता और इच्छा शक्ति होती है इसका उदाहरण हमको 1947 में बनी पहली सरकार के कामों के अध्ययन से मिल सकता है। हालांकि उस समय नई बनी सरकार के सामने बेपनाह समस्यायें मौजूद थीं लेकिन उनसे वह विचलित नहीं हुई और आप देखेंगे कि 1951 में शुरू हुई पहली पंचवर्षीय योजना से पहले ही इतने उद्योगों की शुरुआत की गई कि आज उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

‘‘प्रथम पंचवर्षीय योजना में इस बात पर बल दिया गया कि जिन क्षेत्रों में निजी क्षेत्र अपनी भूमिका नहीं निभाना चाहते उन क्षेत्रों में सरकार को दायित्व निभाना होगा। इस योजना काल में हिन्दुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड, इन्टीग्रल कोच फ़ैक्टरी, खादी एंव विलेज इन्डस्ट्रीज़ बोर्ड, हिन्दुस्तान मशीन टूल्स लिमिटेड, एयर इन्डिया इन्टरनेशनल, इन्डियन एयरलाइन्स कार्पोरेशन, भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड, स्टेट बैंक ऑफ़ इन्डिया, अशोका होटल, केन्द्रीय चमड़ा अनुसंधान संस्थान, परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की अध्यक्षता में परमाणु ऊर्जा आयोग, हीराकुण्ड और दामोदर घाटी परियोजना, तुंगभद्रा, भाखड़ा नंगल व गांधी सागर बांध, नेशनल फ़र्टिलाइज़र लिमिटेड, नेशनल फ़िज़िकल लेबोरेट्री, नेशनल मेटलर्जीकल लेबोरेट्री, नेशनल केमिकल लेबोरेट्री, केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, काऊंसिल ऑफ़ साईंस एण्ड इन्डस्ट्रियल रिसर्च, सेन्ट्रल ड्रग रिसर्च इन्स्टीटयूट लखनऊ, हिन्दुस्तान टेलीप्रिंटर लि0, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड, ओएनजीसी, भिलाई, राऊरकेला, दुर्गापुर स्पात संयंत्र, नेशनल कोल डेवलपमेंट कार्पोरेशन लि0, इन्डियन रिफ़ाइनरीज़ लि0, चितरंजन लोकोमोटिव कारखाना, इन्डियन ऑयल लि0, 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए ‘भारतीय राष्ट्रीय समिति इनस्कोपार का गठन किया गया जिसका सभापति डॉ. विक्रम साराभाई को बनाया गया। 

पहली योजना हेरोड-डोमर यानि कीन्सियन मॉडल पर आधारित थी जिसमें बचत और पूंजी निवेश को बढ़ाकर वृद्धि दर हासिल की जाती है। हेरोड ब्रिटिश व डोमर रशियन अमरीकी अर्थशास्त्री थे।

इस योजना में जहां एक तरफ़ विज्ञान, तकनीक, उद्योग एवं कृषि को प्राथमिकता दी गई वहीं दूसरी ओर शिक्षा मंत्रालय ने सांस्कृतिक एकता एवं विकास से सम्बंधित विभिन्न कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाई जैसे हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास की योजना, नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना, बनारस एवं कुरुक्षेत्र में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना, कला एवं संस्कृति के विकास के लिए संगीत, नृत्य, नाटक अकादमी की स्थापना, पुरातत्व विभाग, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नृविज्ञान विभाग की स्थापना व प्रथम योजना के अन्तिम वर्ष 1956 में पांच आईआईटी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, टेक्नीशियनों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान बनाये गये।’1

वियतनाम युद्ध के समय अमरीकी विदेश सचिव (मंत्री) जॉन फ़ास्टर डलेस का मशहूर कथन है कि मित्र देशों से बात करने के लिए हमारे पास स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश मंत्रालय) है और अमित्र से सीआईए। भारत ने क्योंकि सोवियत संघ का प्लांड इकोनोमी वाला मॉडल अपनाया था इसलिए हम अमरीका के अमित्र देशों में शामिल थे और हमसे सीआईए द्वारा बात की जा रही थी। कहा जाता है कि हमारे परमाणु कार्यक्रम को क्षति पहुंचाने के लिए 24 जनवरी, 1966 को एयर इंडिया के उस जहाज़ को गिरा दिया गया जिसमें हमारे परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा यात्रा कर रहे थे।

इसी 1960 के दशक में भारत को दो अनचाहे 1962 व 1965 के युद्धों में उलझा दिया जाता है उस पर 1965-66 में पड़े सूखे के कारण हालात और खराब हो जाती है और तब हमको तीसरी पंचवर्षीय योजना बीच में रोक देनी पड़ती है। अब 1970 का दशक आता है इसमें जहां एक तरफ़ हमें बांग्ला देश युद्ध में उलझना पड़ता है वहीं जार्ज फ़र्नांडीज के नेतृत्व में 1974 की रेल हड़ताल जो सरकार को अस्थिर करने के लिए की गई थी उससे जूझना पड़ता है। दूसरी तरफ़ गुजरात नव निर्माण व बिहार में जे.पी.आन्दोलन की शुरुआत भी इसी दशक में होती है। उधर इसी दशक में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी का चुनाव इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन सिन्हा ने अवैध घोषित करके उन पर 6 साल के लिए चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी जिसके बाद आपातकाल लगा।

अब 1980 का दशक आता है इस दशक में कश्मीर, पंजाब और उत्तरपूर्व में पृथकतावादी आन्दोलन शुरू होते हैं। इसी दशक में पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगे उन औद्योगिक शहरों में होते हैं जो विदेशी मुद्रा लाने के केन्द्र थे। 1985 में विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल के नेतृत्व में रामजन्मभूमि रथ यात्रा की शुरुआत होती है। इसी दशक में प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या कर के प्लांड इकोनोमी का पक्षधर सबसे मज़बूत स्तम्भ गिरा दिया जाता है। 1990 के दशक की शुरुआत राजीव गांधी की हत्या से होती है और इस तरह प्लांड इकोनोमी का अन्तिम स्तम्भ भी गिरा दिया जाता है।

इसके बाद ही प्लांड इकोनोमी के विरोधी और मार्केट इकोनोमी के समर्थकों ने भारत की राजसत्ता सम्भाल ली और तभी से प्लांड इकोनोमी को मार्केट इकोनोमी में बदलने का काम कभी धीमा तो कभी तेज़ गति से जारी है। जनता का ध्यान इस परिवर्तन और उसके दुष्परिणामों से हटाये रखने के लिए इसके समानांतर मन्दिर-मस्जिद और हिन्दू-मुस्लिम विवाद चलाया जा रहा है। यह सब एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। 

किसी देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर कब्ज़ा करने के लिए अमरीका ने ब्रेटनवुड की महाजन संस्थाओं के अलावा बहुत ही होशियारी से एक दीर्घकालीन योजना के तहत लैटिन अमरीकी देश चिली की तर्ज़ पर एक नीति और अपनायी कि अपने यहां आने वाले विदेशी छात्रों का ब्रेनवॉश करके उन्हें मुक्त बाज़ारवादी बनाना शुरू किया। भारत से अमरीका आने वाले लोगों के साथ भी यही किया गया।

उसके इस बौद्धिक जाल में अमीरों के बच्चे तो अपने वर्ग चरित्र के कारण आसानी से फंसते गये लेकिन जो मध्यम या निम्न मध्यम वर्ग के मेधावी छात्र थे वह वहां की सुविधाओं और चमक-दमक का शिकार होकर फंस गये इस तरह आप देखेंगे कि इन बीते 75 सालों में वहां से आने वाले ‘शिकागो बॉय भारत की अर्थव्यवस्था के सर्वोच्च पदों, उच्च शिक्षण संस्थाओं पर काबिज़ हो गये। मीडिया ने इनको ब्रांड बनाना शुरू किया तथा राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इनको पुरस्कृत व सम्मानित किया जाने लगा। इसका नतीजा यह निकला कि आज आप तलाश करेंगे कि कोई प्लांड इकोनोमी समर्थक अर्थशास्त्री या कोई नौकरशाह मिल जाये तो आपको निराशा हाथ लगेगी। अब कोई महालनोबीस या नेहरु समर्थक बाहर तो छोड़िये कांग्रेस में भी ढूंढे से नहीं मिलेगा।

खुद को विश्वगुरु कह कर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से कुछ नही होता। विश्वगुरु उसी को कहा जा सकता है जो अपने बौद्धिक व सैन्य कौशल के बल पर किसी देश को अपनी विचारधारा व अपनी नीतियों का ग़ुलाम बना लेता है। आपने 75 साल तिनका-तिनका करके जन सम्पत्ति का संग्रह किया और उसकी रक्षा के लिए सार्वजनिक उद्योगों की मज़बूत दीवार खड़ी कर दी लेकिन विश्वगुरु साम्राज्यवादी देश ने देसी उद्योगपतियों और अपने समर्थक राजनेताओं की मदद से चंद सालों में ही इस मज़बूत दीवार का विध्वंस कर आपकी दशकों की मेहनत पर पानी फेर कर इस बीच जो जनसम्पत्ति आपने खड़ी की थी उस पर कब्ज़े की योजना पर अमल करना शुरु कर दिया।

इसका नतीजा यह निकला कि सरकार के चहेते पूंजीपति विश्व के सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में ऊपरी पायदान पर जा बैठे। उनके पास पैसे की इतनी ज़्यादती हो गई कि एक को अपने चार सदस्यों के परिवार के लिए 10 हज़ार करोड़ रुपये की अपनी भारत में बनी कोठी से संतोष नहीं हुआ तो उसने पहले इंग्लैंड के बकिंघम शहर में 49 कमरों का 300 एकड़ का महल 529 करोड़ रुपये में खरीदा और बाद में उससे भी संतोष नहीं हुआ तो दुबई में 600 करोड़ रुपये की कोठी ख़रीद ली। इस बीच भारत में अपनी जीविका चलाने में असमर्थ दिहाड़ी मज़दूरों की आत्महत्या दर में लगातार वृद्धि होती गई। इसे पूंजी की अपच ही कहा जायेगा कि एक पूंजीपति अपने बच्चों की शादी पर पांच हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा उस देश में खर्च करता है जहां की 80 करोड़ से ज़्यादा जनता पांच किलो मुफ्त अनाज पर निर्भर है।

स्रोत:1. नेहरु युग में संस्थाओं का निर्माण लेखक सुरेश पुरोहित  

(मुशर्रफ अली वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं।)

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