मदर ऑफ डेमोक्रेसी से मदर ऑफ ऑल डील तक 

3 फरवरी को अचानक भाजपाई कुनबे से ढोल नगाड़ा के साथ भांगड़ा नृत्य का शोर सुनाई देने लगा। भाजपा कार्यालय मैं बैठे महारथियों से लेकर अंध भक्तों के चेहरे पर एक ऐसी कुटिल मुस्कान दिखाई दे रही थी। जिससे लग रहा हो कि सभी समवेत स्वर में गा रहे हों कि देख लिया न “मोदी जी ने कूटनीतिक चाल के बल पर अमेरिकी मोर्चे को फतह कर लिया है “। कोई कुछ सही-सही नहीं बता रहा था। लेकिन सब कहे जा रहे थे कि “डील हो गई, डील हो गई “।

ट्रंप पीछे हट गया और मोदी के आगे सरेंडर कर दिया है। सभी एक तरफ से शोर मचाए जा रहे थे। ठीक इसी समय मोदी जी एनडीए के मंच पर अवतरित हुए। सहयोगियों और भक्तों ने उन्हें फूल मालाओं से लाद दिया। जय जयकार होने लगा। दुनिया के सबसे कुटिल डीलर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को मोदी जी ने ऐसा समझाया कि वह एक फोन पर ही डील कर बैठा।

इसके पहले अमेरिका में ही जाकर मोदी जी ने ऐलान किया था कि “भारत मदर ऑफ डेमोक्रेसी है”। हमारे आदि ग्रंथ मनुस्मृति से ही डेमोक्रेसी पैदा हुई थी। आप जानते ही हैं कि हम डेमोक्रेसी से बने हैं और डेमोक्रेसी में ही पैदा हुए हैं। लोकतंत्र हमारे रगों में बहता है। न विश्वास हो तो गार्गी  से पूछ सकते हैं ।जब एक नारी ने  ऋषियों में श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य से सवाल किया तो उन्होंने डपटते हुए कहा था कि अगर आगे तुमने जुबान खोली तो तुम्हारी जुबान कट कर गिर जाएगी। यही नहीं ज्ञान के विस्तार को हमारे पूर्वजों ने इस तरह से बांध रखा था की एकलव्य का अंगूठा ही साफ कर दिया।

ये हमारे डेमोक्रेसी के माइलस्टोन हैं। जब भरी सभा में द्रौपदी नंगी की जा रही थी और पक्ष-विपक्ष के महारथी बैठे इस कृत्य को देख रहे थे। क्योंकि परंपरा और डेमोक्रेसी की रक्षा का जो सवाल था। हमारी माताएं अग्नि परीक्षा दे रही थीं और ज्ञान की खोज में निकले शंबूक वध के योग्य थे। बाद में तो बाबा ने कह ही दिया था। “ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ए सब ,,,,।” आदि “ग्रंथ  मनुस्मृति ” सदियों से हमारी डीमोक्रेसी का श्रोत है। संहिता है। जम्मू दीप के डेमोक्रेसी से बेहतर दुनिया में डेमोक्रेसी का कोई  मॉडल नहीं है और न हो सकता है। मोदी जी ने दुनिया को भारतीय डेमोक्रेसी का ज्ञान देकर  डंका बजा दिया था। उसी अमेरिका में।

आज 142 करोड़ भारतीय आदि डेमोक्रेसी का स्वाद  चख रहे हैं। और उसी में पूरी तरह से डूब गए हैं। छोड़िए छोटी-मोटी बातों से क्या फायदा ।

राहुल विपक्ष के नेता हैं। उनका काम है कुछ बोलना और कहना। ‘वे वामपंथियों और अर्बन नक्सलियों के जाल में फंस गए हैं।’ इसलिए कह रहे हैं की संस्थाएं कंप्रोमाइज हैं। हमारी डेमोक्रेसी पर इससे कोई असर नहीं पड़ता। हेमंता विस्व शर्मा, योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी के साथ ही हजारों साधु संत जैसे आसाराम से लेकर राम रहीम तक हमारी आदि डेमोक्रेसी को सुदृढ़ करने में जुटे हैं। तो मदर ऑफ डेमोक्रेसी शाश्वत है और रहेगी।

यही कारण है कि दुनिया के देश और नागरिक हमारे मदर ऑफ डेमोक्रेसी से प्रेरणा ले रहे हैं। हमारी महान डेमोक्रेसी को दुनिया से 70 वर्ष तक इन कांग्रेसियों और वामपंथियों द्वारा छुपाए रखा गया। यह तो अच्छा हुआ कि मोदी जी आ गए और विश्व को उन्होंने हमारी डेमोक्रेसी की महानता को समझा दिया। इसीलिए तो हमारे मोदी जी का डंका बज रहा है।

यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष भारत आईं ।अच्छा हुआ कि उन्होंने भारत के साथ मदर ऑफ ऑल डील कर डाली। नहीं तो यूरोप डूब ही जाता। ट्रंप यूरोप से नाराज थे। उन्होंने  यूरोप के कई देशों पर टैरिफ ठोक रखा है। अगर मदर ऑफ ऑल डील्स नहीं होता तो यूरोप भारत के विशाल बाजार और भारतीय ज्ञान नवाचार अन्वेषण से लाभान्वित होने से वंचित रह जाता। मोदी जी ने यूरोप को डूबने से बचा लिया। इसीलिए तो सभी डीलों पर मदर ऑफ डील कर डाली।

अब यूरोपीय देश राहत महसूस कर रहे हैं। इस डील में क्या-क्या हुआ है। समझौते पर दस्खत हुई है कि नहीं। अभी कुछ भी पता नहीं है। लेकिन है तो मदर ऑफ ऑल डील। इससे घबराकर ट्रंप अपना नया राजदूत भारत भेजा और उसने आते ही मोदी जी से बातचीत (खुशामद) करके  अमेरिका से नई डील करवा दी। नहीं तो अमेरिका इस दौड़ में पीछे छूट जाता। इसके पहले हम जोर शोर से प्रचार करते हुए यूनाइटेड किंगडम यानी ब्रिटेन से एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी मुक्त व्यापार समझौता )कर चुके हैं । उससे भारत को क्या लाभ होगा और ब्रिटेन को क्या फायदा होगा। हमसे ब्रिटेन वाले क्या  सीखेंगे।

देखिएगा जब भारत 1947 में दुनिया का विकसित देश बन जाएगा तब अंग्रेज शायद कहीं हासिए पर बैठे छटपटा रहे होंगे। इसीलिए तो आजादी की लड़ाई में मोदी जी के वैचारिक गुरु अंग्रेजों के  खिलाफ नहीं लड़े थे ।अब पता चला कि वे सौ वर्षों से अंग्रेजों को तबाह करने की योजना पर धैर्य पूर्वक काम कर रहे थे।

अब 2 फरवरी की रात 8 बजे के बाद ट्रंप से भी डील हो ही गई। क्या डील हुई है।किस-किस बात की डील हुई। इस डील  में देश और हमें क्या मिलेगा। अमेरिका को क्या मिला। इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।बस मोदी जी ने ट्रंप से डील कर लिया। मोदी जी के सामने ट्रंप ने घुटने टेक दिए। वह 50% कस्टम ड्यूटी लगाने पर अड़ा पड़ा था। लेकिन मोदी जी के एक मास्टर स्ट्रोक से ट्रंप धराशाई हो गया।देखिएगा!,अब भारत विकसित भारत बन  के रहेगा।

विकसित भारत के लिए रास्ता साफ हो गया। नवाचार और अन्वेषण के रास्ते खुल गए। निश्चय ही 2047 तक भारत विकसित भारत बन जाएगा। मोदी जी की एक चाल ने ही विकसित भारत के लिए रास्ता खोल दिया। दुनिया दंग रह गई है।पाकिस्तान थर थर कांप रहा है। चीन रूस देखते ही रह गए । मोदी जी ने तो सबको गच्चा दे दिया ।भक्त खुश। भाजपा खुश। देश खुश। गोदी मीडिया उछल-उछलकर डील के फायदे समझा रहा है। कैसे मोदी जी ट्रंप को रास्ते पर लाए। सभी एक ही बात कह रहे हैं की ट्रंप ने टैरिफ को घटा दिया। अब 18% कर दिया है। वह भारतीय मालों पर 18% ही टैरिफ लगाएगा है ।है ना भारत की बड़ी जीत। मोदी जी का मास्टर स्ट्रोक।

 मोदी के मित्र ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के पहले भारतीय मालों के अमेरिका में निर्यात पर 12% से अधिक टैरिफ लगता था। अब  सिर्फ शून्य%लगेगा। ट्रंप खुश। तो  भक्त खुश। भक्त खुश तो देश खुश ।मोदी जी जो भी करते हैं ।ओ देश के लिए करते हैं ।उन्होंने देश हित में बहुत बड़ा काम कर दिया । 

इसके पहले भारत में जब अमेरिकी सामान आता था तो उस पर शून्य प्रतिशत से 5% तक टैक्स लगता थ। अब शून्य परसेंट की जगह 18% टैरिफ पर अमेरिकी माल भारत आएगा। देखिए मोदी जी ने पर ट्रंप को झुका दिया। ट्रंप 50% टैरिफ लगाने पर अड़ा था। यही नहीं भारत अमेरिकी मालों पर जीरो फीसदी कस्टम ड्यूटी लगाएगा। यानी शून्य  शुल्क पर अमेरिकी माल भारतीय बाजार में आने देगा। इसके पहले तो हम भारत में आने वाले अमेरिकी मालों पर 120% तक टैरिफ लगाते थे।

अमेरिका के साथ कितना बड़ा अन्याय था। देखिए मोदी जी और संघ वाले कितने उदार हैं। कितने बड़े दिल वाले हैं। हमने कस्टम ड्यूटी न लेने का फैसला कर लिया। मोदी के मित्र ट्रंप के देश अमेरिका के लिए तो इतना किया ही जा सकता है । मोदी जी जब अमेरिका गए थे और ट्रंप जी ने सीधे प्रेस वार्ता में बैठा दिया था। तो मोदी जी ने यही न कहा था कि हम वसुधैव कुटुम्बकम् वाले लोग हैं। हम दुनिया को अपना कुटुंब मानते हैं। तो भला अमेरिका हमारा परिवार क्यों नहीं हुआ। ट्रंप हमारे अपने क्यों नहीं हुए।

 ट्रंप ने ही तो पाकिस्तान से युद्ध रुकवाकर भारत की इज्जत बढ़ा दी थी। मोदी जी का दुनिया में डंका बजवा दिया था। एक फोन पर ही भारत और पाकिस्तान को राजी करा लिया और खुद ही दुनिया को बता भी दिया कि 6 बजे से युद्ध विराम लागू हो जाएगा। हुआ भी वही। जो मोदी जी के मित्र ने कहा। 6: बजे युद्ध विराम हो गया।यही नहीं मित्र ट्रंप ने कहा कि क्या आपस में लड़ झगड़ रहे हो। आओ मिल जुल कर व्यापार करते हैं।

हालांकि मोदी जी 2 दिन बाद ही सामने आए और सच्चाई दुनिया को बताई। जो  ट्रंप ने छुपाया था। माई फ्रेंड ट्रंप से मोदी जी कैसे कहते कि हम नहीं मानेंगे। ट्रंप जो मोदी जी का जिगरी दोस्त ठहरा। ट्रंप के कहने पर अमेरिका का दुलारा बच्चा पाकिस्तान भी मान गया। तो भला मोदी जी ट्रंप के लिए इतना नहीं कर  सकते। इसलिए भारत ने अमेरिकी‌ मालों पर कर न वसूलने का मन बना लिया है। ट्रंप का एहसान जो ठहरा। संघ परिवार के साथ सभी भक्तगण और बजरंगी डील पर‌ खुशी और उत्साह में उछल कूद रहे थे। 

जश्न शुरू ही हुआ था कि विघ्न संतोषी आ गया। “बोला कम्प्रोमाइज्ड।”  कंप्रोमाइज का मतलब थोड़ी देर बाद भक्तों के समझ में आया। बाप रे बाप। यह क्या बोल दिया। कैसी कंप्रोमाइज! किसके साथ कंप्रोमाइज! किसके लिए कंप्रोमाइज!

उधर संसद में राहुल गांधी फिर विघ्न संतोषी बन के आ गए ।इस बीच में किसी किताब का नाम लेकर सारा स्वाद बिगाड़ दिया। भक्त नाराज हो गये। सभी एक स्वर से राहुल गांधी को गाली देने लगे। देशद्रोही है। अज्ञानी है। कंप्रोमाइज सुन डील की खुशी का मजा गड़बड़ाने लगा। भक्तगण किताब उताब क्या जाने। फिर वही किताब पढ़ने की बात। ज्ञान की बात। तर्क की बात। यह वामपंथियों का खुराफात है। अरे भाई व्यापार की बात करो। ट्रेड डील की बात करो। देखो मोदी जी ने कैसे अमेरिका के साथ बढ़िया डील कर दिया। तुम लोग भी डीलर बनो। जो डीलर नहीं ओ लीडर नहीं।

अभी मोदी डील की खुशी में माला पहन ही रहे थे। की ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया हैंडल ‘ट्रुथ ‘पर लिख दिया कि “आन रिक्वेस्ट ऑफ मोदी”! हमने भारत के साथ व्यापार समझौते के लिए सहमति दे दी है। (रिक्वेस्ट यानी निवेदन यानी चिरौरी।) अजब‌ दोस्त है ट्रंप। जब भी मौका मिलता है। तो मोदी जी को ठेंगा दिखा देता है। साथ ही ट्रंप ने कहा की मोदी ने फोन पर रुस से तेल न खरीदने का वचन दिया है। ट्रंप अब भारत के साथ 500 अरब डॉलर का व्यापार करने की डींग हांकने लगे हैं।

भारत का संपूर्ण विदेशी व्यापार 900 अरब डॉलर से कम है और अकेले अमेरिका से 500 अरब डालर। संपूर्ण यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का व्यापार 110 अरब डॉलर के करीब हैं और चीन हांग कांग के साथ 160 अरब डॉलर का कारोबार है। लगता है यह  2047 वाले विकसित भारत का रोड मैप है।जो पिछले 1 साल से भारत और अमेरिका के बीच वार्ता द्वारा तैयार किया जा रहा था। ट्रंप कह रहे हैं कि अब भारत वेनेजुएला से तेल खरीदेगा।

भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल संसद में गोल-माल बातें करते रहे। नवाचार अन्वेषण और ऊर्जा क्षेत्र मैन्युफैक्चरिंग के विकास के साथ बार-बार विकसित भारत का हवाला दे रहे थे। जो 2047 में होने वाला है। वे भारत अमेरिका के परस्पर लाभ और समानता के आधार पर सहमति बनने का दावा कर रहे थे। उन्होंने भारतीय मालों के लिए अमेरिकी बाजार के खुलने और व्यापार सुगमता के वातावरण के बनाने की चर्चा की।

बार-बार मोदी जी के विकसित भारत के प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया। लेकिन डील के मूल मुद्दे पर आने से कतराते रहे। जिस भेद को अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक कोलिन्स ने खोल दिया। उन्होंने कहा कि भारत के साथ जो समझौता हुआ है। उससे अमेरिका के ग्रामीण क्षेत्र में भारी धन प्रवाह होगा ।हमारे किसान मालामाल होंगे और हम अपना कृषि उत्पाद विश्व के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार में बेचेंगे। 

जिसका डर था वही हुआ। ट्रंप सत्ता में आने के बाद से ही भारत में अमेरिकी कृषि उत्पादन बेचने के लिए समझौते करने के लिए दबाव डाल रहा था। जब मोदी जी 15 अगस्त को लाल किले से किसानों की रक्षा के लिए निजी कीमत चुकाने की बात कर रहे थे। ठीक इसके दूसरे दिन कपास के कारोबार में मुक्त व्यापार समझौता हुआ। इसे क्या कहा जाए। लफ्फ़ाजी झूठ या देश को लाल किले की प्राचीर से गुमराह करना। कैसे इसको देखा जाए। जिसको लेकर संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य किसान संगठनों ने चिंता जताई थी कि अगर ऐसा समझौता होता है तो भारत के कपास के किसान जो पहले से संकटग्रस्त है और आत्महत्या करने को मजबूर हैं। असाध्य संकट में फंस जाएंगे और कपास की खेती चौपट हो जाएगी।

 इस बात का एहसास प्रधानमंत्री मोदी को पहले से ही था। ट्रंप के शपथ लेने के साथ ही उन्हें यह आभास हो गया था था कि अमेरिका के आगे कभी न-कभी झुकना ही पड़ेगा।आरएसएस का असली चरित्र ताकतवर के समक्ष समर्पण करने का रहा है। इस लिए मोदी जी उचित समय का इंतजार कर रहे थे। 2025 के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से मोदी एलान कर रहे थे कि “मैं अपने किसान भाइयों के लिए कोई भी व्यक्तिगत कीमत चुकाने के लिए तैयार हूं।”

इसके पहले बार बार कह चुके थे कि मैं अपने किसान भाइयों के स्वार्थ के लिए दीवार की तरह खड़ा हूं। लफ्फाजी का अपना भी कोई मनोविज्ञान होता ही होगा। हमारे गांव में कहावत है कि “चोर के दाढ़ में तिनका।” इसीलिए वह बार-बार किसानों के हितैषी होने का ढोंग करते रहे और ‌मजबूती से खड़े रहने का नाटक करते रहे। अब असलियत सामने है और भारत के किसानों को अमेरिकी भीमकाय कंपनियों के हवाले कर दिया गया है। संपूर्ण संघ परिवार मीडिया डील डील का शोर करके इसी अपराध को छुपा रही है। आज अमेरिका के कृषि क्षेत्र में उत्साह का माहौल है। तो मोदी और उनकी टीम देश को 2047 के विकसित भारत का सपना बेच रही है।

पीयूष गोयल दवे स्वर में लघु और मध्यम उद्योगों के सुरक्षा की भी बात कर रहे थे। लेकिन हम जानते हैं कि भारत के माल अमेरिकी बाजार में कैसे ठहर पाएंगे। भारत ए श्रेणी के चाय कॉफी जैसे माल यूरोप व अमेरिका के बाजार में बेचता रहा हैं। कभी-कभी करोड़ों के माल को घटिया क्वालिटी के नाम पर रिजेक्ट कर दिया जाता है। इसका लंबा इतिहास है। उच्च  तकनीक आधुनिक जेनेटिकली मॉडीफाइ और सघन पूंजी निवेश से संपन्न अमेरिकी कृषि बाजार और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के मुकाबले क्या भारत के कारोबारी  टिक पाएंगे।

भारत में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र मूलतः घरेलू उपभोग के लिए माल तैयार करता है। वह प्रतिस्पर्धा और क्वालिटी में अमेरिकी और यूरोपीय बाजार के मानक के मुकाबले टिक नहीं पाएगा।भारतीय बाजार में पहले से ही विदेशी ब्रांडेड सामान और चीन के सस्ते तथा टिकाऊ माल अटे पड़े हैं। अगर हमारे छोटे मझौले कारोबारी व उत्पादक अपने ही देश की बाजार में टिक नहीं पा रहे हैं। तो वे अमेरिकी या यूरोपी बाजारों में कैसे मुकाबला कर पायेंगे।

सवाल यह है कि मोदी सरकार ने किन कारणों और दबावों में आकर भारत के किसानों व छोटे कारोबारियों और उपभोक्ताओं के साथ विश्वासघात किया है ।राहुल गांधी  बार-बार “कंप्रोमाइज ” होने की तरफ उंगली उठा रहे हैं। वे एप्सटीन‌ खुलासे और मोदी के मित्र कारोबारी तथा भाजपा के फाइनेंशियल मशीन के अमेरिका में फंसे होने के दबाव की तरफ उंगली उठा रहे हैं। हो सकता है यह बात एक हद तक सही हो। ट्रंप के स्वभाव को देखते हुए यह लगता भी है कि वह अपने मित्रों की कमज़ोरियों  का फायदा उठाने में माहिर है। इसलिए वह ब्लैकमेल कर सकते हैं। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। 

हम जानते हैं कि 2014 में देसी विदेशी कॉर्पोरेट घरानों के समर्थन से मोदी प्रधानमंत्री बने थे।संघी हिंदुत्व का कॉर्पोरेट के साथ विलय हो जाने के बाद भारत की सोशियो इकोनॉमिक पोलिटिकल सिस्टम पर देसी विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का पूर्णतया कब्जा हो गया है।अब वे मोदी से  ब्याज सहित वसूलना चाहते हैं। इस समय भारत सहित दुनिया गंभीर आर्थिक संकट में फंसी है। जिस कारण विश्व शक्ति संतुलन बदलने के कगार पर है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बना विश्व ऑर्डर चरमरा गया है।

ऐसी स्थिति में हताश अमेरिकी साम्राज्यवाद आक्रामक हो गया है। अपना विश्व प्रभुत्व बनाए रखने के लिए भारत जैसे देशों पर दबाव बना रहा है।टैरिफ और व्यापार युद्ध इसी रणनीति का अभिन्न अंग हैं। ट्रंप के नेतृत्व में “मेगा नारे” के तहत अमेरिकी बादशाहत को बचाए रखने के लिए उछल-कूद कर रहा है ।इसके लिए वह मान मनौव्वल लालच समझौता के साथ-साथ सैन्य कार्रवाई करने पर आमादा है।

2024 के चुनाव परिणाम के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अब मोदी कमजोर हो चुके हैं। संघ व मोदी  के पास भारत को कॉरपोरेट और साम्राज्यवादी गुलामी की जंजीरों के अलावा देने के लिए कुछ नहीं बचा है। 2024 में लोकसभा के चुनाव में बहुमत हासिल न करने के बाद सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए मोदी सरकार आक्रामक हो गई है।लोकतंत्र को कमजोर करके, कानून के शासन का विनाश करने और देश  के अंदर आंतरिक तनाव और अराजकता पैदा करने में लगी है ।अपने इस कुकृत्य को छुपाने के लिए वह अमेरिका और बड़ी ताकतवर शक्तियों के गुलामी करने के हद तक नीचे उतर चुकी है।

पिछले कुछ समय से वैश्विक जगत में भारत में लोकतंत्र मानव अधिकार नागरिकों की स्वतंत्रता तथा अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे उत्पीड़न को लेकर भारी चिंताएं व्याप्त हैं। देश के अंदर उथल-पुथल मची हुई है ।लोग सड़कों पर भारी तादाद में उतर रहे हैं ।जिस कारण से माहौल तनाव पूर्ण हो चुका है । राज्य की राज्य के संस्थानों के साथ-साथ लगातार गिर रही है लोगों का न्यायपालिका चुनाव आयोग तथा प्रशासनिक तंत्र पर विश्वास घटता जा रहा है। जिस कारण से सरकार के खिलाफ जाना क्रॉस ठोस शक्ल लेने लगा है।

यही वह आंतरिक और वाह्य परिस्थितियां हैं। जिनकी एक झलक भारत में संसद के अंदर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं। जिस तरह से संसद में टकराव और तनाव का माहौल बना हुआ है। और मोदी जी की नई नई फाइलें खुल रही हैं। उसे इस डील के द्वारा छिपाया नहीं जा सकता। मोदी सरकार ने भारत के किसानों छोटे का कारोबारियों और नौजवानों के भविष्य के साथ छल किया है। हम जानते हैं कि जब दो देशों के बीच कोई व्यापारिक या राजनीतिक समझौते हैं। तो प्रतिनिधि मंडलों में बातचीत होती है।

दस्तावेजों पर साइन होती है और एक दूसरे को दस्तावेज दिए जाते हैं। यही नहीं दोनों देशों के नुमाइंदे द्वारा संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके समझौते का ऐलान किया जाता है। लेकिन यह कौन सी डील है ।जिसे रात के अंधेरे में किया गया।जिसका कोई लेखा-जोखा प्रमाण नहीं है। जिसमें न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई है और न समझौते के बारे में दोनों देशों द्वारा कोई संयुक्त बयान जारी किया गया है। भारत डील पर पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप अपने सोशल मीडिया हैंडल से समझौते का ऐलान कर रहे डील होने पर खुशी जाहिर कर रहे है। 

वहीं भारत के प्रधानमंत्री इस डील पर इतने‌ आह्लादित है कि पूरे देश में जश्न आयोजित करवा रहे हैं। जबकि प्रति ₹100 के आयात और निर्यात पर भारत को न्यूनतम 30 रुपए का घाटा हो रहा है।यह होता है घर फूंक कर तमाशा देखने का मनोविज्ञान। दिल पर गोल-गोल बात करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ट्रंप को शांति दूत बता रहे हैं और कह रहे हैं कि वह विश्व शांति के लिए समर्पित भाव से काम कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि समझौते को लेकर किसानों जैसे दूध मछली में पोल्ट्री मक्का सोया सेब के उत्पादकों में पैदा हुई आशंकाओं और भ्रम को दूर करें। लेकिन प्रधानमंत्री ट्रंप की प्रशंसा में कसीदे देखकर पढ़े जा रहे हैं।

इसी से स्पष्ट है कि बहुत कुछ ऐसा है जिसे छुपाने की कोशिश हो रही है।यह लोकतंत्र के किसी भी पैमाने पर उचित नहीं है और इसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। संसद के सत्र के दौरान ही डील हुई है। वाणिज्य मंत्री के बयान से चीजें और उलझ गई हैं। पहले अमेरिका की तरफ से सोशल मीडिया पर घोषणा हुई। उसके बाद दूसरे दिन उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने एक वक्तव्य दिया। उन्होंने ने भारत अमेरिका व्यापार समझौते को भारत के किसानों और लघु मध्यम उद्योगों के लिए लाभदायक बताया। साथ ही उन्होंने समझौते का विरोध करने वालों को भारत विरोधी करार दिया। इसी आखिरी वाक्य में वह सब कुछ छुपा हुआ है जिसे छिपाने की कोशिश हो रही है। 

जिस दिन पीयूष गोयल संसद में समझौता पर बयान दे रहे थे। उस दिन संसद का माहौल बहुत गर्म था। एलओपी राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर विचार रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बड़े मुद्दे को उठाया। उनके द्वारा पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल नरवड़े की पुस्तक का हवाला देने के कारण उन्हें बोलने से रोक दिया गया था। इसका विरोध करनेवाले वाले दश सांसदों को निलंबित कर दिया गया। स्थिति तनाव पूर्ण है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री निर्धारित समय पर नहीं आये। दूसरे दिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने यह कहकर स्थिति को और सनसनीखेज बना दिया है कि मैंने प्रधानमंत्री  को संसद में आने से रोक दिया था। क्योंकि उनकी सुरक्षा के लिए खतरा था। इस आधारहीन वक्तव्य के बाद भारत के लोकतंत्र के अंदर चल रही जटिल और खतरनाक अंत: क्रियाएं सामने आ गई हैं। यह वक्तव्य भारत में भविष्य के घटने वाली खतरनाक घटनाओं का संकेतक है। अगर प्रधानमंत्री संसद में सुरक्षित नहीं है। तो यह मान लेना होगा कि देश देश में कोई सुरक्षित नहीं है। मोदी के मजबूत देश क्या हालत यह हो गई है कि संसद के अंदर प्रधानमंत्री तक की सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी कि क्या होगा।

क्या यह मान लिया जाए की 12 वर्ष का कार्यकाल पूरा करते- करते  सरकार पूरी तरह से फेल हो गई है।या अध्यक्ष बिरला दृश्य जटिलताओंऔर कठिन सवालों से मोदी को बचाना चाहते हैं। इसका एक और अर्थ निकाला जा सकता है कि ओम बिरला प्रधानमंत्री पर खतरे का सवाल खड़ा करके संसदीय लोकतंत्र और विपक्ष के खिलाफ किसी सुचिंतित कार्रवाई करने का माहौल तो नहीं बना रहे हैं। दोनों स्थितियों देश और लोकतंत्र के लिए अशुभ होगी।

 एक तरफ अमेरिका के सामने पूर्ण समर्पण और दूसरी तरफ आंतरिक सुरक्षा के बढ़ते खतरे के बीच देश ख़तरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ऐसी स्थिति में क्या कोई ढांचागत राजनीतिक  उलट फिर होने जा रहा है। हमें फासीवाद की तरफ बढ़ते हुए देश के वर्तमान परिदृश्य को गंभीरता से लेना होगा। देश को बचाने के लिए  लोकतान्त्रिक संगठनों पार्टियों और व्यक्तियों को समय रहते अमेरिका के साथ डील की हकीकत क साहस के साथ जनता में ले जाना होगा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने ठीक ही कहा है कि मोदी के नेतृत्व में सरकार ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के समक्ष आत्मसमर्पण  कर दिया है ।भारत की संप्रभुता स्वतंत्रता और एकता को दाव पर लगाकर मोदी ने अपने पूर्वजों के पद चिन्ह पर चलने का ऐलान कर दिया है । किसानों मजदूरों छात्रों नौजवानों  सहित संपूर्ण लोकतांत्रिक शक्तियों के समक्ष बड़ी चुनौती खड़ी है।अब गेंद सिर्फ भारत के लोकतंत्र आजादी, संप्रभुता और अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले नागरिकों के पाले में है। देखना है वे‌ किस दृढ़ता और समर्पण के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश को बचाने के संघर्ष में उतारते हैं।

(जयप्रकाश नारायण किसान नेता और वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)

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