उत्तराखंड: कर्ज के साये में चुनावी बजट और वित्तीय जोखिम

​उत्तराखंड की वित्तीय सेहत इन दिनों आईसीयू की दहलीज पर खड़ी दिख रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भराड़ीसैंण (गैरसैंण) के सदन में वर्ष 2026-27 के लिए जो बजट प्रस्तुत किया है, वह न केवल आंकड़ों का एक पुलिंदा है बल्कि राज्य की भविष्य की पीढ़ी पर लादे जा रहे भारी-भरकम कर्ज का एक आधिकारिक दस्तावेज भी है। इस बार का बजट दस्तावेज़ यह गवाही दे रहा है कि उत्तराखंड पर कर्ज का बोझ अब एक लाख करोड़ रुपये के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को पार कर गया है।

वर्ष 2011-12 में जहां राज्य पर कुल ऋण 23,609 करोड़ रुपये था, वह अब बढ़कर 1, 04,245 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यानी पिछले डेढ़ दशक में राज्य का कर्ज चार गुने से भी अधिक बढ़ा है, लेकिन क्या इसी अनुपात में राज्य की बुनियादी विकास दर या आय के स्रोत बढ़े हैं? यह एक यक्ष प्रश्न है।

​राज्य की वित्तीय यात्रा का इतिहास देखें तो कर्ज का यह बढ़ता ग्राफ़ डराने वाला है। साल 2007 में जब नारायण दत्त तिवारी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी थी, तब राज्य पर मात्र 13 हजार करोड़ का कर्ज था। उस समय के विधानसभा चुनाव में विपक्ष ने इसी आंकड़े को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था, लेकिन आज वही मुद्दा एक चुनावी रस्म बनकर रह गया है। 2012-13 में कर्ज 25,540 करोड़ था, जो 2017-18 में 51,831 करोड़ और 2023-24 में 85,914 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

कोविड काल के बाद तो जैसे कर्ज लेने की होड़ मच गई। 2024-25 में यह 94,666 करोड़ हुआ और अब नए बजट अनुमानों में यह एक लाख चार हजार करोड़ को भी पीछे छोड़ रहा है। विडंबना यह है कि राज्य की अपनी शुद्ध राजस्व आय इतनी नहीं है जितनी राशि हम पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने और लोकलुभावन घोषणाओं को अमली जामा पहनाने में झोंक रहे हैं।

​वर्तमान में राज्य की सबसे बड़ी चुनौती ब्याज का भुगतान बन गया है। वर्ष 2026-27 में केवल ब्याज चुकाने पर ही लगभग 7,929 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है, जबकि दो साल पहले यह राशि करीब 5,575 करोड़ रुपये थी। इसका सीधा मतलब यह है कि जनता के पसीने की कमाई से मिलने वाले कर का एक बड़ा हिस्सा विकास की ईंट लगाने के बजाय साहूकारों की किश्तें भरने में जा रहा है।

बजटीय दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2026-27 में राज्य की कुल प्राप्तियां लगभग 1,10,143 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जबकि कुल व्यय 1,11,703 करोड़ रुपये आंका गया है। इस आय और व्यय के बीच की खाई को पाटने के लिए सरकार को फिर से कर्ज का ही सहारा लेना पड़ रहा है। पूंजीगत प्राप्तियों में भी सबसे बड़ा हिस्सा 40,250 करोड़ रुपये का आंतरिक ऋण है, जो बताता है कि हम कर्ज से ही विकास का ढांचा खड़ा करने की ‘कर्जखोरी’ की आदत के शिकार हो चुके हैं।

​चूंकि यह चुनावी वर्ष है, इसलिए सरकारों के लिए राजकोषीय अनुशासन से अधिक महत्वपूर्ण ‘वोटर अनुशासन’ हो जाता है। केंद्र ने आयुष्मान योजना केवल गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए शुरू की थी, जिसे उत्तराखंड सरकार ने लोकप्रियता के मोह में ‘अटल आयुष्मान’ के जरिए सभी के लिए खोल दिया। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के नाम पर खजाने से सीधे पैसे बांटने वाली योजनाओं और सरकारी खर्चों पर अंकुश लगाने के बजाय वोटरों को लुभाने वाले कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये बहाए जा रहे हैं।

सरकारी महकमों की फिजूलखर्ची और अनुत्पादक खर्चों पर कोई अंकुश नहीं है। चुनावी साल में घोषणाओं की झड़ी तो लग जाती है, लेकिन यह कोई नहीं बताता कि इन घोषणाओं के लिए धन कहां से आएगा।

​पर्वतीय भूगोल और सीमित औद्योगिक आधार के कारण उत्तराखंड की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन क्या यह कर्ज लेकर घी पीने की संस्कृति को जायज ठहराता है? राजकोषीय घाटा 12,579 करोड़ और प्राथमिक घाटा 4,650 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। सरकार भले ही एफआरबीएम एक्ट की सीमाओं का हवाला देकर खुद को सुरक्षित बताए, लेकिन हकीकत में ब्याज और कर्ज का यह दुष्चक्र राज्य को दिवालियेपन की ओर धकेल रहा है।

वित्तीय विशेषज्ञों की चिंता जायज है कि यदि आय के स्रोतों में क्रांतिकारी वृद्धि नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड केवल वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने वाला राज्य बनकर रह जाएगा। चुनावी वैतरणी पार करने के लिए लोकलुभावनवाद का जो रास्ता चुना गया है, उसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को भारी कर्ज और विकास की सुस्ती के रूप में चुकानी होगी।

(लेखक देहरादून से वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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