अहमदाबाद नगर निगम में विपक्ष के नेता की कुर्सी पर मोदी और इजराइल समर्थक नीरव बक्षी लगभग तय ?

अहमदाबाद। अहमदाबाद नगर निगम (AMC) चुनाव के नतीजे आए छह महीने से अधिक समय बीत चुका है। भारतीय जनता पार्टी महापौर समेत निगम के प्रमुख पदों पर नियुक्तियां कर चुकी है, लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अब तक अपने नेता प्रतिपक्ष, उपनेता और दंडक के नामों पर अंतिम फैसला नहीं कर पाई है। गुरुवार को श्रीगंगानगर के कांग्रेस सांसद कुलदीप इंदौरा की मौजूदगी में नेता प्रतिपक्ष के चयन के लिए पार्षदों की रायशुमारी हुई। इस प्रक्रिया में कांग्रेस के सभी पार्षदों ने हिस्सा लिया, लेकिन नेतृत्व के सवाल पर पार्टी के भीतर मतभेद एक बार फिर सामने आ गए।

नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में पूर्व विपक्ष नेता शहजाद खान पठान और पूर्व उपनेता नीरव बक्षी प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं। एक ओर शहजाद खान पठान के समर्थक उन्हें दोबारा जिम्मेदारी देने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अन्य पार्षदों ने फैसला प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा और पार्टी हाईकमान पर छोड़ने का रुख अपनाया है।

पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, 21 पार्षदों ने लिखित रूप से प्रदेश नेतृत्व और हाईकमान को नेता प्रतिपक्ष चुनने का अधिकार दिया है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक पार्षद से व्यक्तिगत रूप से भी राय ली गई। बताया जा रहा है कि कुछ पार्षदों ने निर्णय लेने का अधिकार नेतृत्व को सौंपने के बावजूद खुद को इस पद के लिए उपयुक्त बताया, जबकि कुछ ने शहजाद खान पठान के पक्ष में अपनी राय रखी।

इस पूरी कवायद ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कांग्रेस अहमदाबाद में विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए सर्वसम्मत नेतृत्व चुन पाएगी, या फिर गुटीय समीकरण ही अंतिम फैसले का आधार बनेंगे?

शहजाद खान बनाम नीरव बक्षी: मुकाबला केवल दो नामों का नहीं

कांग्रेस के भीतर इस मुकाबले को केवल दो पार्षदों के बीच की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी के स्थानीय संगठन में अलग-अलग नेताओं के प्रभाव और उनके समर्थकों की भूमिका भी इस चयन को प्रभावित कर सकती है।

राजनीतिक हलकों में शहजाद खान पठान को शैलेश परमार खेमे के करीब माना जाता है, जबकि नीरव बक्षी को भरत सोलंकी खेमे से जुड़ा बताया जाता है। शैलेश परमार और हिम्मत सिंह पटेल का अहमदाबाद शहर कांग्रेस की राजनीति में प्रभाव रहा है। ऐसे में प्रदेश नेतृत्व के सामने चुनौती केवल योग्य उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि विभिन्न गुटों के बीच संतुलन स्थापित करने की भी है।

पार्टी से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अमित चावड़ा और हाईकमान को निर्णय का अधिकार सौंपे जाने से नीरव बक्षी की दावेदारी को बल मिल सकता है। हालांकि, आधिकारिक घोषणा होने तक किसी भी नाम को अंतिम मानना जल्दबाजी होगी।

कांग्रेस के लिए यह चयन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेता प्रतिपक्ष नगर निगम में केवल एक पदाधिकारी नहीं होता। उससे बजट, विकास कार्यों, नागरिक सुविधाओं, प्रशासनिक जवाबदेही और सत्ता पक्ष के फैसलों पर प्रभावी सवाल उठाने की अपेक्षा की जाती है। यदि नियुक्ति लंबे समय तक गुटीय खींचतान में उलझी रहती है, तो उसका असर विपक्ष की कार्यक्षमता पर पड़ना स्वाभाविक है।

दरियापुर चुनाव के पुराने सवाल नीरव बक्षी के सामने

नीरव बक्षी की दावेदारी के साथ 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में दरियापुर सीट पर कांग्रेस के प्रदर्शन से जुड़े सवाल भी चर्चा में हैं। उस चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार गयासुद्दीन शेख को हार का सामना करना पड़ा था।

राजनीतिक चर्चाओं में यह आरोप लगाया जाता रहा है कि दरियापुर के कांग्रेस समर्थित हिंदू मतदाताओं ने मतदान में अपेक्षित भागीदारी नहीं की और कांग्रेस अपने पारंपरिक मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने में सफल नहीं रही। नीरव बक्षी पर भी आरोप लगाए गए कि उन्होंने हिंदू बहुल मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की सहायता के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं की और कांग्रेस समर्थकों को मतदान के लिए प्रेरित करने में अपेक्षित भूमिका नहीं निभाई।

हालांकि, इन आरोपों को चुनाव परिणाम का निर्णायक कारण मानने के लिए स्वतंत्र प्रमाण और मतदान केंद्रवार आंकड़ों की जरूरत होगी। किसी एक व्यक्ति की भूमिका को चुनावी हार का मुख्य कारण बताना भी पर्याप्त साक्ष्य के बिना उचित नहीं होगा।

फिर भी, यह विवाद नीरव बक्षी की राजनीतिक छवि और उनकी दावेदारी को लेकर होने वाली चर्चा का हिस्सा बना हुआ है। कांग्रेस नेतृत्व के सामने सवाल यह है कि क्या पुराने चुनावी विवादों को दरकिनार कर संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक संपर्कों को प्राथमिकता दी जाएगी, या उम्मीदवार की सार्वजनिक छवि और पार्टी के व्यापक सामाजिक आधार को भी उतना ही महत्व मिलेगा।

इजराइल समर्थक सोशल मीडिया पोस्ट से वैचारिक विवाद

नीरव बक्षी की दावेदारी का दूसरा संवेदनशील पहलू उनकी सोशल मीडिया गतिविधियों और इजराइल के समर्थन से जुड़ा बताया जाता है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने फिलिस्तीन के अधिकारों और वहां के नागरिकों की सुरक्षा के सवाल पर लंबे समय से अपना राजनीतिक रुख व्यक्त किया है। ऐसे में इजराइल समर्थक बयानों को लेकर बक्षी की कथित सोशल मीडिया पोस्ट पार्टी के भीतर वैचारिक असहजता पैदा कर सकती है।

एक पोस्ट को लेकर विवाद की चर्चा होती रही है, जिसमें कथित तौर पर उन्होंने लिखा था कि “मोदीजी हमें भी हमारे देश की सुरक्षा के लिए इजराइल की तरह वामपंथी पत्रकारों को अरेस्ट कर देश द्रोह का मुकदमा चलाकर फांसी पे लटकाना होगा। बहोत इज्ज़त दे दी मानव अधिकार वालों और प्रेस फ्रीडम को। राष्ट्र प्रथम।”

इस पोस्ट की प्रामाणिकता, पूरा संदर्भ और मूल प्रकाशन स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए बिना इसे निर्विवाद तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। यदि पोस्ट वास्तविक है, तो उसमें व्यक्त विचारों पर गंभीर लोकतांत्रिक बहस जरूरी है। क्योंकि एक तरफ वाम दलों के छात्र नेताओं में राहुल गाँधी संभावनाएं दखते हैं तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पत्रकारों को गिरफ्तार करने, उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने और फांसी देने की मांग की मांग उनकी पार्टी के पार्षद द्वारा की जाती है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह विचार करना जरूरी है कि उसके प्रतिनिधियों की सार्वजनिक टिप्पणियां उसके घोषित लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हैं या नहीं।

इजराइल-फिलिस्तीन का प्रश्न भी केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है। भारत में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और विभिन्न समुदायों के बीच अलग-अलग विचार मौजूद हैं। कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती यह होगी कि वह अपने घोषित नीतिगत रुख, स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और उम्मीदवार की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।

कांग्रेस के सामने मुस्लिम और दलित प्रतिनिधित्व का सवाल

अहमदाबाद नगर निगम में कांग्रेस के सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी इस चयन को महत्वपूर्ण बनाता है। उपलब्ध कराए गए चुनावी आंकड़ों के अनुसार, कांग्रेस के टिकट पर 18 मुस्लिम और सात दलित पार्षद चुनाव जीतकर आए हैं। इन समुदायों के प्रतिनिधियों के बीच यह मांग चर्चा में बताई जा रही है कि नेता प्रतिपक्ष का पद उनके समाज के किसी प्रतिनिधि को मिलना चाहिए।

यह मांग केवल समुदाय आधारित प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। इसके पीछे यह सवाल भी है कि क्या पार्टी अपने विभिन्न सामाजिक आधारों को नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त स्थान दे रही है।

अहमदाबाद में कांग्रेस लंबे समय से अल्पसंख्यक और अन्य दलित पिछड़े सामाजिक समूहों के समर्थन पर निर्भर रही है। ऐसे में नेतृत्व चयन के दौरान सामाजिक प्रतिनिधित्व की अनदेखी का आरोप पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। दूसरी ओर, केवल सामाजिक पहचान को नियुक्ति का आधार बनाना भी पर्याप्त नहीं होगा। संगठनात्मक क्षमता, सदन में मुद्दे उठाने की योग्यता, प्रशासनिक समझ और पार्टी के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस के सामने वास्तविक चुनौती ऐसा नेता चुनने की है जो अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ पूरे शहर के नागरिकों की समस्याओं को मजबूती से उठा सके।

बीस वर्षों का इतिहास और नेतृत्व की बदलती तस्वीर

अहमदाबाद नगर निगम में 2005 से भाजपा के सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष का पद कई नेताओं के पास रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 2005 से 2010 तक सुरेंद्र बक्षी ( ब्राह्मण), 2010 से 2015 तक बदरुद्दीन शेख (मुस्लिम), 2015 से 2020 तक दिनेश शर्मा (ब्राह्मण), 2020-21 में कुछ समय के लिए कमला चावड़ा (अनुसूचित जाति) और 2021 से 2026 तक शहजाद खान पठान (मुस्लिम) ने यह जिम्मेदारी संभाली।

इस इतिहास से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने अलग-अलग समय पर दो ही समुदायों के नेताओं को विपक्ष की कमान सौंपी है। हालांकि, पिछले दो दशकों में अन्य सामाजिक समूहों को पर्याप्त अवसर मिला या नहीं, इसका आकलन करने के लिए निगम के पदाधिकारियों और पार्टी के संगठनात्मक रिकॉर्ड की व्यवस्थित समीक्षा जरूरी है।

नीरव बक्षी की संभावित नियुक्ति को उनके समर्थक संगठनात्मक अनुभव और राजनीतिक संपर्कों के आधार पर उचित ठहरा सकते हैं। उनके पिता भी अहमदाबाद नगर निगम में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में बक्षी के कांग्रेस नेताओं के साथ-साथ भाजपा के नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्कों का भी उल्लेख किया जाता है।

लेकिन राजनीतिक संपर्क अपने आप में प्रभावी विपक्ष की गारंटी नहीं है। असली परीक्षा यह होगी कि नेता प्रतिपक्ष निगम के सदन में कितनी तैयारी के साथ आता है, नागरिकों के सवालों को कितनी गंभीरता से उठाता है और सत्ता पक्ष को जवाबदेह बनाने के लिए कितनी निरंतरता से काम करता है।

विपक्ष की कुर्सी से बड़ा है कांग्रेस के सामने नेतृत्व का संकट

अहमदाबाद नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति में देरी कांग्रेस की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है। जब सत्ता पक्ष अपने प्रमुख पदों पर नियुक्तियां कर चुका हो और विपक्ष महीनों तक अपने नेता का नाम तय न कर पाए, तो इससे संगठन की राजनीतिक तैयारी और निर्णय क्षमता पर नकारात्मक संदेश जाता है।

नीरव बक्षी की दावेदारी को लेकर चल रही चर्चाएं कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक कठिन परीक्षा हैं। एक ओर संगठनात्मक अनुभव, राजनीतिक संपर्क और गुटीय संतुलन का सवाल है; दूसरी ओर उम्मीदवार की सार्वजनिक छवि, सोशल मीडिया पर व्यक्त विचार और पार्टी की घोषित नीतियों के साथ उनकी संगति का प्रश्न है। शहजाद खान पठान के समर्थकों की मांग और विभिन्न सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व का सवाल भी इस फैसले को जटिल बनाता है।

अंततः नीरव बक्षी चुने जाते हैं या शहजाद खान पठान को दोबारा जिम्मेदारी मिलती है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि कांग्रेस इस नियुक्ति के बाद कितनी प्रभावी विपक्ष बनती है। अहमदाबाद के नागरिकों को ऐसा नेता चाहिए जो सड़कों, पानी, सफाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, संपत्ति कर, पुनर्वास और गरीबों के घरों तथा दुकानों से जुड़े सवालों पर लगातार आवाज उठाए।

(अहमदाबाद से कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट।)

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