गलियों के आवारा कुत्तों को राजधानी से बाहर करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश: ड्राइंग रूप के पालतू कुत्ते बनाम गलियों के आवारा कुत्ते 

1- ड्राइंग रूप के पालतू कुत्ते अक्सर विदेशी नस्ल के होते हैं या संकर नस्ल के। गलियों के आवारा कुत्ते देशी नस्ल के हैं।  

2- ड्राइंग रूप के पालतू कुत्तों के गले में मालिक का पट्टा ज़रूर होता है। अक्सर मालिक की जंजीर में बंधे होते हैं या बांधे जाते हैं। 

गलियों के आवारा कुत्तों के गले में पट्टा नहीं होता है, न ही जंजीर होती है। 

3- ड्राइंग रूप के पालतू कुत्तों के भोजन, आवास, बिस्तरा और मनोरंजन का इंतजाम उनके मालिक करते हैं। उनको इसके लिए जद्दो-जहद नहीं करनी पड़ती है। 

गलियों के आवारा कुत्तों को अपना भोजन खुद जुटाना पड़ता है, रात-दिन इसके लिए मेहनत करते हैं। धूप-ठंड और बरसात से बचने के लिए खुद इंतजाम करना पड़ता है।

4- ड्राइंग रूप के पालतू कुत्ते सिर्फ और सिर्फ अपने मालिक के प्रति वफादार होते हैं। मालिक के इशारे पर हर काम करते हैं। यहां तक की मालिक के इशारे पर ही टट्टी-पेशाब भी करते हैं। 

गलियों के आवार कुत्ते पूरी तरह आजाद होते हैं। वे मनचाहे तरीके से दौड़ लगाते हैं, जब चाहे भौंक सकते हैं। जहां चाहे जा सकते हैं। जहां चाहें टट्टी-पेशाब कर सकते हैं। जब खाने को मिले तो खा लेंगे, जब पानी मिले तो पी लेंगे। जब टट्टी-पेशाब लगे तो कर लें। 

5- ड्राइंग रूप के कुत्ते ‘सभ्य’, ‘सुसंस्कृत’, ‘शिक्षित-प्रशिक्षित’  और मॉडर्न होते हैं। वह मालिक का हर इशारा समझते हैं, हर संकेत समझते हैं। वह घर आए मेहमानों के साथ कैसे व्यवहार करना है, उन्हें कैसे चाटना-चूमना है, यह सब भी जानते हैं।

गलियों के आवार कुत्ते ‘असभ्य’, ‘असंस्कृत’, ‘शिक्षा-दीक्षा विहीन’ और ‘गंवार’ होते हैं। वे मनमानापन करते हैं। वे खुद तय करते हैं, किसको चाटना-चूमना है और किस पर भौंकना है। 

6- ड्राइंग रूप के पालतू कुत्ते मालिक के भरोसे जिंदा रहते हैं। मालिक यदि उन्हें छोड़ दे तो वे बहुत जल्द ही मर जाएंगे। मालिक के बिना उनके लिए जिंदा रहना नामुमकिन है। उनकी जिंदगी मालिक पर निर्भर है। यदि उन्हें समय-समय पर हेल्थ चेकअप और इलाज न मिले और मालिक खाना न दे, तो भी वे ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाएंगे। ये मालिक के गुलाम होते हैं।

गलियों के आवारा कुत्ते किसी मालिक के भरोसे जिंदा नहीं हैं। वे प्रकृति और समाज में संघर्ष करके खुद को जिंदा रखते हैं। उन्हें किसी पशु चिकित्सक की कोई मदद शायद ही मिलती हो। 

7- ड्राइंग रूम के पालतू कुत्तों पर कम से कम प्रति महीने 5 हजार खर्च होता है। यह सबसे न्यूनतम हैं। यह खर्चा 1 लाख और 5 लाख या इससे ज्यादा भी हो सकता है। यह करोड़ों भी हो सकता है।  

गलियों के आवारा कुत्तों पर कोई खर्चा नहीं है। वे उनका जीना-मरना सब खुद के भरोसे है। इसके चलते ये किसी के गुलाम नहीं हैं। स्वतंत्र हैं। 

ड्राइंग रूप के कुत्ते सेक्स करने या बच्चा पैदा करने के लिए आजाद नहीं होते हैं। यह आजादी गलियों के कुत्तों को होती है। 

8- ड्राइंग रूम के पालतू कुत्ते सिर्फ उसी पर भौंकते हैं, उसी को काटते हैं, जिससे उनके मालिक को खतरा होता है। ये कई बार मालिक के इशारे पर काटते और भौंकते हैं। ये पूरी तरह अपने मालिक के प्रति वफादार होते हैं। मालिक बदल जाए तो दूसरे मालिक के प्रति वफादार हो जाते हैं।

गलियों के आवारा कुत्ते ज्यादा से ज्यादा गली या मुहल्ले के प्रति वफादार होते हैं। इनकी किसी के प्रति व्यक्तिगत वफादारी नहीं होती है। अच्छे खान-पान, आवास, बिस्तरा, वाहन, पंखा, एसी, हीटर, इलाज, खिलौने, मीट-मांस आदि के बदले में ड्राइंग रूम के कुत्ते कुत्तेपन का अन्य गुण खो देते हैं। उनके भीतर कुत्तेपन का एक लक्षण बस बचा रहता है, वह मालिक के प्रति पूरी वफादारी। 

गलियों के आवारा कुत्तों में उनके सारे प्राकृतिक लक्षण बचे रहते हैं। 

आज दुनिया के ताकतवर लोगों को गलियों के गैर-वफादार आवारा कुत्तों से ज्यादा जरूरत उनके ड्राइंग रूप के वफादार कुत्तों की है। 

आज दुनिया भर का कार्पोरेट-पूंजीपति-कारोबारी ताकतवर से ताकतवर दिखने वाले राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को अपने ड्राइंग रूम का वफादार कुत्ता बना लेता है। पूरी की पूरी सरकार को अपने  ड्राइंग रूम का वफादार कुत्ता बना लेते हैं। कई बार वे जोर-जोर से भौंकते दिखते हैं, लेकिन उनका सारा भौंकना मालिक के लिए होता है।

कार्पोरेट-पूंजी के मालिक पूरी की पूरी संसद और सासंदों को भी अपने ड्राइंग रूप का पालतू कुत्ता बना लेते हैं। ये मालिक नौकरशाहों को आमतौर अपने ड्राइंग रूप के वफादार कुत्तों में बदल लेते हैं।

आज दुनिया में इन पूंजी-कार्पोरेट के मालिकों ने बड़े-बड़े पत्रकारों-लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने ड्राइंग रूप का पालतू कुत्ता बना लिया है। यह जोर-जोर पूरी ताकत से भौंकते हैं। उनका यह भौंकना अपने मालिक के लिए होता है। उसके प्रति वफादारी जाहिर करने के लिए होता है। ये अपने मालिकों के लिए भौंकते हुए किताब लिखते हैं, लेख लिखते हैं, एंकरिंग करते हैं, वीडियो बनाते हैं। 

आज कार्पोरेट-पूंजी के मालिकों ने बड़े अभिनेताओं और खिलाड़ियों को अपने ड्राइंग रूम का पालतू कुत्ता बना लिया है। ये उनके ड्राइंग रूम में पालतू कुत्ते की तरह व्यवहार करते हैं। मालिक के इशारे पर नाचते-गाते हैं।

मैनेजर और सीईओ के रूप में कार्पोरेट-पूंजी के मालिकों ने ड्राइंग रूम में कुत्ते पाल रखे हैं, जो हर कीमत पर उनके लिए भौंकते हैं, उनके हितों की सेवा करते हैं।

न्याय और न्यायधीश भी बहुत सारे देशों में अपने मालिकों का पालतू कुत्ता बन चुके हैं। वे उतना ही भौंकते और काटते हैं, जिससे मालिकों के हितों की रक्षा हो सके। 

कई बार ये मालिक गलियों के उन आवारा कुत्तों को भी पालतू बना लेते हैं, जो ज्यादा भौंकता है। फिर वह उनके पालतू कुत्तों के रूप में उनके लिए भौंकता है। 

जिनके भी रोटी, मांस, पेय, आवास, बिस्तरा, इलाज, वाहन, एसी-हीटर, पंखा, गद्दा, सोफा और सुख-सुविधा का इंतजाम मालिक करता है, वह उन कुत्तों को अपने ड्राइंग रूम के वफादार कुत्तों के रूप में देखना चाहता है। यदि वह वफादारी छोड़ दे, उसे वे सड़क पर आवारा कुत्तों की तरह छोड़ देंगे। एक बार वफादार कुत्ते के रूप में जी लेने के बाद सड़क के आवारा कुत्ते के रूप में जीना मुश्किल होता है। दो ही विकल्प बचता है, किसी और मालिक का वफादार कुत्ता बनना या मरने के लिए तैयार होना। 

ड्राइंग रूम के वफादार कुत्तों वाली कोई बात हमारे देश के प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्रियों, सासंदों, विधायकों, मीडियाकर्मियों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, नौकरशाहों, न्यायपालिका और संस्थाओं-व्यक्तियों पर लागू नहीं होती है।  

ये बाते मैंने अपने देश के बारे में नहीं, अन्य देशों के बारे में कहीं हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, नौकरशाह, मीडियाकर्मी, पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी और न्यायधीश सभी पूरी तरह आजाद हैं, ये किसी के ड्राइंग रूम के वफादार पालतू कुत्ते नहीं हैं। न अडानी के, न अंबानी के, न टाटा के, न बिरला के और न किसी किसी विदेशी कार्पोरेट-पूंजी के मालिक के।  

यदि कोई हमारे देश के किसी व्यक्ति या संस्था को कार्पोरेट, पूंजी के मालिक या कारोबारियों के ड्राइंग रूम का वफादार पालतू कुत्ता कहता है, तो वह उसकी जिम्मेवारी है, मेरी नहीं। ऐसी कोई बात आप अपने जिम्मेवारी पर कहें। इसकी जिम्मेवारी मैं नहीं लेता। 

गलियों के आवारा कुत्तों के ‘दुर्गुण’ और ड्राइंग रूम के वफादार पालतू कुत्तों के ‘गुणों’ को देखते हुए, हमारे देश की सुप्रीम कोर्ट ने गलियों के आवारा कुत्तों को राजधानी और पूरे राजधानी क्षेत्र से बाहर निकालकर जेलों में ( शेल्टरों) में डालने का आदेश दिया है। ड्राइंग रूम के वफादार पालतू कुत्ते अपने मालिकों के पास सुरक्षित हैं। उनको सुप्रीम कोर्टे के आदेश से कोई खतरा नहीं है। हां खतरा तब होगा, जब मालिक उन्हें छोड़ देगा, वे सड़क पर आ जाएंगे और गलियों के आवारा कुत्ते बनने को मजबूर हो जाएंगे।

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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