सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट से कहा कि वह भ्रष्टाचार या दुराचार के आरोपों के बारे में किसी खास जज से जुड़ी जानकारी नहीं रखता है। सुप्रीम कोर्ट के जन सूचना अधिकारी की ओर से वकील रुक्मिणी बोबडे पेश हुईं और उन्होंने कहा कि ऐसी जानकारी इकट्ठा करना शायद मुमकिन न हो, क्योंकि इसमें काफी संसाधनों का इस्तेमाल करना पड़ेगा।
वकील ने जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव के सामने यह बात तब कही, जब पत्रकार सौरभ दास की एक याचिका पर सुनवाई चल रही थी। दास ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी न दिए जाने को चुनौती दी थी।
उन्होंने पूछा था कि क्या जस्टिस टी. राजा के मद्रास हाई कोर्ट के जज के तौर पर कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ भ्रष्टाचार या गलत आचरण की कोई शिकायत मिली थी। बोबडे ने आगे कहा कि ऐसी जानकारी को सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक करने से छूट भी मिल सकती है।
बोबडे ने कहा, “खास तौर पर भ्रष्टाचार और दुराचार के मामले में, हम किसी भी जज से जुड़ी जानकारी नहीं रखते हैं। इसलिए, यह अब एक तरह की ‘फिशिंग और रोविंग’ (तलाश और छानबीन वाली) जांच है, और हम उनके लिए यह जानकारी इकट्ठा करने में अपने संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर सकते।”
उन्होंने दलील दी कि भले ही सुप्रीम कोर्ट के लिए ऐसी जानकारी रखना मुमकिन हो, फिर भी शीर्ष अदालत सूचना अधिकार अधिनयम के तहत इसे देने के लिए बाध्य नहीं है, क्योंकि यह खास लोगों से जुड़ी है, जिनके खिलाफ हर तरह की शिकायतें आती रहती हैं।
बोबडे ने जोर देकर कहा, “इनपुट (जानकारी) खुद फैसले से काफी अलग होते हैं… इसलिए, कॉलेजियम का फैसला एक बात है। लेकिन उन्हें [कॉलेजियम को] जो शिकायतें मिलीं – उस फैसले के समर्थन में उन्हें जो भी दस्तावेज मिले – वे किसी भी तरह से सार्वजनिक जांच के दायरे में नहीं आते।”
उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दस सालों में भारत के मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर में मिली कुल शिकायतों के बारे में संसद को जानकारी दी थी, क्योंकि वह कुल डेटा उपलब्ध था।
दास ने सुप्रीम कोर्ट से उन शिकायतों की संख्या और उन पर की गई कार्रवाई के बारे में जानकारी मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी ने दास की सूचना अधिकार अर्जी का जवाब देते हुए कहा कि ऐसी कोई जानकारी नहीं रखी जाती है। वकील प्रशांत भूषण दास की तरफ से पेश हुए और दलील दी कि जो जानकारी वह मांग रहे हैं, उसे निजी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें जनहित जुड़ा है।
भूषण ने कहा, “अगर किसी जज के खिलाफ भ्रष्टाचार और दुराचार की शिकायतें हैं, तो साफ तौर पर उनका असर सार्वजनिक गतिविधियों या जनहित पर पड़ता है। और इसलिए, इस आधार पर जानकारी देने से मना नहीं किया जा सकता कि यह निजी जानकारी है।”
उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कुछ जानकारी दी थी, जिसे संसद में पेश किया गया था। इसमें 2016 से 2025 के बीच मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर में मौजूदा जजों के खिलाफ मिली शिकायतों की कुल संख्या शामिल थी।हालांकि, बोबडे ने कहा कि यह जानकारी मिली शिकायतों के प्रकार के बारे में नहीं थी, बल्कि सिर्फ मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर में मिली शिकायतों की कुल संख्या के बारे में थी।
भूषण ने कहा कि हालांकि वह इस बात से सहमत हैं कि जजों के खिलाफ कई शिकायतें बेबुनियाद हो सकती हैं, फिर भी मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर की यह ज़िम्मेदारी है कि वह उन शिकायतों पर कार्रवाई करे। उन्होंने आगे कहा कि जांच-पड़ताल के बाद, मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर यह कह सकता है कि आरोप बेबुनियाद हैं।
दास ने सूचना अधिकार के तहत यह जानकारी मांगी है कि क्या सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस टी. राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार या अनुचित आचरण की कोई शिकायत मिली है।
भूषण ने कहा, “यह निजी जानकारी तब हो सकती है, जब इसका सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से कोई संबंध न हो। अगर किसी जज के खिलाफ भ्रष्टाचार या दुराचार की कोई शिकायत है तो इसका सार्वजनिक गतिविधि और जनहित पर सीधा असर पड़ता है। इसे निजी जानकारी होने के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।”
उन्होंने आगे कहा: सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने सरकार को जानकारी दी, जिसने उसे संसद में पेश किया। संसद में इस पर सवाल-जवाब भी हुए। जब वे कहते हैं कि जानकारी उस तरीके से नहीं रखी गई, जिस तरह से आपने (दास ने) मांगी है… तो वे कहते हैं कि हालांकि हम कुल शिकायतों का रिकॉर्ड रखते हैं, लेकिन किसी खास जज से जुड़ी जानकारी अलग से नहीं रखते… वे हमें (शिकायतों का) निरीक्षण करने की अनुमति दे सकते हैं, क्योंकि सूचना अधिकार अधिनियम के तहत निरीक्षण करना भी एक अधिकार है।”
शिकायतों के निरीक्षण पर जोर देते हुए भूषण ने अधिनियम की धारा 4(1) का हवाला दिया, जिसमें यह अनिवार्य है कि हर सार्वजनिक प्राधिकरण जानकारी तक पहुंच को आसान बनाने के लिए रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखे, उसकी इंडेक्सिंग करे और उसे कंप्यूटराइज्ड करे। उन्होंने कहा कि इस प्रावधान के तहत दो दायित्व हैं: पहला, रिकॉर्ड को इस तरह से रखना कि वह अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक हो; और दूसरा, उसे वेबसाइट पर डालना।
उन्होंने कहा, “जानकारी वेबसाइट पर डाली जानी चाहिए थी। मान लेते हैं कि वे कहते हैं कि हम ऐसा नहीं कर सकते… मैं मानता हूं कि बेबुनियाद शिकायतों को खारिज किया जा सकता है, लेकिन अगर वे रिकॉर्ड रख रहे हैं और उसे संसद में दे रहे हैं तो उन्हें इस बात का भी रिकॉर्ड रखना चाहिए कि उन्होंने किन शिकायतों पर कार्रवाई की और किन पर नहीं, और क्या कार्रवाई की गई या नहीं।”
भूषण ने आगे कहा, “अगर उन्हें लगता है कि 8,000 शिकायतों से जानकारी निकालने में हमारे संसाधनों का बहुत ज़्यादा हिस्सा खर्च हो जाएगा तो उन्हें हमें जांच करने की इजाज़त देनी चाहिए। उन्हें इसे जज-दर-जज करके कैटलॉग बनाने में या हमें इसकी जांच करने देने में क्या दिक्कत है? या तो वे हमें जानकारी दें या इन शिकायतों की जांच करवाएं, जहां हम उन्हें देख सकें।”
बता दें, पिछली सुनवाई की तारीख पर, सुप्रीम कोर्ट प्रशासन के वकील ने कहा था कि उनके पास या भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास जस्टिस राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार या गलत आचरण के आरोपों वाली किसी भी शिकायत के बारे में कोई जानकारी मौजूद नहीं है। बुधवार को भी यही रुख अपनाते हुए वकील ने कहा: “हमने संसद को जो जानकारी दी है और वे जो जानकारी मांग रहे हैं, उन दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है।”
वकील ने सुप्रीम कोर्ट प्रशासन का जवाब पढ़कर सुनाया, जिसमें ये बातें कही गई थीं: कि जस्टिस राजा का मद्रास हाई कोर्ट के जज के तौर पर पूरा कार्यकाल 14 साल से ज़्यादा का था; कि सुप्रीम कोर्ट में शिकायत किस तरह से आती है; और यह कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को भेजे गए पत्र रजिस्ट्री के अधिकारियों द्वारा नहीं खोले जाते हैं, इसलिए भ्रष्टाचार के आरोपों या गलत आचरण के बारे में, जिसमें खास तारीखें भी शामिल हैं, कोई भी जवाब – चाहे वह हां में हो या ना में – नहीं दिया जा सकता।
इस जवाब में अधिनियम की धारा 7(9) का हवाला दिया गया, जिसमें यह अनिवार्य है कि जानकारी आम तौर पर उसी रूप में दी जानी चाहिए जिस रूप में मांगी गई, लेकिन यह सार्वजनिक अधिकारियों को अनुरोध अस्वीकार करने की भी अनुमति देता है, यदि जानकारी देने से संसाधनों का बहुत ज़्यादा हिस्सा खर्च होता हो या रिकॉर्ड को नुकसान पहुंचता हो।
कुछ देर तक मामले की सुनवाई करने के बाद, कोर्ट ने मामले को अगले महीने तक के लिए टाल दिया।कोर्ट ने दोनों पक्षों से एक ऐसा तरीका सुझाने को भी कहा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ईमानदार जजों की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहे और साथ ही, जनता को भी पता चले कि जजों के खिलाफ शिकायतों को किस तरह से निपटाया जाता है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)