Thursday, October 6, 2022

न्यायाधीश सामाजिक वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकते:चीफ जस्टिस

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चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा है कि वर्तमान समय की न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक निर्णय के लिए मामलों को प्राथमिकता देना है। न्यायाधीश सामाजिक वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकते। सिस्टम को टालने योग्य संघर्षों और बोझ से बचाने के लिए जज को दबाव वाले मामलों को प्राथमिकता देनी होगी।

चीफ जस्टिस ने मामलों के मीडिया ट्रायल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया कंगारू कोर्ट लगा लेता है। ऐसे में अनुभवी जजों को भी फैसला लेने में मुश्किल आती है। उन्होंने कहा कि प्रिंट मीडिया में अभी भी जवाबदेही है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि हम देखते हैं कि किसी भी केस को लेकर मीडिया ट्रायल शुरू हो जाता है। कई बार अनुभवी न्यायाधीशों को भी फैसला करना मुश्किल हो जाता है। न्याय वितरण से जुड़े मुद्दों पर गलत सूचना और एजेंडा संचालित बहस लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही है। अपनी जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर आप हमारे लोकतंत्र को दो कदम पीछे ले जा रहे हैं।

चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि आजकल जजों पर हमले बढ़ रहे हैं। पुलिस और राजनेताओं को रिटायरमेंट के बाद भी सुरक्षा दी जाती है, इसी तरह जजों को भी सुरक्षा दी जानी चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा कि वे राजनीति में जाना चाहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। हालांकि, जस्टिस रमना ने कहा कि उन्हें जज बनने का मलाल नहीं है।

27 अगस्त, 1957 को कृष्णा जिले के पोन्नावरम गांव में एक किसान परिवार में जन्मे जस्टिस एनवी रमना ने 24 अप्रैल, 2021 को भारत के 48वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली थी। वे हैदराबाद में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण में केंद्र सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील और रेलवे के वकील भी रहे हैं। वे आंध्र प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता भी रहे हैं। उन्होंने 10 मार्च, 2013 से 20 मई, 2013 तक आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में काम किया। उन्हें 27 जून, 2000 को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया था।

चीफ जस्टिस एनवी रमना ने अपनी जिंदगी से जुड़े कई राज खोले हैं। उन्‍होंने बताया कि कोई ऐसी चीज जिसके लिए आपने बहुत मेहनत की हो, उसे छोड़ पाने का फैसला आसान नहीं होता है। उन्‍होंने कहा कि जज के तौर पर सेवा देने का मौका बहुत चुनौतियों के साथ मिलता है। हालांकि, उन्‍हें एक दिन भी कोई मलाल नहीं हुआ।

चीफ जस्टिस ने कहा कि वह एक गांव में किसान परिवार में जन्‍मे। जब वह 7वीं- 8वीं में थे तब पाठ्यक्रम में अंग्रेजी आई। दसवीं पास करना उनके समय में एक बड़ी उपलब्धि होती थी। बीएससी करने के बाद पिता ने उनका हौसला बढ़ाया। इसके बाद उन्‍होंने कानून की डिग्री ली। कुछ महीनों के लिए उन्‍होंने विजयवाड़ा में मजिस्‍ट्रेट कोर्ट में प्रैक्टिस की। इसके बाद पिता के बढ़ावा देने पर हैदराबाद में हाई कोर्ट में प्रैक्‍ट‍िस करने पहुंच गए।

एक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे एनवी रमना ने ये बातें कहीं। जब उन्‍हें जज बनने का ऑफर मिला था तब वह बहुत अच्‍छी प्रैक्टिस कर रहे थे। उन्‍होंने बताया कि जज की जिंदगी आसान नहीं होती है। चीफ जस्टिस एनवी रमना जस्टिस एसबी सिन्‍हा स्‍मृति व्‍याख्‍यान को सम्बोधित कर रहे थे । यह कार्यक्रम रांची में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्‍टडी एंड रिसर्च ने आयोजित किया था।

तालुक स्‍तर की अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उन्‍होंने कई हाई प्रोफाइल मामलों में पैरवी की। वह अपने राज्‍य में अतिरिक्‍त सॉलिसिटर जनरल भी बने। वह सक्रिय राजनीति से जुड़ने को इच्‍छुक थे। लेकिन, किस्‍मत को कुछ और मंजूर था। जिस मुकाम त‍क पहुंचने में उन्‍होंने इतनी मेहनत की थी, उसे छोड़ देना आसान नहीं था।

चीफ जस्टिस ने बताया कि कई सालों तक उन्‍होंने अपने करियर को बनाने में लगाए। इस दौरान कई लोगों से मेलजोल रहा। हालांकि, पीठ से जुड़ने पर सोशल कनेक्‍शंस को छोड़ने की जरूरत पड़ी। लिहाजा, उन्‍होंने वैसा ही किया। चीफ जस्टिस ने कहा कि लोगों की सामान्‍य सोच के उलट जज की जिंदगी आसान नहीं होती है। जज वीकेंड और छुट्टी के दिन भी काम करते हैं। वे जिंदगी के कई खुशी के पल नहीं मनाते हैं। इनमें महत्‍वपूर्ण पारिवारिक आयोजन शामिल हैं। हर सप्‍ताह 100 से ज्‍यादा केसों को तैयार करना, दलीलों को सुनना, अपनी रिसर्च करना, फैसलों को लिखना और उसके साथ ही तमाम प्रशासनिक कामों को भी अमलीजामा पहनाना आसान नहीं है। जो व्‍यक्ति इस पेशे से जुड़ा नहीं है, वह शायद कल्‍पना भी नहीं कर सके कि तैयारी में ही कितने घंटे चले जाते हैं।

चीफ जस्टिस ने कहा कि हम कई घंटे पेपर और किताबें पढ़ते हैं। अगले दिन लिस्‍ट हुए केसों के लिए नोट बनाते हैं। कोर्ट उठते ही अगले दिन की तैयारी शुरू हो जाती है। ज्‍यादातर मामलों में यह अगले दिन आधी रात तक चलती है। हम वीकेंड और हॉलीडे पर भी काम करते हैं। रिसर्च करते हैं और फैसले लिखते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जिंदगी में खुशी के कई पल भी गंवाते हैं। कई दिन घर के नाती-पोतों को नहीं देख पाते हैं। ऐसे में जब कोई जजों के बारे में यह कहता है कि वे आसान जिंदगी जीते हैं। तो बात हजम नहीं होती है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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